परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहागणपतिक्रमः ४९
“द्वादशान्तं ललाटोर्ध्वं ललाटोर्ध्वावसानकम्” इति। यद्वा द्वादशान्ते
स्थूलशरीरे सुषुम्नानाडीमाश्रित्य द्वात्रिंशत्पद्मानि सन्ति। तेषु सहस्रदलकमले द्वे,
सर्वाधः अकुलनामकमेकमूर्ध्वमुखं सर्वोर्ध्वं द्वादशान्तनामकमधोमुखमपरम्। अत्र
प्रमाणं सविस्तरं योगिनीतन्त्रस्योत्तरचतुश्शतीव्याख्याने सेतुबन्धे अस्मत्परम-
गुरुकृते द्रष्टव्यम्।
द्वादशान्तसंज्ञकं यत्कमलं तत्कर्णिका-मध्यनिविष्ट-गुरुचरण-युगलं द्वन्द्वं
तस्माद् विगलत् स्रवद्यद् अमृतं तस्य रसस्य यो विसरो विस्तारस्तेन परिप्लुतं
क्लिन्नम् अखिलाङ्गं यस्य एवं भूत्वेति शेषः।
नियमिता पवनमनोगतिर्येन, प्राणान् मनश्चाचलं कृत्वेत्यर्थः। हृदय-
कमल-मध्ये अनाहते ज्वलन्तमित्यनेन स्वशरीरस्थपापदाहकर्तृत्वं सूचितम्।
उद्यदरुणकोटिपाटलमित्यनेन अभूतोपमानेन ब्रह्माण्डमध्ये एतदुपममन्यन्ना-
स्तीति सूचितम्। अशेषदोषनिर्वेषमशेषाणां स्वकीयदोषाणां निर्वेषो निर्गतो वेषः
स्वरूपं येषां ते स्वरूपशून्याः।
अनेकपो द्विपस्तस्य आननं यस्य ईदृशं ध्यात्वा तस्य देवस्य प्रभायाः
पटलेन समूहेन पाटलीकृतः। उद्यदादित्यवर्त्तिने महागणपतये गणेशगायत्र्या
अर्घ्यं दत्त्वा, नित्यकृत्यम् अग्निहोत्रादिकं विधाय चतुरावृत्तितर्पणं कुर्यात्।
आयुरारोग्यमित्यर्थवादः। गणपतिप्रीतये इति सङ्कल्पं विधायेति।
साधक का यह कर्तव्य है कि, वह ब्राह्म मुहूर्त में उठ जाय। शय्या
का परित्याग कर सर्वप्रथम उसे महागणपति का ध्यान करना चाहिये। ध्यान के
क्रम का निर्देश स्वयं सूत्रकार ने किया है। वह इस प्रकार है—
१. उपासक ध्यान की मुद्रा में विराजमान होकर दैनिक साधना के अनुसार
द्वादशान्त ललाटोर्ध्वकेन्द्र की कर्णिका के मध्य में या अन्य तन्त्रानुसार (अ
उ म, बिन्दु, अर्धचन्द्र, रेखिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिनी, समना और
उन्मना इन बारह चक्रों के ऊर्ध्वान्त केन्द्र में) एक हजार पत्रों वाले कमल
की मध्यरेखा के ऊपर अवस्थित गुरुदेव के दो चरणों का प्रकल्पन करे।
२. उन चरणों से स्रवित होने वाली सुधाधारा से पूरी तरह स्वात्म के सर्वाङ्ग
को सुख-स्नात अनुभव करे।