पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)
Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad
सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
४ कुंडलिया
सबर तखत पर बैठि तूर अठपहरा बाजै ॥
तम्बू है असमान जमीं का फरस बिछाया ।
छिमा किया छिड़काव खुसी का मुस्क लगाया ॥
नाम खजाना भरा जिकिर का नेजा चलता ।
साहिब चौकीदार देखि इबलीसहुँ १ डरता ॥
पलटू दुनिया दीन में उनसे बड़ा न कोय ।
साहिब वही फकीर है जो कोई पहुँचा होय ॥
( ९ )
रैयत कौन कहावै घर घर हाकिम होय ॥
घर घर हाकिम होय अदल फिर कौन चलावै ।
सब नायक होइ जाय बैल फिर कौन लदावै ॥
गदहा चलै हर बैल कौन फिर बेसहै तुरकी २ ।
मिलै कूप में मुक्ति गंग को देवै बुड़की ॥
काँच छुए होइ कनक पारस की रहै न इच्छा ।
घर घर सम्पति होइ कौन फिरि माँगै भिच्छा ॥
पलटू तैसे संत हैं भेष बनावै कोय ।
रैयत कौन कहावै घर घर हाकिम होय ॥
( १० )
जग खीझै तो का भया रीझै सतगुरु संत ॥
रीझै सतगुरु संत आस कुछ जग की नाहीं ।
एक द्वार को छोड़ और ना माँगन जाही ॥
जिउ मेरो बरु जाय जन्म बरु जाय नसाई ।
करौं न दूसर आस संत की करौं दुहाई ॥
तीन लोक रिसियाय ३ सकल सुर नर और नारी ।
मोर न बाँकै बार पठंगा पाया भारी ॥
पलटू सब रोवै पड़ा मोर भया सलतंत ।
(१) शैतान भी । (२) घोड़ा मोल ले । (३) रुष्ट हो ।
पलटू साहिब की बानी भाग—१ ५
जग खीझै तो का भया रीझै सतगुरु संत ।
॥ नाम ॥
( ११ )
नाम नाम सब कहत है नाम न पाया कोय ॥
नाम न पाया कोय नाम की गति है न्यारी ।
वही सकस¹ को मिलै जिन्होंने आसा मारी ॥
हौं को करै खमोस होस ना तन को राखै ।
गगन गुफा के बीच पियाला प्रेम का चाखै ॥
बिसरै भूख पियास जाय मन रंग में लागै ।
पाँच पचीस रहै वार संग में सोऊ भागै ॥
आपुइ रहै अकेल बोलै बहु मीठी बानी ।
सुनतै अब वह बनै कहा मैं कहौं बखानी ॥
पलटू गुरु परताप तें रहै जगत में सोय ।
नाम नाम सब कहत है नाम न पाया कोय ॥
( १२ )
लहना है सतनाम का जो चाहै सो लेय ॥
जो चाहै सो लेय जायगी लूट ओराई² ।
तुम का लुटिहौ यार गाँव जब दहिहै³ लाई ॥
ताकै कहा गँवार मोट भर बाँध सिताबी ।
लूट में देरी करै ताहि की होय खराबी ॥
बहुरि न ऐसा दाँव नहीं फिर मानुष होना ।
क्या ताकै तू ठाढ़ हाथ से जाता सोना ॥
पलटू मैं उतृन भया मोर दोस जिन देय ।
लहना है सतनाम का जो चाहै सो लेय ॥
( १३ )
मीठ बहुत सतनाम है पियत निकारै जान ॥
पियत निकारै जान मरै की करै तयारी ।
(१) आदमी । (२) खतम । (३) जलावैगा ।
कुंडलिया
सो वह प्याला पियै सीस को धरै उतारी ॥
आँख मूँदि कै पियै जियन की आसा त्यागै ।
फिरि वह होवै अमर मुए पर उठि कै जागै ॥
हरि से वे हैं बड़े पियो जिन हरि रस जाई ।
ब्रह्मा बिस्नु महेस पियत कै रहे डेराई ॥
पलटू मेरे बचन को ले जिज्ञासू मान ।
मीठ बहुत सतनाम है पियत निकारै जान ॥
( १४ )
संत सनेही नाम है नाम सनेही संत ।
नाम सनेही संत नाम को वही मिलावैं ॥
वे हैं वाकिफकार मिलन की राह बतावैं ।
जप तप तीरथ बरत करै बहुतेरा कोई ॥
बिना वसीला संत नाम से भेंट न होई ।
कोटिन करै उपाय भटक सगरौ१ से आवै ॥
संत दुवारे जाय नाम को घर तब पावै ।
पलटू यह है प्रान पर२ आदि सेती औ अंत ॥
संत सनेही नाम है नाम सनेही संत ।
( १५ )
दीपक बारा नाम का महल भया उजियार ॥
महल भया उजियार नाम का तेज बिराजा ।
सब्द किया परकास मानसर३ ऊपर छाजा ॥
दसो दिसा भई सुद्ध बुद्ध भई निर्मल साची ।
छुटी कुमति की गाँठि सुमति परगट होय नाची ॥
होत छतीसो राग दाग तिर्गुन का छूटा ।
पूरन प्रगटे भाग करम का कलसा फूटा ॥
पलटू अँधियारी मिटी बाती दीन्ही टार ॥
(१) सब । (२) परे । (३) नाम पारब्रह्मांड के तालाब का ।
पलटू साहिब की बानी भाग—१ ७
दीपक बारा नाम का महल भया उजियार ॥
( १६ )
नाम के रे परताप से भये आन कै आन ॥
भये आन कै आन बड़े के पाँव पड़ूँगा ।
का बपुरा तिल तेल फूल संग बिकता महँगा ॥
संत हैं बड़े दयाल आप सम मो को कीन्हा ।
जैसे भृङ्गी कीट सिच्छा कुछ ऐसी दीन्हा ॥
राई किहा सुमेर अजया गजराज चढ़ाई ।
तुलसी होइगा रेंड सरन की पैज बड़ाई ॥
पलटू जातिन नीच मैं सब औगुन की खान ।
नाम के रे परताप से भये आन कै आन ॥
( १७ )
देखौ नाम प्रताप से सिला तिरै¹ जल बीच ॥
सिला तिरै जल बीच सेत² में कटक³ उतारी ।
नामहिं के परताप बानरन⁴ लंका जारी ॥
नामहिं के परताप जहर मीरा ने खाई ।
नामहिं के परताप बालक पहलाद बचाई ॥
पलट हरि जस ना सुनै ता को कहिये नीच ।
देखौ नाम प्रताप से सिला तिरै जल बीच ॥
( १८ )
हाथी घोड़ा खाक है कहै सुनै सो खाक ॥
कहै सुनै सो खाक खाक है मुलुक खजाना ।
जोरू बेटा खाक खाक जो साचै माना ॥
महल अटारी खाक खाक है बाग बगैचा ।
सेत सपेदी खाक खाक है हुक्का नैचा ॥
साल दुसाला खाक खाक मोतिन कै माला ।
नौबतखाना खाक खाक है ससुरा साला ॥
(१) तैरती है। (२) पुल । (३) फौज, सेना । (४) बन्दरों ने ।
८ कुंडलीया
पलटू नाम खुदाय का यही सदा है पाक ।
हाथी घोड़ा खाक है कहै सुनै सो खाक ॥
( १६ )
हाथ जोरि आगे मिलै लै लै भेट अमीर ॥
लै लै भेट अमीर नाम का तेज बिराजा ।
सब कोउ रगरै नाक आइ कै परजा राजा ॥
सकलदार¹ मैं नहीं नीच फिर जाति हमारी ।
गोड़ धोय षट करम बरन पीवै लै चारी ॥²
बिन लसकर बिन फौज मुलुक में फिरी दुहाई ।
जन महिमा सतनाम आपु में सरस बढ़ाई ॥
सत्तनाम के लिहे से पलटू भया गँभीर ।
हाथ जोरि आगे मिलै लै लै 'भेट अमीर ॥
॥ सामर्थ ॥
( २० )
अदल होइ बैकुण्ठ में सब कोइ पावै सुक्ख ॥
सब कोइ पावै सुक्ख अमल है तेज³ तुम्हारा ।
भौसागर के बीच लगै ना उतरत बारा ॥
लेइ तुम्हारो नाम ताहि को बार न बाँकै ।
खुले-बंद⁴
पलटू साहिब की बानी भाग—१ ६
कौड़ी घर में नाहिं आपु मैं माँगौं भिच्छा ॥
राई परबत करैं करैं परबत को राई ।
अदना के सिर छत्र पैज की करैं बड़ाई ॥
लीला अगम अपार सकल घट अंतरजामी ।
खाँहिं खिलावहिं राम देहिं हम को बदनामी ॥
हम सों भया न होयगा साहिब करता मोर ।
देत लेत हैं आपुहीं पलट पलट सोर ॥
॥ संत और साध ॥
( २२ )
बड़ा होय तेहि पूजिये संतन किया बिचार ॥
संतन किया बिचार ज्ञान का दीपक लीन्हा ।
देवता तैंतिस कोट नजर में सब को चीन्हा ॥
सब का खंडन किया खोजि के तीनि निकारा ।
तीनों में दुइ सही मुक्ति का एकै द्वारा ॥
हरि को लिया निकारि बहुर तिन मंत्र बिचारा ।
हरि हैं गुन के बीच संत हैं गुन से न्यारा ॥
पलटू प्रथमै संत जन दूजे हैं करतार ।
बड़ा होय तेहि पूजिये संतन किया बिचार ॥
( २३ )
सीतल चन्दन चन्द्रमा, तैसे सीतल संत ॥
तैसे सीतल संत जगत की ताप बुझावैं ।
जो कोइ आवै जरत मधुर मुख बचन सुनावैं ॥
धीरज सील सुभाव छिमा ना जात बखानी ।
कोमल अति मृदु बैन बज्र को करते पानी ॥
रहन चलन मुसकान ज्ञान को सुगंध लगावैं ।
तीन ताप मिट जाय संत के दर्सन पावैं ॥
पलटू ज्वाला उदर की रहै न मिटै तुरंत ।
२
प्रथम भाग: प्रसिद्ध कुण्डलियाँ (सतगुरु, नाम व माया खण्डन)
१० कुंडलिया
सीतल चन्दन चन्द्रमा तैसे सीतल संत ॥
( २४ )
संत बराबर कोमल दूसर को चित नाहिं ॥
दूसर को चित नाहिं करैं सब ही पर दाया ।
हित अनहित सब एक असुभ सुभ हाथ बनाया ॥
कोमल कुसुमी चाह¹ नहीं सपने में दूषन ।
देखें परहित लागि प्रेम रस चूंखैं ऊखन² ॥
मिलनसार मुसकान बचन मृदु बोली मीठी ।
पुलकित सीतल गात सुभग रतनारी दीठी³ ॥
पलटू कौनो कछु कहै तनिको ना अकुताहिं ।
संत बराबर कोमल दूसर को चित नाहिं ॥
( २५ )
राम समीपी संत हैं वे जो करैं सो होय ॥
वे जो करैं सो होय हुकुम में उन के साहिब ।
संत कहैं सोइ करैं राम ना करते बायब⁴ ॥
राम के घर के बीच काम सब संतै करते ।
देवता तेंतिसकोट संत से सबही डरते ॥
राई पर्बत करैं करैं परबत को राई ।
राम के घर के बीच फिरत है संत दुहाई ॥
पलटू घर में राम के और न करता कोय ।
राम समीपी संत हैं वे जो करैं सो होय ॥
( २६ )
संत सासना सहत हैं जैसे सहत कपास ॥
जैसे सहत कपास नाय चरखा में ओटै ।
रूई धर जब तुमै हाथ से दोऊ निभोटै ॥
(१) कुसुम फूल के समान वृत्ति जो बड़ा नाजुक होता है । (२) गन्ने चूसैं ।
(३) दृष्टि । (४) खिलाफ ।
पलटू साहब की बानी भाग-१ ११
रोम रोम अलगाय पकरि कै धुनिया धूनी ।
पिउनी¹ नँह² दै कात सूत ले जुलहा बूनी ॥
धोबी भट्ठी पर धरी कुन्दीगर मूँगरी मारी ।
दरजी टुक टुक फारि जोरि कै किया तयारी ॥
पर-स्वारथ के कारने दुख सहै पलटूदास ।
संत सासना सहत हैं जैसे सहत कपास ॥
(२७)
संतन के सिर ताज है सोई संत होइ जाय ॥
सोई संत होइ जाय रहै जो ऐसी रहनी ।
मुख से बोलै साच करै कछु उज्ज्वल करनी ॥
एक भरोसा करै नहीं काहू से माँगै ।
मन में करै संतोष तनिक ना कबहुँ लागै ॥
भली बुरी कोउ कहै ताहि सुन नहिं मन माखै³ ।
आठ पहर दिन रात नाम की चरचा राखै ॥
पलट रहै गरीब होय भूखे को दे खाय ।
संतन के सिर ताज है सोई संत होइ जाय ॥
(२८)
तीन लोक से जुदा है उन संतन की चाल ॥
उन संतन की चाल करम से रहते न्यारे ।
लोभ मोह हंकार ताहि की गरदन मारे ॥
काम क्रोध कछु नाहिं लगै ना भूख पियासा ।
जियतै मिरतक रहें करैं ना जग की आसा ॥
ऋद्धि सिद्धि को देख देत हैं खाक चलाई ।
माया से निर्वर्त भजन की करैं बड़ाई ॥
सबै चबैना काल का पलटू उन्हें न काल ।
तीन लोक से जुदा है उन संतन की चाल ॥
(१) रुई की मोटी बत्ती जिस से सूत निकालते हैं। (२) नाखून। (३) रोस करै।
१२ कुंडलिया
( २६ )
फाका जिकर किनात१ ये तीनों बात जगोर ॥
तीनों बात जगोर खुसी की कफनी डारै ।
दिल को करै कुसाद२ आई भी रोजी टारै ॥
इबादत३ दिन रात याद में अपनी रहना ।
खुदी खूब को खोइ जनाजा४ जियतै करना ॥
सीकन्दर और गदा५ दोऊ कों एकै जानै ।
तब पावै टुक नसा फना६ का प्याला छानै ॥
पलटू मस्त जो हाल में तिसका नाम फकीर ।
फाका जिकर किनात ये तीनों बात जगोर ॥
( ३० )
कबही फाका फकर है कबही लाख करोर ॥
कबही लाख करोर गमी सादी कछु नाहीं ।
ज्यों खाली त्यों भरा सबुर है मन के माहीं ॥
कबही फूलन सेज हाथी की है असवारी ।
कबही सोवै भुईं पियादे मँजिल गुजारी ॥
कबही मलमल जरी ओढ़ते साल दुसाला ।
कबही तांपै आग ओढ़ि रहते मृगछाला ॥
पलटू वह यह एक है परालब्ध नहिं जोर ।
कबही फाका फकर है कबही लाख करोर ॥
( ३१ )
साध महातम बड़ा है जैसो हरि यस होय ॥
जैसो हरि यस होय ताहि को गरहन कीजै ।
तन मन धन सब वारि चरन पर तेकरे दीजै ॥
नाम से उत्पति राम संत अनामी७ समाने ।
( १ ) उपास, सुमिरन और संतोष । ( २ ) उदार । ( ३ ) आराधना । ( ४ )
रथी या टिकठी मुरदे के ले जाने की । ( ५ ) सिकन्दर बादशाह और भिखारी । ( ६ )
मौत । ( ७) अनामी पद में ।
पलटू साहिब की बानी भाग—१ १३
सब से बड़ा अनाम नाम की महिमा जाने ॥
संत बोलते ब्रह्म चरन के पियै पखारन ।
बड़ा महापरसाद सीत संतन कर छाड़न ॥
पलटू संत न होवते नाम न जानत कोय ।
साध महातम बड़ा है जैसो हरि यस होय ॥
( ३२ )
॥ भक्त जन ॥
हरि हरिजन को दुइ कहै सो नर नरकै जाय ॥
सो नर करकै जाय हरिजन हरि अंतर नाहीं ।
फूलन में ज्यों बास रहैं हरि हरिजन माहीं ॥
संत रूप अवतार आप हरि धरि कै आये ।
भक्ति करे उपदेस जगत को राह चलाये ॥
और धरै अवतार रहै निर्गुन संजुक्ता ।
संत रूप जब धरै रहै निर्गुन से मुक्ता ॥
पलटू हरि नारद सेती बहुत कहा समुझाय ।
हरि हरिजन को दुइ कहै सो नर नरकै जाय ॥
( ३३ )
हरि अपनो अपमान सह जन की सही न जाय ॥
जन की सही न जाय दुर्बासा की क्या गत कीन्हा¹ ।
भुवन चतुर्दस फिरे सबै दुरियाय जो दीन्हा ॥
पाहि पाहि करि परै जबै हरि चरनन जाई ।
तब हरि दीन्ह जवाब मोर बस नाहि गुसाँई ॥
मोर द्रोह करि बचै करौं जन द्रोहक नासा ।
(१) दुर्बासा ऋषि ने भक्त शिरोमणि राजा अंबरीक का प्रण तोड़ने को एकादशी
व्रत के पारन के लिए द्वादशी का न्योता राजा का माना । जब द्वादशी बीतने लगी और
ऋषि जी न आये तो राजा ने व्रत का धर्म्म निबाहने को शालिग्राम का चरणामृत
लिया कि तुर्त ऋषि जी पहुँचे और सराप देना चाहा । यह अनर्थ देख कर विष्णु ने
सुदर्शन चक्र को उन पर छोड़ा जिस से बचने को वह आप विष्णु तक की शरण में गये
लेकिन कोई उन्हें न बचा सका जब तक कि वह राजा अंबरीक की शरण में न आये ।
१४ कुंडलिया
माफ करै अंबरीक बचौगे तब दुर्बासा ॥
पलटू द्रोही संत कर तिन्हें सुदर्सन खाय ।
हरि अपनो अपमान सह जन की सही न जाय ॥
( ३४ )
काम क्रोध जिन के नहीं लगै न भूख पियास ॥
लगै न भूख पियास रहै तिरगुन से न्यारा ।
लोभ मोह हंकार नींद की गर्दन मारा ॥
सत्रु मित्र सब एक एक है राजा रंका ।
दुख सुख जीवन मरन तनिक ना ब्यापै संका ॥
कंचन लोहा एक एक है गरमी पाला ।
अस्तुति निन्दा एक एक है नगन दुसाला ॥
पलटू उन के दरस से होत पाप को नास ।
काम क्रोध जिन के नहीं लगै न भूख पियास ॥
( ३५ )
ना काहू से दुष्टता ना काहू से रोच१ ॥
ना काहू से रोच दोऊ को इक-रस जाना ।
बैर भाव सब तजा रूप अपना पहिचाना ॥
जो कंचन सो काँच दोऊ की आसा त्यागी ।
हारि जोत कछु नाहिं प्रीति इक हरि से लागी ॥
दुख सुख संपति बिपति भाव ना यहु से दूजा ॥
जो बाम्हन सो सुपच२ दृष्टि सम३ की पूजा ॥
ना जियने की खुसी है पलटू मुए न सोच ।
ना काहू से दुष्टता ना काहू से रोच ॥
॥ पाखंडी ॥
( ३६ )
पिसना पीसै राँड़ री पिउ पिउ करै पुकार ॥
(१) रुचि, प्यार । (२) डोम । (३) बराबर ।
पलटू साहिब की बानी भाग—१ १५
पिउ पिउ करै पुकार जगत को प्रेम दिखावै ।
कहवै कथा पुरान पिया को तनिक न भावै ॥
खिन रोवै खिन हँसै ज्ञान की बात बतावै ।
आप न रीझै भाँड़ और को बैठि रिझावै ॥
सुनै न वा की बात तनिक जो अंतर जानी ।
चाहै भेटा पीव चलै ना सुपथ रहानी ॥
पलटू ऊपर से कहै भीतर भरा बिकार ।
पिसनो पीसै राँड़ री पिव पिव करै पुकार ॥
( ३७ )
पर दुख कारन दुख सहै सन असंत है एक ॥
सन असंत है एक काट के जल में सारै ।
कूँचै खैंचै खाल उपर से मुँगरा मारै ॥
तेकर बटि के भाँजि भाँजि के बरतै रसरा ।
नर की बाँधै मुसुक बाँधते गउ और बछरा ॥
अमरजाल फिर होय बझावै जलचर १ जाई ।
खग मृग जीवा जंतु तेही में बहुत बझाई ॥
जिव दे जिव संतावते २ पलटू उन की टेक ।
पर दुख कारन दुख सहै सन असंत है एक ॥
( ३८ )
बिस्वा किये सिंगार है बैठी बीच बजार ॥
बैठी बीच बजार नजारा सब से मारै ।
बातैं मीठी करै सभन की गाँठि निहारै ॥
चोवा चंदन लाइ पहिरि के मलमल खासा ।
पंचभतारी भई करै औरन की आसा ॥
लेइ खसम को नाँव खसम से परिचै नाहीं ।
(१) जल में रहने वाले जीव जन्तु । (२) दूसरे जीव को सताने के निमित्त
अपने जीव पर कष्ट सहते हैं ।
बेचि बड़न को नाँव सभन को ठगि ठगि खाही ॥
पलटू तेकर बात है जेकरे एक भतार ।
बिस्वा किये सिंगार है बैठी बीच बजार ॥
( ३६ )
हवा हिरिस पलटू लगी नाहक भये फकीर ॥
नाहक भये फकीर पीर की सेवा नाहीं ।
अपने मुँह से बड़े कहावैं सब से जाहीं ॥
धमधूसर होइ रहे बात में सब से लड़ते ।
लाम काफ१ वो कहैं इमान को नाहीं डरते ॥
हमहीं हैं दुरवेस२ और ना दूसर कोई ।
सब को देहिं मुराद यकीन से ओकरे होई ॥
मन मुरीद होवै नहीं आप कहावैं पीर ।
हवा हिरिस पलटू लगी नाहक भये फकीर ॥
( ४० )
जौं लगि फाटै फिकिर ना गई फकीरी खोय ॥
गई फकीरी खोय लगी है मान बड़ाई ।
मोर तोर में परा नाहिं छूटी दुचिताई ॥
दुख सुख संपति बिपति सोच दोऊ की लागी ।
जीवन की है चाह मरन की डेर नहिं त्यागी ॥
कौड़ी जिव के संग रैन दिन करै कलपना ।
दुष्ट३ कहै दुख देइ मित्र को जानै अपना ॥
पलटू चिन्ता लगी है जनम गँवाये रोय ।
जौं लगि फाटै फिकिर ना गई फकीरी खोय ॥
॥ चितावनी ॥
( ४१ )
क्या सोवै तू बावरी चाला जात बसंत ॥
चाला जात बसंत कंत ना घर में आये ।
(१) गाली देना । (२) सच्चे फकीर । (३) शत्रु ।
पलटू साहिब की बानी भाग—१ १७
धृग जीवन है तोर कंत बिन दिवस गँवाये ॥
गर्ब गुमानी नारि फिरै जोवन की माती ।
खसम रहा है रूठि नहीं तू पठवै पाती ॥
लगै न तेरो चित्त कंत को नाहिं मनावै ।
का पर करै सिंगार फूल की सेज बिछावै ॥
पलटू ऋतु भरि खेलि ले फिर पछितैहै अंत ।
क्या सोतूवै बावरी चाला जात बसंत ॥
( ४२ )
खेलु सिताबी फाग तू बीती जात बहार ॥
बीती जात बहार सम्बत लगने पर आया ।
लीजै डफ्फ बजाय सुभग मानुष तन पाया ॥
खेलो घूँघट खोलि लाज फागुन में नाहीं ।
जे कोउ करिहै लाज काज ना सपनेहुँ नाहीं ॥
प्रेम की माट भराय सुरति की करु पिचकारी ।
ज्ञान अबीर बनाय नाम की दीजै गारी ॥
पलटू रहना है नहीं सपना यह संसार ।
खेलु सिताबी फाग तू बीती जात बहार ॥
( ४३ )
तू क्यों गफलत में फिरै सिर पर बैठा काल ॥
सिर पर बैठा काल दिनो दिन वादा पूजै ।
आज काल में कूच मूरख नहिं तोकँह सूझै ॥
कौड़ी कौड़ी जोरि ब्याज दे करते बट्टा ।
सुखी रहै परिवार मुक्ति में होवत ठट्ठा ॥
तू जानै मैं ठग्यो आप को तुही ठगावै ।
नाम संजीवन मूर छोरि के माहुर खावै ॥
पलटू सेखी ना रही चेत करो अब लाल ।
तू क्यों गफलत में फिरै सिर पर बैठा काल ॥
३
१८ कुंडलिया
( ४४ )
गरमै गरमै हेलुवा गंफा लीजै मारि ॥
गंफा लीजै मारि मनुष तन जात सिराना ।
भजि लीजै भगवान काल सिर पर नियरना ॥
मीठा है हरि नाम जियन का नाहिं भरोसा ।
खाय लेहु भरि पेट आगे से जात परोसा ॥
लीजै लाहा लूटि दिना दुइ संतन पासा ।
अज हूँ चेत गँवार जात है खाली स्वासा ॥
पलटू अटक न कीजिये कूच है साँझ सकारि ।
गरमै गरमै हेलुवा गंफा लीजै मारि ॥
( ४५ )
सुर नर मुनि जोगी जती सबै काल बसि होय ॥
सबै काल बसि होय मौत कालौ की होती ।
पारब्रह्म भगवान मरै ना अबिगत जोती ॥
जा को काल डेराय ओट ताही की लीजै ॥
काल की कहा बसाय भक्ति जो गुरु की कीजै ॥
जरामरन मिटि जाय सहज में औना जाना ।
जपि कै नाम अनाम संत जन तत्व समाना ॥
बेद धनंतर मरि गया पलटू अमर न कोय ।
सुर नर मुनि जोगी जती सबै काल बसि होय ॥
( ४६ )
चोला भया पुराना आज फटै की काल ॥
आज फटै की काल तेहू पै है ललचाना ।
तीनों पन गे बीत भजन का मरम ना जाना ॥
नख सिख भये सफेद तेहू पै नाहीं चेतै ।
जोरि जोरि धन धरै गला औरन का रेतै ॥
अब का करिहौ यार काल ने किहा तगादा ।
पलटू साहिब की बानी भाग-१ १८
चलै न एकौ जोर आय जब पहुँचा वादा ॥
पलटू तेहु पै लेत है माया मोह जँजाल ।
चोला भया पुराना आज फटै की काल ॥
( ४७ )
धूआँ का धौरेहरा ज्यों बालू की भीत ॥
ज्यों बालू की भीत ताहि को कौन भरोसा ।
ज्यों पक्का फल डारि गिरत से लगै न दोसा ।
कच्चे घड़े ज्यों नीर पानी के बीच बतासा ।
दारू१ भीतर अगिनि जिवन की ऐसी आसा ॥
पलटू नर तन जात है घास के ऊपर सीत ।
धूआँ का धौरेहरा ज्यों बालू की भीत ॥
( ४८ )
यही दिदारी दार२ है सुनहु मुसाफिर लोग ॥
सुनहु मुसाफिर लोग भेट फिर बहुरि न होना ।
को तुम को हम आय मिले सपने मैं सोना ॥
हिल मिल दिन दस रहे ताहि को सोच न कीजै ।
कोऊ है थिर नाहिं दोस ना हम को दीजै ॥
अहिर बाँधि के गाय एक लेहड़े में आनी ।
कूँवाँ की पनिहारि गई ले घर घर पानी ॥
पलटू मखरी आम ज्यों नदी नाव संजोग ।
यही दिदारी दार है सुनहु मुसाफिर लोग ॥
( ४६ )
आग लगी लंका दहै उनचासौ बही बयार ॥
उनचासौ बही बयार ताहि को कौन बचावै ।
घर के प्रानी रहे सोऊ आगी गुहरावैं ॥
फूटी घर की नारि सगा भाई अलगाना ।
(१) लकड़ी । (२) सराय ।
२० | कुंडलिया
बड़े मित्र जो रहे भये सब सत्रु समाना ॥
कंचन कौ सब नगर रती कौ रावन तरसै ।
दिया सिन्धु ने थाह ऊपर से पर्वत बरसै ॥
पलटू जेहि ओर राम हैं तेहि ओर सब संसार ।
आग लगी लंका दहै उनचासौ बही बयार ॥
( ५० )
भजन आतुरी¹ कीजिये और बात में देर ॥
और बात में देर जगत में जीवन थोरा ।
मानुष तन धन जात गोड़ धरि करौ निहोरा ॥
काँचे महल के बीच पवन इक पंछी रहता ।
दस दरवाजा खुला उड़न को नित उठि चहता ॥
भजि लीजै भगवान एहा में भल है अपना ।
आवागौन छुटि जाय जनम की मिटै कलपना ॥
पलटू अटक न कीजिये चौरासी घर फेर ।
भजन आतुरी कीजिये और बात में देर ॥
( ५१ )
यही समय गुरु पाँय में गोता लीजै खाय ॥
गोता लीजै खाय नाम के सरवर² माहीं ।
अवधि आइ नगिचान दाँव फिर ऐसा नाहीं ॥
मानुष तन सकराँत महोदधि³ जात सिरानी ।
ऐसी परबी पाइ नहीं तुम महिमा जानी ॥
सतसंगत के घाट पैठि कै कर असनाना ।
तन मन दीजै दान बहुरि नहिं औना जाना ॥
पलटू बिलम न कीजिये ऐसा औसर पाय ।
यही समय गुरु पाँय में गोता लीजै खाय ॥
(१) जल्दी, बिना टाल टूल के । (२) तालाब । (३) नदी, समुद्र ।
पलटू साहिब की बानी भाग—१ २१
( ५२ )
भया तगादा साहु का गया बहाना भूल ॥
गया बहाना भूल नफा में मूर गँवाया ।
भया साहु से झूठ बैठि के पूँजी खाया ॥
नहीं लिहा हरि नाम करी नहिं संतन सेवा ।
तीनों पन गये बीत पूजते देवी देवा ॥
सारी सरहज सास धाइ के लूटि मजा री ।
तुम्हरे सीस बिसान कोऊ ना संग तुम्हारी ॥
पलटू मानै काल ना कठिन चलावै सूल ।
भया तगादा साहु का गया बहाना भूल ॥
( ५३ )
काल महासिल¹ साहु का सिर पर पहुँचा आय ॥
सिर पर पहुँचा आय उजुर कछु एकौ नाहीं ।
पहुँचा धै अगुआय² लिहे धरि मारत जाही ॥
मार परे भा चेत लगा तब करन बिचारा ।
मूरख के परसंग बैठि कै बात बिगारा ॥
चलै न एकौ जोर बहाना का को लेवै ।
नहीं ब्याज नहि मूर साहु को का लै देवै ॥
पलटू वादा³ टरि गया पूँजी गई वराय⁴ ।
काल महासिल साहु का सिर पर पहुँचा आय ॥
( ५४ )
ज्यों ज्यो सूखै ताल है त्यों त्यों मीन मलीन ॥
त्यों त्यों मीन मलीन जेठ में सूख्यो पानी ।
तीनों पन गये बीति भजन का मरम न जानी ॥
कँवल गये कुम्हिलाय हंस ने किया पयाना ।
(१) तहसील करने वाला सिपाही । (२) पहुँचा पकड़ कर आगे कर लिया
जिस में भाग न सकें । (३) इकरार । (४) चुक गई ।
२२ कुंडलिया
मीन लिया कोउ मारि ठाँव ढेला चिहराना१ ॥
ऐसी मानुष देह बृथा में जात अनारी ।
भूला कौल करार आप से काम बिगारी ॥
पलट बरस औ मास दिन पहर घड़ी पल छीन ।
ज्यों ज्यों सूखै ताल है त्यों त्यों मीन मलीन ॥
( ५५ )
बूड़ी जात जहाज है नाम निवर्तिक२ बोल ॥
नाम निवर्तिक बोल हाथ से तेरे जाती ।
माँझ धार में फटी सूम की जोगवै थाती ॥
ऐसे मूरख लोग लालच में जनम गँवावैं ।
गई हाथ से चीज तेहू पर लेखा लावैं ॥
कंठा रूँधन भये मोह में लागा अजहूँ ।
कीन्हे प्रान पयान नाम ना सुमिरे तबहूँ ॥
पलटू नर तन रतन सम भा कौड़ी के मोल ।
बूड़ी जात जहाज है नाम निवर्तिक बोल ॥
॥ भक्ति ॥
( ५६ )
एक भक्ति मैं जानौं और झूठ सब बात ॥
और झूठ सब बात करै हठजोग अनारी ।
ब्रह्म दोष वो लेय काया को राखै जारी ॥
प्रान करै आयाम कोई फिर मुद्रा साधै ।
धोती नेती करै कोई लै स्वासा बाँधै ॥
उनमुनि लावै ध्यान करै चौरासी आसन ।
कोई साखी सबद कोइ तप कुस कै डासन ॥
पलटू सब परपंच है करै सो फिर पछितात ।
(१) पानी के सूख जाने पर तलैया की तली फट कर मट्टी के थक्के बन जाते
हैं। (२) बचाने वाला ।
पलटू साहिब की बानी भाग—१ २३
एक भक्ति मैं जानौं और झूठ सब बात ॥
( ५७ )
संत न चाहें मुक्ति को नहीं पदारथ चार ॥
नहीं पदारथ चार मुक्ति संतन की चेरी ।
ऋद्धि सिद्धि पर थुकैं स्वर्ग की आस न हेरी ॥
तीरथ करहिं न बर्त नहीं कछु मन में इच्छा ।
पुन्य तेज परताप संत को लगै अनिच्छा ॥
ना चाहें बैकुंठ न आवागवन निवार ।
सात स्वर्ग अपबर्ग तुच्छ सम ताहि बिचारा ॥
पलटू चाहै हरि भगति ऐसा मता हमार ।
संत न चाहें मुक्ति को नहीं पदारथ चार ॥
( ५८ )
ऐसी भक्ति चलावै मची नाम की कीच ॥
मची नाम की कीच बूढ़ा औ बाला गावै ।
परदे में जो रहै सब्द सुनि रोवत आवै ॥
भक्ति करै निरधार रहै तिर्गुन से न्यारा ।
आवै देय लुटाय आपु ना करै अहारा ॥
मन सब को हरि लेय सभन को राखै राजी ।
तीन देख ना सकै बैरागी पंडित काजी ॥
पलटूदास इक बानिया रहै अवध के बीच ।
ऐसी भक्ति चलावै मची नाम की कीच ॥
॥ प्रेम ॥
( ५६ )
मेरे तन तन लग गई पिय की मीठी बोल ॥
पिय की मीठी बोल सुनत मैं भई दिवानी ।
भँवरगुफा के बीच उठत है सोहं बानी ॥
दखा पिय का रूप रूप में जाय समानी ।