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पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad

सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished116 पृष्ठ

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पृष्ठ 17

पलटू साहब की बानी भाग-१ ११

रोम रोम अलगाय पकरि कै धुनिया धूनी ।
पिउनी¹ नँह² दै कात सूत ले जुलहा बूनी ॥
धोबी भट्ठी पर धरी कुन्दीगर मूँगरी मारी ।
दरजी टुक टुक फारि जोरि कै किया तयारी ॥
पर-स्वारथ के कारने दुख सहै पलटूदास ।
संत सासना सहत हैं जैसे सहत कपास ॥
(२७)
संतन के सिर ताज है सोई संत होइ जाय ॥
सोई संत होइ जाय रहै जो ऐसी रहनी ।
मुख से बोलै साच करै कछु उज्ज्वल करनी ॥
एक भरोसा करै नहीं काहू से माँगै ।
मन में करै संतोष तनिक ना कबहुँ लागै ॥
भली बुरी कोउ कहै ताहि सुन नहिं मन माखै³ ।
आठ पहर दिन रात नाम की चरचा राखै ॥
पलट रहै गरीब होय भूखे को दे खाय ।
संतन के सिर ताज है सोई संत होइ जाय ॥
(२८)
तीन लोक से जुदा है उन संतन की चाल ॥
उन संतन की चाल करम से रहते न्यारे ।
लोभ मोह हंकार ताहि की गरदन मारे ॥
काम क्रोध कछु नाहिं लगै ना भूख पियासा ।
जियतै मिरतक रहें करैं ना जग की आसा ॥
ऋद्धि सिद्धि को देख देत हैं खाक चलाई ।
माया से निर्वर्त भजन की करैं बड़ाई ॥
सबै चबैना काल का पलटू उन्हें न काल ।
तीन लोक से जुदा है उन संतन की चाल ॥
(१) रुई की मोटी बत्ती जिस से सूत निकालते हैं। (२) नाखून। (३) रोस करै।