पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)
Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad
सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपलटू साहिब की बानी भाग—१ ५
जग खीझै तो का भया रीझै सतगुरु संत ।
॥ नाम ॥
( ११ )
नाम नाम सब कहत है नाम न पाया कोय ॥
नाम न पाया कोय नाम की गति है न्यारी ।
वही सकस¹ को मिलै जिन्होंने आसा मारी ॥
हौं को करै खमोस होस ना तन को राखै ।
गगन गुफा के बीच पियाला प्रेम का चाखै ॥
बिसरै भूख पियास जाय मन रंग में लागै ।
पाँच पचीस रहै वार संग में सोऊ भागै ॥
आपुइ रहै अकेल बोलै बहु मीठी बानी ।
सुनतै अब वह बनै कहा मैं कहौं बखानी ॥
पलटू गुरु परताप तें रहै जगत में सोय ।
नाम नाम सब कहत है नाम न पाया कोय ॥
( १२ )
लहना है सतनाम का जो चाहै सो लेय ॥
जो चाहै सो लेय जायगी लूट ओराई² ।
तुम का लुटिहौ यार गाँव जब दहिहै³ लाई ॥
ताकै कहा गँवार मोट भर बाँध सिताबी ।
लूट में देरी करै ताहि की होय खराबी ॥
बहुरि न ऐसा दाँव नहीं फिर मानुष होना ।
क्या ताकै तू ठाढ़ हाथ से जाता सोना ॥
पलटू मैं उतृन भया मोर दोस जिन देय ।
लहना है सतनाम का जो चाहै सो लेय ॥
( १३ )
मीठ बहुत सतनाम है पियत निकारै जान ॥
पियत निकारै जान मरै की करै तयारी ।
(१) आदमी । (२) खतम । (३) जलावैगा ।