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सर्वकोश
पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad

सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished116 पृष्ठ

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पृष्ठ 16

१० कुंडलिया
सीतल चन्दन चन्द्रमा तैसे सीतल संत ॥
( २४ )
संत बराबर कोमल दूसर को चित नाहिं ॥
दूसर को चित नाहिं करैं सब ही पर दाया ।
हित अनहित सब एक असुभ सुभ हाथ बनाया ॥
कोमल कुसुमी चाह¹ नहीं सपने में दूषन ।
देखें परहित लागि प्रेम रस चूंखैं ऊखन² ॥
मिलनसार मुसकान बचन मृदु बोली मीठी ।
पुलकित सीतल गात सुभग रतनारी दीठी³ ॥
पलटू कौनो कछु कहै तनिको ना अकुताहिं ।
संत बराबर कोमल दूसर को चित नाहिं ॥
( २५ )
राम समीपी संत हैं वे जो करैं सो होय ॥
वे जो करैं सो होय हुकुम में उन के साहिब ।
संत कहैं सोइ करैं राम ना करते बायब⁴ ॥
राम के घर के बीच काम सब संतै करते ।
देवता तेंतिसकोट संत से सबही डरते ॥
राई पर्बत करैं करैं परबत को राई ।
राम के घर के बीच फिरत है संत दुहाई ॥
पलटू घर में राम के और न करता कोय ।
राम समीपी संत हैं वे जो करैं सो होय ॥
( २६ )
संत सासना सहत हैं जैसे सहत कपास ॥
जैसे सहत कपास नाय चरखा में ओटै ।
रूई धर जब तुमै हाथ से दोऊ निभोटै ॥
(१) कुसुम फूल के समान वृत्ति जो बड़ा नाजुक होता है । (२) गन्ने चूसैं ।
(३) दृष्टि । (४) खिलाफ ।