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पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)

Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary

राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished69 पृष्ठ

७६ पाकदर्पणम्
शिशिरेऽह्नि ऋतौ तावत् तिक्तस्वादुरसास्समाः ।
अनेकान् कायसम्भूतान् दोषान्नाशु हरन्ति च ॥ २६ ॥
देशकालवयोऽवस्था — धातुदोषबलाबलम् ।
विद्वान् विचार्य तान्येव प्रयत्नेन प्रयोजयेत् ॥ २७ ॥
वसन्तादि ऋतुओं में पथ्य तथा उनके गुण — वसन्त ऋतु के दिनों में कटु,
मधुर तथा लवण रस वाले पदार्थ पथ्य होते हैं। ये यथा क्रम बल की वृद्धि,
जाठराग्नि की वृद्धि तथा रुचि को बढाने वाले होते हैं। ग्रीष्म ऋतु के दिन में
मधुर, अम्ल तथा लवण रस वाले पदार्थ खाने के योग्य हैं। ये वात-विकार को
शान्त करते हैं तथा शरीर को शान्त रखते हैं। वर्षा ऋतु के दिन में कटु, मधुर
तथा लवण रस वाले पदार्थ पथ्य हैं और ये वात आदि विकार को शान्त करते हैं
तथा जाठराग्नि को बढ़ाते हैं। शरद् ऋतु के दिन में मधुर तथा तिक्त रस वाले
पदार्थ खाने योग्य हैं। हेमन्त ऋतु के दिन में मधुर कटु तिक्त तथा कषाय रस
वाले पदार्थ पथ्य हैं। शिशिर ऋतु में तिक्त तथा मधुर रस वाले पदार्थ सामा-
न्यतः सेवन करने योग्य हैं। ये अनेक प्रकार के शरीर में होने वाले दोषों को
शीघ्र ही नाश करते हैं। विद्वान् मनुष्य देश, काल, वय, अवस्था, धातु तथा
दोषों के सबल एवं निर्बल का विचार कर उसी के अनुसार प्रयत्न पूर्वक प्रयोग
करें ॥ २२-२७ ॥
ऋतुसन्धिधर्मनिरूपणम्
ऋतुसन्धिषु सर्वेषु जन्तूनाञ्जायते कफः ।
अन्नारेकव्यतिकराद् अग्निमेदसमुद्भवात् ॥ २८ ॥
वसन्तग्रीष्मवर्षेषु अग्निर्ज्वलति देहिनाम् ।
शरद्धेमन्तशिशिर — ऋतुष्वनिलसम्भवः ॥ २९ ॥
सच्चिदानन्दरूपोऽयं पक्वापक्वरसात्मकः ।
अस्ति योऽसौ प्रकाशात्मा सर्वं पायात्सदाशिवः ॥ ३० ॥
ऋतुओं के सन्धिधर्म का निरूपण — सभी ऋतुओं की सन्धियों में अन्न तथा
जल के व्यतिक्रम होने से तथा अग्नि एवं मेद के उत्पन्न होने से प्राणियों का कफ
बढ़ जाता है। वसन्त; ग्रीष्म तथा वर्षा ऋतु में प्राणियों की अग्नि प्रज्वलित रहती
है। शरद् हेमन्त तथा शिशिर ऋतुओं में वायु की उत्पत्ति होती है। पक्वापक्व
रसात्मक, सच्चिदानन्द रूप यह जो प्रकाशात्मक अग्नि स्वरूप शिव है वे सभी
पापियों की रक्षा करें ॥ २८-३० ॥
नलविरचितम् ७७
ऋतुक्रमानुसारण मांससेवनजन्तवः
हरिणादिर्वसन्ते च ग्रीष्मे मेषादि सम्भवम् ।
वर्षत्तौ कुक्कुटादीनां मत्स्यादीनां शरत्समे ॥ ३१ ॥
हेमन्ते शूक्रादीनाञ्चटकादेश्च शैशिरे ।
आमिषं क्रमशस्तेषामृतुष्वेतेषु योजयेत् ॥ ३२ ॥
ऋतु के अनुसार मांस सेवन के योग्य जन्तु — वसन्त ऋतु में हरिण आदि
के मांस सेवन करने योग्य है। ग्रीष्म ऋतु में मेष ( भेड़ ) आदि का मांस सेवन
करने योग्य है। वर्षा ऋतु में कुक्कुट ( मुर्गा ) आदि का मांस, शरद् ऋतु में
मछली आदि का मांस, हेमन्त ऋतु में सूअर आदि का मांस, शिशिर ऋतु में
चटका ( गौरैया ) आदि का मांस क्रमशः पूर्वोक्त ऋतुओं में प्रयोग करें ॥ ३१ ॥
वसन्ते हितोपभोग्यमांसानि
अथ वक्ष्ये हितं मांसं क्रमशः ऋतुषट्कके ।
एणीहरिणयोर्मांसं वसन्तत्तौ हितं च तत् ॥ ३३ ॥
पथ्यं हितकरं वृष्यं परमं स्वादुबृंहणम् ।
वसन्त में उपभोग करने योग्य मांस — छहों ऋतुओं में उपभोग करने योग्य
हितकर मांस को कहते हैं। वसन्त ऋतु में हरिण तथा हरिणी का मांस हितकर
होता है। इन सबों का मांस सेवन करना पथ्य, हितकर, वीर्यवर्द्धक, उत्तम
स्वादिष्ट तथा मांसवर्द्धक होता है ॥ ३१ ॥
ग्रीष्मत्तौ हितोपभोग्यमांसानि
आविकञ्च फलं मेषमामिषं शीतलं मृदुः ।
ग्रीष्मत्तौ तु परं पथ्यमुष्णवारणं हितम् ॥
ग्रीष्म में उपभोग करने योग्य मांस — ग्रीष्म ऋतु में भेड़ी तथा भेड़ा का
मांस शीतल तथा मृदु होने के कारण उत्तम पथ्य है तथा उष्मा शामक होने से
हितकर है ॥ ३४२ ॥
वर्षत्तौ हितोपभोग्यमांसानि
लवणस्याब्धिजातानां मत्स्यानां कुक्कुटस्य च ॥ ३५ ॥
आमिषं परमं पथ्यं वर्षत्तौ शीतवारणम् ।
वर्षा ऋतु में उपभोग करने योग्य मांस — वर्षा ऋतु में लवण समुद्र में रहने
वाले मत्स्य ( मछली ) एवं मुर्गा का मांस उत्तम पथ्य होता है और यह शीत को
दूर करने वाला है ॥ ३५ ॥

७८ पाकदर्पणम्
शरदृतौ हितोपभोग्यमांसानि
नदीतटाकसम्भूतं मत्स्यानामामिषं हितम् ॥ ३६ ॥
ऋतौ शरदि तीक्ष्णोष्णसमरूपं सुखप्रदम् ।
शरद ऋतु में उपभोग योग्य मांस—शरद ऋतु में नदी तथा पोखरा में रहने
वाली मछलियों का मांस तीक्ष्ण तथा उष्ण सम रूप होने के कारण सुखप्रद एवं
हितकर होता है ॥ ३६ ॥
हेमन्तर्तौ हितोपभोग्यमांसानि
वाराहशशसंभूतं क्रव्यमुष्णकरं परम् ॥ ३७ ॥
लघु वृष्यं सुखकरं ऋतौ हेमन्तसंज्ञके ।
हेमन्त ऋतु में उपभोग योग्य मांस—हेमन्त ऋतु में सूअर तथा खरगोश का
मांस उत्तम गरम, हल्का, वीर्यवर्द्धक तथा सुखकारक होता है ॥ ३७ ॥
शिशिरर्तौ हितोपभोग्यमांसानि
आमिषं कलविङ्कस्य लावकोत्थं च शोभनम् ॥ ३८ ॥
उष्णवीर्यकरं स्वादु ऋतौ शिशिरसंज्ञके ॥ ३९ ॥
शिशिर ऋतु में उपभोगयोग्य मांस—शिशिर ऋतु में कलविङ्क (गौरैया)
तथा लावक पक्षी का मांस उत्तम होता है। यह उष्ण, वीर्यवर्द्धक तथा स्वादिष्ट
होता है ॥ ३८-३९ ॥
सूदकारगुणप्रशस्तयः
एवं वसन्तादि ऋतौ प्रसिद्धधर्मान् विदित्वा कुरुते यथात्मा ।
विमुक्तपापः स च सूददोषैः पुनर्जन्मना जठरं न याति ॥ ४० ॥
यदामिषं देवपित्तृप्रवृत्तये करोति सूदो यदि कामवर्जितः ।
प्रयाति लोकं कृतिना कृतियँथा सवासवस्तं मुमुदे सदा मुदा ॥ ४१ ॥
अकलार्थसकलं कलाविदः सूदकर्मकुशलं मृगादिषु ।
स्वामिकार्यमिति यः करोति तत् सूददोषकृतपापभाङ्नरः ॥ ४२ ॥
इति नलकृतपाकदर्पणे द्वितीयं प्रकरणं समाप्तम् ॥ २ ॥
पाचक की प्रशंसा—इस प्रकार पाचक वसन्तादि ऋतुओं में अच्छी तरह
प्रसिद्ध गुण-धर्मों को जानकर पाचक कार्य करता है वह पाचक के दोषों से मुक्त
होकर पुनः माता के पेट में नहीं जाता है। अर्थात् संसार से मुक्त हो जाता है।
यदि पाचक कामना रहित देवता पितर के लिये मांस का प्रकार बनाता है तो वह


नलविरचितम् ७९
पुण्यात्मा देवताओं के लोक में जाता है और हमेशा प्रसन्नता पूर्वक इन्द्र के साथ
रहता है। यो पाकशास्त्र को जाननेवाला मृग आदि के मांस को बनाने में कुशल
अच्छी तरह स्वामी के कार्य के लिये मांस पाक को बनाता हैं वह मनुष्य पाचक
के दोष जन्य पाप का भागी नहीं होता है ॥ ४०-४२ ॥
इति नलकृत पाकदर्पण का डा० इन्द्रदेव त्रिपाठीकृत माधुरी हिन्दी व्याख्या
सहित ऋतुधर्मनिरूपण नामक द्वितीय प्रकरण समाप्त ॥ २ ॥

Here is the complete, line-by-line transcription of the Sanskrit and Hindi text from the image:

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अथ भक्ष्यप्रकाराः
भक्ष्यराजः—
विभिन्नभक्ष्यपदार्थानां निर्माणप्रकारनिरूपणम्
शीतगोधूमशकलं भागमेकं समाहरेत् ।
नवमेकं सूक्ष्मवासो भागं सूदः प्रशान्तये ॥ १ ॥
सुपक्वं भिन्नचणकं निर्णयेदर्धभागकम् ।
एकं च मेदसोभागन्नयेन्निष्पावमानकम् ॥ २ ॥
नारिकेलकणैः सूक्ष्मं भागार्धस्य ग्रहेद् बुधः ।
एलासैंधवचूर्णञ्च किंचिदानीय मानवित् ॥ ३ ॥
समानीय सुपक्वं च घनसारार्दिनिर्मिते ।
मन्दक्षीरसमुद्भूतं नवनीतं नयेन्नवम् ॥ ४ ॥
मेलयेच्च यथायोग्यं पक्वं क्षीरेण मानवित् ।
जंबीरबीजवत्कुर्यात् मोदकान् बहुशः सुधीः ॥ ५ ॥
वासितेषु पुनः पूगपट्टेष्वेतान् पृथक् क्षिपेत् ।
अन्तराट्टालिके सम्यक् निधाय च पुनः पचेत् ॥ ६ ॥
तमादाय पुनस्तेषु सिद्धेद्धै स्थिरसर्पिषि ।
भक्ष्यराजाह्वयो राजन् कथिते पाककोविदैः ॥ ७ ॥
विभिन्न भक्ष्यपदार्थों में भक्ष्यराजनिर्माण-प्रकार— पाचक शीतल (कच्चा)
गेहूँ के टुकड़ों का एक भाग तथा नवीन महीन सुगन्धित द्रव्य एक भाग प्रशान्त के
लिये ग्रहण करे । अच्छी तरह पके हुए चने की दाल आधा भाग, लोबिया की
गूदी एक भाग, तथा नारियल के फल का सूक्ष्म कण आधा भाग ग्रहण करे और
इलायची तथा सेन्धा नमक का चूर्ण थोड़ा मिला दे । इनके बाद सबों को पका दे
और कर्पूर आदि से सुगन्धित दूध का निकाला हुआ नवीन मक्खन लेकर यथायोग्य
मात्रा के अनुसार पके दूध के साथ मिला दे । तदनन्तर बुद्धिमान् पाचक जम्बीरी
नींबू के बीज के समान बहुत सा मोदक बना ले और इन सबों को सुवासित पूगपट्ट
में अलग रक्खे । पुनः घर के अन्दर अच्छी तरह रखकर पकावे और पुनः उसको
लेकर घी में छोड़ दे । हे राजन्, इसको उत्तम पाचक भक्ष्यराज कहते हैं ॥१-७॥


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नलविरचितम् \hfill ८१
भक्ष्यराजस्य गुणाः
वातपित्तहरश्चायं वृष्यः कायविवर्द्धनः ।
सद्योलघुतरः स्वादुः शरीरस्य बलप्रदः ॥ ८ ॥
भक्ष्यराज के गुण— भक्ष्यराज वात एवं पित्त को दूर करनेवाला, वीर्यवर्द्धक,
शीघ्र ही जाठराग्नि दीपक, अत्यन्त हल्का, स्वादिष्ट तथा शरीर को बल देने
वाला है ॥ ८ ॥
अन्यदभक्ष्यप्रकारनिर्माणविधिर्गुणाः
निधाय सूक्ष्मवासश्च प्रवण्वां सूदकोविदः ।
प्रथमं रसमासिच्य पेषयेन्नवनीतवत् ॥ ९ ॥
निक्षिपेत्तादृशं मांसं पात्रे तस्मिन् ततः परम् ।
गोधूमस्य कणान् पेषान् भिन्नमुद्गकणांस्तथा ॥ १० ॥
भर्जयित्वा पुनः किञ्चित् पचेद्वै पयसा च तान् ।
खण्डानि निक्षिपेतत्र तेभ्यो द्विगुणितानि च ॥ ११ ॥
दुग्धोद्भवानि खण्डानि तदर्द्धानि च निक्षिपेत् ।
जातीचम्पकपुन्नागपुष्पादीन् तत्र निक्षिपेत् ॥ १२ ॥
सुपक्वं कुक्कुटाण्डान्तं लोहितं तत्समं न्यसेत् ।
कल्कं च घनसारस्य एलाचूर्णञ्च निक्षिपेत् ॥ १३ ॥
मुहूर्तमेकमास्थाय पुनः पुष्पाणि संत्यजेत् ।
मेलयित्वा तु तत्कल्कं पात्रेऽन्यस्मिन् विनिक्षिपेत् ॥ १४ ॥
मानवित् मांसकल्केन कुर्याद् वै तेषु कर्पूराम् ।
निधाय तेषु मुद्गादिकल्कं कुर्याच्च शक्तिवत् ॥ १५ ॥
तच्छोभार्थं पुनः कुर्यादाकारान् द्विधा द्विधा ।
एवं बहूनि वै कुर्याद् भक्ष्याणि च पृथक् पृथक् ॥ १६ ॥
निधाय पूगपट्टस्य नेत्रेतानि पचेद्बुधः ।
अनेनैव प्रकारेण पश्चाद्भक्ष्यं प्रदापयेत् ॥ १७ ॥
रुच्यं पथ्यं तथा बल्यं वृष्यं दोषत्रयापहम् ।
एवमादीनि भक्ष्याणि कर्त्तव्यानि मनीषिभिः ॥ १८ ॥
अन्य प्रकार का भक्ष्य बनाने की विधि तथा गुण— पाकशास्त्रवेत्ता महीन
सुगन्धित द्रव्य प्रवणी (बटलोहो) में रक्खे । पहले इसके जल के साथ मांस को
नवनीत की तरह पीस ले । इसके बाद पूर्वोक्त प्रकार से पीसा हुआ मांस उस पात्र
में रक्खे । पुनः पीसे हुए गेहूँ के कण, तथा मूँग की दाल को घी के साथ भून ले

४२ पाकदर्पणम्
और दूध में पका ले। इन सभी द्रव्यों के दुगुना शक्कर तथा उसके आधा दूध
की खोया छोड़ दे। तदनन्तर जाती (चमेली) चम्पा तथा सफेद कमल का पुष्प
छोड़ दे। पुनः मुर्गी के छिलका रहित अण्डा को लाल वर्ण होने तक पकाकर
छोड़ दे और कर्पूर का कल्क तथा इलायची का चूर्ण मिला दे। थोड़ी देर
पूर्वोक्त पुष्पों को रखने के बाद निकाल कर फेंक दे। पूर्वोक्त सभी चीजों को
एक दूसरे पात्र में रखकर मांस के कल्क के साथ कर्पूर से सुवासित कर मूँग का
कल्क बनाकर सीप की तरह बनाये। उसको सुन्दर बनाने के लिये दो तीन प्रकार
के आकार का बना ले। इसी प्रकार अलग-अलग बहुत प्रकार के भक्ष्य पदार्थ बना
कर पूगपट्ट नेत्र में रखकर पकावे। इसीप्रकार तैयार होने के बाद बुद्धिमान् पाचक
खाने के लिये दे। यह रुचिकारक, पथ्य, बलवर्द्धक, वीर्यवर्द्धक तथा त्रिदोषनाशक
होता है। इस प्रकार बुद्धिमान् पाचक अनेक वस्तुओं से अनेक प्रकार के भक्ष्य
पदार्थों को बनावे ॥ ९-१८ ॥
भक्ष्यपदार्थोपसंहारः
भक्ष्यजालमिदमर्पितं प्रियं सेव्यतां सुकृतिभिः परं मुदा ।
पाकसारसरसं सदा समं कान्तिदीपनकरं बलप्रदम् ॥ १९ ॥
इति नलकृत पाकदर्पणे भक्ष्यवर्णनं नाम तृतीयं प्रकरणं समाप्तम् ॥
भक्ष्य पदार्थ विषयक उपसंहार—इस प्रकार प्रिय भक्ष्य पदार्थों के समूहों
को मैंने बताया। इसको प्रसन्नता के साथ पुण्यवान व्यक्ति सेवन करें। यह सरस-
पाक सरस, सदा शान्ति देनेवाला, कान्तिवर्द्धक तथा बलकारक होता है॥ १९॥
इति नलकृत पाकदर्पण का डा० इन्द्रदेव त्रिपाठीकृत माधुरी हिन्दी व्याख्या
सहित भक्ष्यवर्णन नामक तृतीय प्रकरण समाप्त ॥ ३ ॥


अथ पायसप्रकारनिरूपणम्
विचित्रलशुनपायसनिर्माणविधिर्गुणाश्च
अथ भेदान् प्रवक्ष्यामि पायसस्य विचित्रकान् ।
त्वचं लशुनभागानां समुत्सृज्य प्रयत्नतः ॥ १ ॥
अग्रतो मूलतः किञ्चित् छित्त्वा छेदान् समुत्सृजेत् ।
विरूढार्थं स्रजन्तेषां कुर्यात्सूच्यार्धतन्तुभिः ॥ २ ॥
पायसं यावता सिद्धं तावदेव परिग्रहेत् ।
यावता स्यात्क्रियाशुद्धिः तावदेव प्रयोजयेत् ॥ ३ ॥
भागान् लशुनकन्दस्य छिन्त्यात्सूक्ष्मंश्चतुर्विधम् ।
तेषां विरूढगर्भस्थं समादाय समुत्सृजेत् ॥ ४ ॥
तानेव पोटलीं विद्वान् कुर्याद्वै सूक्ष्मवाससा ।
काञ्जिकामिश्रिते पाके यावत्तण्डुलसम्भवे ॥ ५ ॥
कृत्वा स्थानं पचेत्सम्यग्गन्धकटुमोचनात् ।
पक्वं लशुनमादाय सघृतं मांसमुत्सृजेत् ॥ ६ ॥
क्षालयेद्वारिणा सम्यक् पचेत् क्षीरेण पाकवित् ।
चतुःकृत्वः पञ्चकृत्वः क्षालयेद्वारिणा पुनः ॥ ७ ॥
विचित्र लशुन पायस बनाने की विधि तथा गुण—भक्ष्यप्रकार बनाने के
बाद पायस (खीर) के विचित्र प्रकारों को बताता हूँ। लहसुन को लेकर
प्रयत्नपूर्वक उसकी त्वचा को निकाल कर फेंक दे और थोड़ा अग्रभाग तथा
मूलभाग को भी काटकर फेंक दे। उसको एकत्र रहने के लिये सूई-तागा से
माला की तरह पिरो ले। जितनी मात्रा में पायस बनाना हो उतनी ही मात्रा में
ग्रहण करे और जितने से कार्य की सिद्धि हो जाय उतना ही प्रयोग में ले।
पाचक लहसुन के कन्द को चार भाग में काटे। उसके अन्दर स्थित कंडी (डंठल)
निकाल कर फेंक दे। इसके बाद उनको महीन वस्त्र से पोटली में बाँध ले और
काञ्जीमिश्रित पाक में चावल पकने तक पोटली तथा लहसुन की माला को किसी
स्थान पर राख कर जब तक उसका कटु गन्ध दूर न हो जाय तब तक पकावे।
इसके बाद पके लहसुन को लेकर घृत युक्त मांस को छोड़ दे तथा जल से
प्रक्षालन कर दे और पाक को जानने वाला दूध के साथ अच्छी तरह पकावे।
चार बार या पाँच बार जल से प्रक्षालन करें ॥ १-७ ॥
८ पा.द.

Left Page:

८४ \hspace{4cm} पाकदर्पणम्
भाण्डद्वये च लशुनं निक्षिपेत्तादृशं ततः ।
एकस्मिन्निक्षिपेद्भाण्डे सहो लशुन साभिधा ॥ ८ ॥
अन्यस्मिन् विन्यसेद्भाण्डे सहः सरलिकास्ततः ।
शृतमर्धविशिष्टं च क्षीरं विश्रावयेद् बुधः ॥ ९ ॥
यथार्हं शर्करार्युक्तं क्षीरं भाण्डद्वये क्षिपेत् ।
निक्षिप्य पायसेऽन्यस्मिन् रम्भाफलमनुत्तमम् ॥ १० ॥
पनसस्य फलं रम्यमपरे पायसे न्यसेत् ।
कल्कं च घनसार्रादि निक्षिपेदुभयत्र हि ॥ ११ ॥
निक्षिपेत्तत्र जात्यादि कुसुममभ्युमयं हि ।
पायसं लघुवातघ्नं रम्यं व्याधिहरं शुभम् ॥ १२ ॥
पूर्वोक्त प्रकार से पकाये हुए लहसुन को दो पात्रों में रक्खे। एक पात्र में लहसुन
को मसाला आदि के साथ छोड़ दे और दूसरे पात्र में सरलिका के साथ रक्खे ।
इसके बाद आधा पकाया हुआ दूध छान ले और उसमें उचित मात्रा में शक्कर
मिलाकर दोनों पात्रों में छोड़ दे। एक पायस पात्र में उत्तम केला का फल छोड़-
कर दूसरे पायस पात्र में सुन्दर कटहल का फल छोड़ दे । घनसार कर्पूर आदि
का कल्क दोनों में ही छोड़ दे । पुनः उसमें चमेली आदि का फूल दोनों में
छोड़ दे इसके बाद पुष्पों को निकालक रख ले और खाने के समय दे। यह लशुन
पायस हल्का होता है और यह वातनाशक, रम्य तथा अच्छी तरह व्याधिनाशक
होता है ॥ ८-१२ ॥
गोधूमपायसनिर्माणविधिर्गुणाश्च
नवगोधूममानीय सम्मुत्सार्य सम्मृत्कणान् ।
ईषज्जलेन संक्लन्नमपहन्न्यादुलूखले ॥ १३ ॥
मोचयेत्तत्तुषं सम्यक् कुर्यादेवं द्विधाद्विधा ।
अवहन्याच्च तक्रेण श्लिष्टं यावद् भवेत्पुनः ॥ १४ ॥
दशविंशतिकृत्वस्तान् अवहन्याच्च सर्पिषा ।
संस्पृश्य केनचित् सम्यक् कुर्यात्तत्तुषमोचनम् ॥ १५ ॥
त्रिभाग माहिषं क्षीरं क्षीरभाण्डे प्रसिद्ध्ययेत् ।
एकेन जलभागेन सह मृद्वग्निना पचेत् ॥ १६ ॥
जलनिर्गमनं यावत् तावत्तावद् प्रसाधयेत् ।
तेषां पयस्तथा सिञ्चेत् समभाण्डेऽष्टभागिकम् ॥ १७॥


Right Page:

नलविरचितम् \hspace{4cm} ८५
एकभागं च गोधूमं तादृशं तत्र निक्षिपेत् ।
यथा च धूमसंस्पर्शो न भवेत्तं तथा पचेत् ॥ १८ ॥
दर्याविघट्टयन् शोध्या तथा भाण्डे स्थितं यदि ।
विभज्यैवं चतुर्थागं पानं पात्रेषु निक्षिपेत् ॥ १९ ॥
गेहूँका पायस बनाने की विधि तथा गुण— नवीन गेहूँ को लेकर उसके सूखे
पके एवं जीर्ण-शीर्ण गेहूँ के कणों को निकाल कर थोड़े जल से गीला कर ओखली
में कूटे । उसकी त्वचा अच्छी तरह निकाल कर फेंक दे और इसी प्रकार दो-दो
वार करे । इसके बाद तक्र के साथ तब तक कूटे जब तक वह एक लट ( मिला
हुआ ) हो जाय । पुनः घी के साथ दश-बीस बार कूटे। किसी चीज से पकड़
कर इसकी भूसी को अच्छी तरह निकाल दे । भैंस का दूध तीन भाग दूध के
पात्र में रक्खे और उसमें एक भाग जल छोड़कर मन्दाग्नि से पकावे । उसको
तब तक पकावे जब तक उसका जल न जल जाय । उस दूध को एक उसी के
समान पात्र में आठ भाग छोडे और एक भाग पूर्वोक्त प्रकार से सिद्ध किया,
हुआ गोधूम ( गेहूँ ) का कल्क छोड़ दे । पुनः उसको ऐसा पकावे जैसा कि धूम
से स्पर्श ( जलना ) न हो जाय । यदि वह क्षीर पात्र लग जाय तो कलछुल से
चला कर शोधन कर ले । इस प्रकार इसको पाचक चार पात्रों में रक्खे और
इसी प्रकार पूगपट्ट के बहुत से नेत्रों में रक्खे । उन पात्रों को बार-बार अनेक
सुगन्धित द्रव्यों से सुगन्धित कर ले तथा कर्पूर आदि से धूपित पात्र में उचित
प्रमाण में मात्रा को जानने वाला पाचक रक्खे ॥ १३-१९ ॥
फलपुष्पपानकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
चतुर्विधं तथा पाकं पात्रेष्वेतेषु निक्षिपेत् ।
निक्षिपेत् तेषु पाकेषु फलपुष्परसं ततः ॥ २० ॥
तेषां च निक्षिपेत् क्षीरं सुपक्वं तत्प्रमाणवित् ।
फलञ्च पनस फलञ्च पनस तत् तद्रसं केतकीदलम् ॥ २१ ॥
अन्येषामिक्षुदण्डं च तद्रसं कमलं क्षिपेत् ।
तेषां च सहकारस्य फलं सूदस्त्व निक्षिपेत् ॥ २२ ॥
तदोग्रं रसमासिच्य तदीयं कुसुमं न्यसेत् ।
द्राक्षाफलं च केषाञ्चित् निक्षिपेत्तद्रसं बुधः ॥ २३ ॥
कल्हार कुसुमं तत्र सुगन्धेन समन्वितम् ।
दाडिमस्य फलं केषान्तद्रसञ्च विनिक्षिपेत् ॥ २४ ॥
वल्लिकाकुसुमं तत्र सुगन्धेन समन्वितम् ।
कस्तूर्यादिसमं युक्त न्यसेत्तत्रैव पाकवित् ॥ २५ ॥

८६ पाकदर्पणम्
कपित्थस्य फलं तेषां तद्रसञ्च विनिक्षिपेत् ।
जाजीप्रसूनं तत्रैव न्यसेद्विद्वान् सकोविदः ॥ २६ ॥
फलानि चैवमादीनि तदीयांश्च रसांस्तथा ।
फलपुष्पपानक बनाने की विधि तथा गुण-पुनः चार प्रकार के पाकों
को इन पात्रों में छोड़ दे और इन पाकों में फल तथा पुष्प का रस छोड़ दे ।
इसके बाद परिमाण को जानने वाला उनमें परिपक्व क्षीर (दूध) को दे। उसमें
कटहल का फल तथा रस और केतकी (केवड़ा) का फूल छोड़ दे। अन्य पात्रों
में गन्ना का रस तथा कमल का फूल छोड़ दे। इस प्रकार किसी पात्र में पाचक
आम के फल का रस छोड़ दे। उसके उग्र रस (चोप) को निकाल कर उसके
गूदे को छोड़ दे। कुछ पाक पात्रों में अंगूर का फल तथा उसका रस छोड़ दे
और उसमें सुगन्ध से युक्त कह्लार (सफेद कमल) का फूल छोड़ दे। पाकवेत्ता
किन्हीं पाकपात्रों में अनार का फल तथा रस और सुगन्ध से युक्त वल्लिका का फूल
एवं कस्तूरी आदि के साथ उसमें छोड़ दे। अन्य पाकपात्र में पाकशास्त्रवेत्ता कैथ
का फल तथा रस और अजाजी (जीरा) तथा अजवायन का फूल छोड़ दे।
पूर्वोक्त प्रकार से पूर्वोक्त पाक में फलों को तथा उनके रसों को छोड़ दे ॥२०-२६½॥
तत्तद्योनीनि पुष्पाणि पात्रेष्वान्वेषु निक्षिपेत् ।
निक्षिपेन्माक्षिकं सर्पिः केषाञ्चित्सुदवित्तमः ॥ २७ ॥
सुगन्धीनि विकासानि प्रसूनानि न्यसेत्क्रमात् ।
एतैरालोड्य तं पाकं तत्प्रसूनानि संत्यजेत् ॥ २८ ॥
ततश्च पोटलीं कृत्वा जलपूर्णघटेन च ।
अन्तराट्टालकं कृत्वा तच्च तेषु विनिक्षिपेत् ॥ २९ ॥
सिकतावेदिकायां च न्यसेत्तान् पनसाहतान् ।
तालपत्रैर्बुधः सम्यग्वीजयेच्च पुनः पुनः ॥ ३० ॥
यावच्छैत्यम्भवेत्तावत्तत्रैव तापयेद्बुधः ।
मुक्तिकाले समालोच्य भक्षयेद्वा प्रदापयेत् ॥ ३१ ॥
अयं पित्तहरो वृष्यः पथ्यः शैत्यकरो नृणाम् ।
जगतामाश्रयं ब्रह्म यथा भवति सर्वदा ॥ ३२ ॥
पुनः अपनी-अपनी जाति के पुष्पों को प्रथम पात्र में छोड़े और पाकशास्त्र-
वेत्ता कुछ पाकपात्रों में मधु तथा घी छोडे। पुनः क्रम से सुगन्धित तथा खिले
हुए पुष्पों को छोड़े। पूर्वोक्त द्रव्यों के साथ उस पाक को मिलाकर पूर्वोक्त पुष्पों
को फेंक दे। इसके बाद पोटली बनाकर जलपूर्ण घड़े के साथ घर के अन्दर


नलविरचितम् ८७
करके उसको उन पात्रों में छोड़ दे और उन सबों को (पनस पाकपात्र को छोड़-
कर) बालुका के वेदी पर रक्खे। बुद्धिमान् पाचक बार-बार तालपत्र से अच्छी
तरह हवा करे। जब तक शीतल न हो जाय तब तक हवा देता रहे। इसके बाद
भोजन का समय आने पर स्वयं भक्षण करे तथा खाने के लिये दे। यह पित्त को
दूर करनेवाला, वीर्यवर्द्धक, पथ्य तथा मनुष्यों को शीतल करने वाला है, जैसे ब्रह्म
हमेशा संसार का आश्रय होता है।
उपसंहारः
रसालायास्तथा भक्ष्यभोज्यादीनामिहाश्रयाः ।
स्तुवन्ति सम्यक् सुधियस्ततः सर्वं सदा मुदा ॥ ३३ ॥
इति नलकृतपाकदर्पणे पायसप्रकारनिरूपणं नाम चतुर्थप्रकरणं समाप्तम् ।
उपसंहार-यहाँ पर रसाला तथा भक्ष्य-भोज्यादि का सेवन करने वाले
बुद्धिमान् लोग अच्छी तरह स्तुति करते हैं तथा हमेशा प्रसन्न रहते हैं।
इति नलकृत पाकदर्पण का डा० इन्द्रदेव त्रिपाठीकृत माधुरी हिन्दी व्याख्या
सहित पायसप्रकारनिरूपण नामक चतुर्थ प्रकरण समाप्त ॥४॥
•

अथ पानकभेदिरूपणम्
रसालायाश्च कथिता सर्वारुचिविमर्दिताः ।
पानभेदाश्च कथ्यन्ते भुक्तवान्नस्य विरेचकाः ॥ १ ॥
पानक का भेद निरूपण—पूर्व प्रकारण में सम्पूर्ण अरुचियों को नष्ट करने
वाली रसाला का वर्णन किया गया । अब भुक्त (खाये गये) अन्न को विरेचन
करने वाले पान (पानक) के भेद कहते हैं ॥ १ ॥
पानकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
हिरण्मये च चित्रे च नानारत्न विराजिते ।
शर्कराभागमेकं च सखण्डं तत्र निक्षिपेत् ॥ २ ॥
गाङ्गन्तद्विगुणं तोयं सिञ्चेद्वस्त्रेण शोधितम् ।
यावत्प्रलीयखण्डं तत्तावत्तत्रैव तन्न्यसेत् ॥ ३ ॥
तदादाय न्यसेद्यन्त्रे तुलितं घटनिर्मितम् ।
भवेद्विभाम्बुवद्यावत् तावत्तत्र पुनः पुनः ॥ ४ ॥
शोधयेद्वच्छाकरं तोयं सम्यक्सदः प्रमाणवित् ।
दशविंशतिपात्रेषु सूक्ष्मरूपेषु शोभिषु ॥ ५ ॥
प्रत्येकं पूगपट्टस्य लोचनानि न्यसेत्क्रमात् ।
फलानां तेषु नेत्रेषु रसं च कुसुमं क्षिपेत् ॥ ६ ॥
विभिन्न पानक बताने की विधि तथा गुण—अनेक रत्नों से जटिल चित्र-
विचित्र स्वर्णपात्र में खांड सहित एक भाग शक्कर छोड़े और वस्त्र से छाना हुआ
गंगाजल दुगुना छोड़ दे । जब तक शक्कर गल न जाय तब तक चलाते रहे
और तुला के आकार का बनाया हुआ घटनिर्मित यन्त्र पर रक्खे । जब तक
वह पारदर्शक जल के तरह न हो जाय तब तक जलमाण यन्त्र पर रक्खे । प्रणाम
को जानने वाला पाचक आमोद युक्त उस जल को अच्छी तरह शुद्ध कर ले ।
इसके बाद छोटे-छोटे सुन्दर दस-बीस पात्रों में पूगपट्ट नेत्र (नली) क्रमशः
रख दे और उन नलियों में फलों का रस तथा पुष्प छोड़ दे ॥ २-६ ॥
चिञ्चाफलरसं सिञ्चेदन्यं तादृशपुष्पकम् ।
कल्हारकुसुमं तत्र न्यसेत्तत्रैव बुद्धिमान् ॥ ७ ॥
जम्बूफलं तथान्यस्मिन् सुपक्वञ्च न्यसेद्बुधः ।
नारिङ्गपुष्पं तत्रैव पुन्नागकुसुमं न्यसेत् ॥ ८ ॥


नलविरचितम् ८९
पारावतफलान्यानि रसमेकत्र निक्षिपेत् ।
रम्भाफलरसं सिञ्चेत् अन्यस्मिन्नपि लोचने ॥ ९ ॥
करवीरस्य कुसुमं कुसुमं बकुलस्य च ।
एकत्रलकुचस्यादि फलं प्रक्षिप्य शास्त्रवित् ॥ १० ॥
सुगन्धमुत्पलं चात्र शतपत्रप्रसूनकम् ।
अन्यत्र निक्षिपेद् विद्वान् फलमाम्रातकस्य च ॥ ११ ॥
मातुलुंगस्य कुसुमं कुन्दस्य कुसुमं न्यसेत् ।
केतकीकुसुमं त्वेकं सर्व नेत्रेषु निक्षिपेत् ॥ १२ ॥
एलोनागरचूर्णञ्च जम्बीरस्य सरन्ततः ।
लोचनेषु च सर्वेषु किञ्चित्किञ्चित् विनिक्षिपेत् ॥ १३ ॥
कर्पूरं मृगनाभिं च कुङ्कुमं हिमवारिणा ।
पेषयित्वा च तत्कल्कं मानवित्प्रक्षिपेत्क्रमात् ॥ १४ ॥
पूर्वोक्त पात्रों में स्थित नेत्रों (नलिका) में भिन्न फलों का रस तथा पुष्प छोड़े ।
एक पात्र में इमली के फल का रस तथा उसी प्रकार का कोई पुष्प छोड़े । उसमें
बुद्धिमान् पाचक कल्हार (कूई) का पुष्प छोड़ दे । दूसरे पात्र में पके
जामुन के फल का रस छोड़े और उसी में नारङ्ग (गाजर) पुष्प तथा पुन्नाग
(सुलतान चम्पक) का पुष्प छोड़ दे । एक दूसरी नलिका में पारावत (परुषक-
शरीफा) के फल का रस तथा अन्य नलिका में केले के फल का रस छोड़ दे ।
पुनः क्रमशः एक पात्र में करवीर (कनैल) का फूल तथा दूसरे में मौलसर का
फूल छोड़ दे । एक नलिका में बड़हल के फल का रस तथा सुगन्धित कमल एवं
गुलाब का पुष्प छोड़ दे । एक नलिका में आम्रातक (आमड़ा) के फल का
रस तथा मातुलुङ्ग (बिजौरा नींबू) का फल एवं कुन्द का पुष्प छोड़ । इलायची
तथा सोंठ का चूर्ण और जम्बीरी नीम्बू का रस थोड़ा-थोड़ा सभी नलिकाओं में
छोड़ दे । कर्पूर, कस्तूरी तथा केशर का शीतल जल के साथ कल्क बना कर
प्रमाण को जानने वाला पाचक उचित मात्रा में छोड़ दे ॥ ७-१४ ॥
एवं सम्भारयुक्तेषु लोचनेषु प्रमाणवित् ।
शुद्धतच्छाकरं तोयं यथायोग्यं प्रसेचयेत् ॥ १५ ॥
मन्दमारुतसंचारपानागरे ततः सुधीः ।
सिकतानिर्मितायाञ्च वेदिकायाञ्च पण्डितः ॥ १६ ॥
निधाय तानि पात्राणि शुद्धवस्त्रेण वेष्टयेत् ।
उशीरनिर्मितेनाथ तालवृन्तेन बीजयेत् ॥ १७ ॥

९० पाकदर्पणम्
यावच्छैत्यं भवेत्पानं कुर्यात्तेनैव वीजनम् ।
आदाय तानि नेत्राणि पात्रेभ्यः सीदकानि च ॥ १८ ॥
त्यज्येत्पुष्पाणि सर्वत्र केतकीकुसुमादृतेः ।
आदावन्योन्यनेत्रेण पानभेदं प्रमाणवित् ॥ १९ ॥
बहवः पानभेदा स्युः शुद्धसङ्करभेदतः ।
विच्छेदनं बिना विद्वान् बुद्ध्वा कुर्याच्च पोटलीम् ॥ २० ॥
मन्दमारुतसंचारे धोमामाहरेच्च धोम् ।
एवं विधानि पानानि कुर्याद्ग्रीष्मे सुबुद्धिमान् ॥ २१ ॥
सेवितानि पुनस्तानि पानानि च मनीषिभिः ।
तत्तद्द्रव्यगुणान् कुर्युः संस्थितानात्मसुप्रभः ॥२२॥
पूर्वोक्त प्रकार से प्रमाण जानने वाला पाचक सम्भार ( मसाला आदि सामग्री
युक्त से ) पात्रस्थ नलिकाओं में पूर्वनिर्मित शर्करोदक (चीनी का शर्बत ) उचित
मात्रा में मिला दे । इसके बाद बुद्धिमान् पाचक मन्द हवा संचारयुक्त पान-
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[पृष्ठ १]

अथ विविधान्नयूषपाकनिर्माणप्रकरणम्
शाल्यन्नयूषानिर्माणविधिर्गुणाश्च
प्रस्थमेकं सुशाल्यन्नं संक्षाल्य च पुनः पुनः ।
पेषयित्वा च तान् पिष्टं काञ्जिकीभिश्च मेलयेत् ॥ १ ॥
तत्पञ्चगुणितैस्तोयैः सह चुल्यां पचेद्बुधः ।
कुस्तुम्बुरीं च कैडर्यं पाकमध्ये विनिक्षिपेत् ॥ २ ॥
पिष्टञ्च दर्ष्या लिप्तञ्च अवतार्य प्रशामयेत् ।
धवलं दधिमादाय तत्समं तत्र मेलयेत् ॥ ३ ॥
शोधयेत् सितवस्त्रेण घने यत्नेन पाकवित् ।
शोधितं तद्विशालेषु पात्रेषु बहुषु क्रमात् ॥ ४ ॥
स्थितेषु पूगपट्टस्य लोचनेषु विनिक्षिपेत् ।
केतकीकुसुमं सद्यः सर्वत्रैव निवेशयेत् ॥ ५ ॥
रुच्यर्थं सर्वपात्रेषु फलं पुष्पं समाहरेत् ।
शाल्यन्न का यूष (यूषामृत) बनाने की विधि तथा गुण — स्वच्छ जड़हन
धान का चावल एक सेर (१ किलो) को अच्छी तरह बार-बार धोकर तथा
पीसकर उसकी पीठी बना कर काञ्जी के साथ मिला ले । इसके बाद उसको
पाँच गुना जल के साथ बुद्धिमान् पाचक चुल्हे पर पकावे । पीठी के दर्वी लेप
(पक जाने पर) हो जाने पर उतार कर ठण्डा कर ले । तत्पश्चात् उसी के बरा-
बर सफेद दही लेकर उसमें मिला दे और पाकशास्त्र को जानने वाला पाचक
प्रयत्नपूर्वक सफेद वस्त्र से छान ले । छानने के बाद उसको बड़े-बड़े कई पात्रों
में स्थित पूगपट्ट नेत्रों में रक्खे । प्रत्येक पात्र में पाचक केतकी का फूल रक्खे
और रुचि को बढ़ाने के लिये सभी पात्रों में फल तथा पुष्प छोड़ दे ॥ २-५ १/२ ॥
बीजपूरफलच्छेदान् केषाञ्चिद्धेमपुष्पकम् ॥ ६ ॥
सत्फलाकुसुमं तेषु न्यसेदयोग्यं यथा बुधः ।
सहकारफलं केषां जाजीकुसुममेव च ॥ ७ ॥
नारङ्गस्य प्रसूनं च न्यसेत्तन्मानवित् पुनः ।
सल्लकीफलमन्येषां पाटलीकुसुमं न्यसेत् ॥ ८ ॥
पूगस्य पुष्पं निविशेत् कस्तूरीगुणसंयुतम् ।
कुम्भीफलं तथान्येषां वासन्ती कुसुमं न्यसेत् ॥ ९ ॥


[पृष्ठ २]

नलविरचितम् ९३
कल्हारकुसुमं तत्र प्रक्षिपेत्समनोहरम् ।
बालमुर्वारुकं केषां नमेरुकुसुमं न्यसेत् ॥ १० ॥
सुगन्धि कुसुमं तत्र प्रविशेत् तत्प्रमाणवित् ।
निक्षिपेदष्टपात्रेषु यथायोग्यं क्रमात्सुधीः ॥ ११ ॥
पूर्वोक्त विभिन्न पात्रस्थयूषोपाकों में किसी में बिजौरा नींबू के फल के टुकड़े
हेम पुष्प (नाग केशर) तथा सत्फला कुसुम (अनार का फूल) यथायोग्य
मिला दे । किसी पात्र में आम का फल तथा अजवायन का फल तथा नारंगी
का फूल प्रमाण को जानने वाला पाचक छोड़ दे । अन्य पात्रों में सल्लकी
(शालई) का फल तथा पाटली (पुन्नाग) का पुष्प छोड़ दे और कस्तूरी के
गुण से युक्त पूगपुष्प को छोड़ दे । अन्य दूसरे पात्रों में कुम्भी का फल तथा
वासन्ती का फूल छोड़ दे और कल्हार का मनोहर पुष्प छोड़ दे । किन्हीं पात्रों में
उर्वारु (खरबूजा) का बाल फल तथा नमेरु का पुष्प छोड़ दे और प्रमाण को
जानने वाला सुगन्धित द्रव्य का फूल छोड़ दे । इस प्रकार बुद्धिमान् पाचक आठों
पात्रों में यथा योग्य फल-पुष्प को छोड़ दे ॥ ६-११ ॥
एवं चेद्बहवो भेदाः सुचियूषस्य भूमिप ! ।
एतच्च यूषमालोड्य प्रसूनान्येव संत्यजेत् ॥ १२ ॥
प्रयत्नेन पुनस्तांश्च वेष्टयित्वाथ संविशेत् ।
शैत्यादिगुणसंसर्गः कार्यस्तेषां च पूर्ववत् ॥ १३ ॥
अयं च यूषः पीयूषः पित्तघ्नः श्रमहा भवेत् ॥ १४ ॥
हे राजन् इस प्रकार पवित्र यूष के अनेक भेद होते हैं। इस यूष को अच्छी
तरह चलाकर पुष्पोंको निकाल फेंक दे। पुनः इसको अच्छी तरह वेष्टित कर रक्खे
और पहले की तरह पंखा आदि की हवा से शीतल गुण से युक्त कर दे। यह यूष
पीयूष (यूषामृत) पित्त को शान्त करने वाला तथा थकावट को दूर करने
वाला है ॥ १२-१४ ॥
राजशाल्यन्नयूषनिर्माणविधिर्गुणाश्च
मर्दयित्वा पुनः सम्यक् शोधयेत् घनवाससा ।
पूगपट्टस्य नेत्राणि बहुपात्रेषु निक्षिपेत् ॥ १५ ॥
सयूषं दधिशाल्यन्नं सम्भवन्तेषु निक्षिपेत् ।
प्रमाणेन न्येसेत्तेषु चूर्णं सैन्धवसम्भवम् ॥ १६ ॥
मेथीजीरकचूर्णं च एलाचूर्णं च निक्षिपेत् ।
आर्द्रकस्य पलाण्डोश्च शकलानि च निक्षिपेत् ॥ १७ ॥

पृष्ठ ९४

कुम्भीपत्रं च धान्यं च मातुलुङ्गदलं क्षिपेत् ।
केतकीकुसुमं तेषु सहकारफलं क्षिपेत् ॥ १८ ॥
नानाविधानि पुष्पाणि फलं निक्षिपेत्सल्लकीफलम् ।
तदीयं निक्षिपेत्पत्रं तद्योग्यं द्रव्यमादिशेत् ॥ १९ ॥
राजशाल्यन्न यूष बनाने की विधि तथा गुण—पूर्वोक्त प्रकार से शालि
चावल १ किलो को पीस कर तथा काञ्जी मिलाकर पाँच गुना जल में पका ले
तथा दही में मर्दन कर गाढ़े वस्त्र से छान ले और बहुत पात्रों में पूगपट्ट नेत्र
में रख कर उनमें पूर्वनिर्मित यूष सहित दधि शाल्यन्न को रक्खे । पुनः उचित
मात्रा में सेन्धा नमक का चूर्ण छोड़ दे । साथ ही मेथी, जीरा तथा इलायची
का चूर्ण छोड़ दे और अदरक तथा प्याज को काटकर छोड़ दे । कुम्भीपत्र (काय-
फल) धनियां तथा बिजौरा नींबू के फल का दल छोड़ दे । पुनः केतकी का
फूल तथा आम का फल छोड़ दे । अनेक प्रकार के पुष्पों तथा (सल्लकी) सल्लई
का फल छोड़ दे । पूर्वोक्त द्रव्यों का पत्र तथा यथायोग्य द्रव्यों को छोड़ दे ॥
पाकज्ञः क्रमशःस्तेषु सामुद्रफलमाहरेत् ।
केषांचिदाम्रशकलं तदीयं कुसुमं न्यसेत् ॥ २० ॥
मरीचिस्तबकं केषां जातीयं कुसुमं न्यसेत् ।
नारिंगकुसुमं केषु न्यसेद्विल्वफलानि च ॥ २१ ॥
कल्हारकुसुमं किन्तु सारङ्गस्य फलं क्षिपेत् ।
एलाफलस्य स्तवकं केषांचिद्धेमपुष्पकम् ॥ २२ ॥
एवमादीनि पुष्पाणि लवणस्य फलानि च ।
क्षिप्त्वा कुर्याच्च यूषस्य बहून् भेदान् विचक्षणः ॥ २३ ॥
क्षणमात्रं समालोक्य ततः पुष्पाणि संत्यजेत् ।
ततश्च पोटलीं कुर्यात् प्रयत्नेन ततः परम् ॥ २४ ॥
वेष्टयित्वा पुनः सूदः कुर्याच्छैत्यं च पूर्ववत् ।
मुक्तं च जीर्ण समया लघु वृष्यो बलप्रदः ॥ २५ ॥
पाक को जानने वाला पाचक क्रमशः उन पात्रस्थ पूगपट्ट नेत्रों में सामुद्र
फल छोड़ दे । कुछ पात्रों में आम के टुकड़े तथा उनके फूल छोड़ दे । कुछ
पात्रों में मरिच के गुच्छे तथा चमेली का फूल छोड़ दे । कुछ पात्रों में नारंगी
का फूल तथा बेल का फल छोड़ दे । कुछ पात्रों में कल्हार (कुई) का
फूल तथा सारंग (कमल) का फल छोड़ दे । कुछ पात्रों में इलायची का
गुच्छा तथा हेम पुष्प (नागकेशर) छोड़ दे । इसी प्रकार विभिन्न पुष्पों एवं


पृष्ठ ९५

समुद्र फल को छोड़ दे । इस प्रकार बुद्धिमान् पाचक पूर्वोक्त प्रकार से पुष्प एवं
फलों को मिला कर अनेक प्रकार के यूष बना ले । पुनः पुष्पों को कुछ देर
रहने के बाद निकाल कर फेंक दे । इसके बाद प्रयत्नपूर्वक पोटली बनावे और
उसको वेष्टित कर पूर्वोक्त प्रकार से ताल एवं खस आदि के पंखों से हवा कर
शीतल बना ले । यह भोजन के साथ खाने से अन्न को पचाता है और यह वीर्य-
वर्द्धक, सुपच तथा बलकारक होता है ॥ २०-२५ ॥

यूषपाकस्योपसंहारः

नानाविधद्रव्यफलप्रसूनैरुत्पादिताथैः खलु कल्पवृक्षः ।
श्रमान्वितानां श्रमन्नुत्सुसेव्यः सुपूजितः सर्वमनोभिरामः ॥ २६ ॥
सयूषभेदाः कथिता भोजनानन्ददाः शुभाः ।
घृताद्यंशप्रभेदाश्च कथ्यन्ते रुचिमर्दनाः ॥ २७ ॥
इति नलकृतपाकदर्पणे यूषपाकनाम षष्ठप्रकरणं समाप्तम् ॥ ६ ॥
**यूषपाक का उपसंहार—**यह अनेक प्रकार के द्रव्यों, फल एवं पुष्पों के द्वारा
निर्मित यूष कल्पवृक्ष की तरह श्रमिकों के श्रम (थकावट) को दूर करने वाला
अच्छी तरह सेवनयोग्य प्रशंसित एवं सभीके मन को प्रसन्न करनेवाला है । भोजन
के समय आनन्द देनेवाले यूष के अनेक भेद कहे गये । अब अरुचि को नष्ट करने
वाले अनेक प्रकार के घृतभेद को कहेंगे ॥ २६-२७ ॥
**नोट—**आजकल भी विविध प्रकार के सेन्ट भोजन में मिलाने की परम्परा है ।
प्राचीन काल में सेन्ट का प्रादुर्भाव न होने कारण पुष्प छोड़ने की परम्परा थी ।
इति नलकृत पाकदर्पण का डा० इन्द्रदेव त्रिपाठीकृत माधुरी हिन्दी व्याख्या
सहित यूषनिरूपण नामक षष्ठ प्रकरण समाप्त ॥ ६ ॥

अथ घृतान्नपाकप्रकरणम्
घृतान्नपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
सुपक्वं राजशाल्यन्नमानीय सुमनोहरम् ।
विशालविभ्रमे देशे पात्रेषु विविधेष्वथ ॥ १ ॥
स्थितेषु सर्वपात्रेषु क्षिपेदन्येन सैन्धवम् ।
हैयङ्गवीनमेकस्मिन् सिञ्चेत्पात्रे सुसंयुते ॥ २ ॥
क्षिपेच्चूर्णं पुनस्तत्र दग्धपर्पटकस्य च ।
निक्षिपेच्च ततस्तत्र लशुनाद्रॅकयोः कणान् ॥ ३ ॥
चूर्णं च निविशेत् किंचित् मेथीजोरकसम्भवम् ।
कुस्तुंबरीञ्च कैटर्यं केतकीकुसुमं न्यसेत् ॥ ४ ॥
बीजपूरदलं तत्र निक्षिपेत्सूपराट् ततः ।
एभिर्द्रव्यैर्भोजनस्थमन्नं कुर्याच्च मेलनम् ॥ ५ ॥
पुनश्च निक्षिपेत्तत्र कस्तूरीं कर्पूरीं तथा ।
पुनश्च पूगपट्टे न बद्ध्वा भोक्त्रे निवेदयेत् ॥ ६ ॥
घृतमन्नमिदं रम्यं बलवृद्धिकरं भवेत् ।
हृद्यं पित्तहरं नित्यं चक्षुरिन्द्रियवर्धनम् ॥ ७ ॥
घृतान्न पाक बनाने की विधि तथा गुण—अच्छी तरह परिपक्व, मनोहर
राज शाल्यन्न (जड़हन का पूर्वोक्त विधि से निर्मित भात ) को लेकर विस्तृत स्थान
में विविध सभी पात्रों में रखे हुए अन्न में सेन्धा नमक छोड़े और उसी के साथ
रखे हुए एक पात्र में घी छोड़ दे। पुन: भूने हुए पापड़ को रख दे। पुन:
उसमें लहसुन तथा अदरक के टुकड़ों को छोड़े । उसी में थोड़ा मेथी तथा
जीरा का चूर्ण छोड़ दे। पुन: धनिया, कायफर तथा केवड़ा के फल को छोड़ दे ।
इसके बाद बिजौरा नींबू के फल के दल को श्रेष्ठ पाचक छोड़ दे । इस प्रकार
पात्र में स्थित अन्न को पूर्वोक्त द्रव्यों के साथ मिला दे और पुन: उसमें कस्तूरी
तथा कर्पूर छोड़ दे । तदनन्तर पूगपट्ट से बाँधकर खाने वाले को दे । यह घृतान्न
रम्य, बलवृद्धिकारक हृद्य पित्तहर तथा, दृष्टिशक्ति को बढ़ाने वाला है ॥ १-७ ॥
अन्य घृतान्ननिर्माणविधिर्गुणाश्च
अन्यस्मिन्नपि पात्रस्थे शाल्यन्नेषु सुसंयुते ।
तिलतैलं नवं रम्यं सिञ्चेत्सूपदः समं ततः ॥ ८ ॥


नलविरचितम् ९७
जम्बीराम्लं ततस्तत्र प्रमाणेन प्रसेचयेत् ।
चूर्णञ्च निक्षिपेत्तत्र पिण्याकवटकोग्द्भवम् ॥ ९ ॥
लशुनाद्रेककैंडर्यधान्यकानां क्षिपेत्कणान् ।
तप्ततैलं पुनस्तत्र हिंगुना सहितं क्षिपेत् ॥ १० ॥
कृत्वा तन्मेलनं तत्र कर्पूरादींश्च निक्षिपेत् ।
तद्बद्ध्वा पूगनेत्रेण निवेशेदपरस्थले ॥ ११ ॥
बलकृद्दीपनकरं वातश्लेष्महरं तथा ।
प्रकारान्तर से घृतान्न बनाने की विधि तथा गुण—अन्य प्रकार से घृतान्न
बनाने के लिये अन्य पात्रों में स्थित शाल्यन्नों में पाचक सुन्दर, रमणीय, नवीन
तिल का तेल मिला दे । इसके बाद उचित मात्रा में जम्बीरी नींबू का रस (सत्व)
छोड़ दे । पुनः तिल के खली के वटक चूर्ण को उसमें मिला दे और लहसुन,
अदरक, कैडर्य ( कायफल ) तथा धनियां के चूर्ण को मिला दे । पुन: गरम
तेल में हींग पका कर छोड़ दे । इन सबों को एकत्र कर कर्पूर आदि सुगन्धित
द्रव्यों से सुगन्धित बना ले । पुनः उसको पूगपट्ट नेत्र से बाँधकर दूसरे स्थान
पर रख दे और खाने के लिये दे । यह बलवर्द्धक, जाठराग्निदीपक तथा वात-
कफ को दूर करता है ॥ ८-११ ॥
चिञ्चाफलरसयुक्तशाल्यन्नपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
अथ चिञ्चा पक्वफलसमुद्भूतरसं हरेत् ॥ १२ ॥
शालिन्या तं पुनः सम्यग् भर्जयेद्रामठादिभिः ।
अन्यस्मिन् नवशाल्यन्ने निक्षिपेत्तादृशं रसम् ॥ १३ ॥
कणांश्च निक्षिपेत्तत्र लशुनाद्रेकसम्भवान् ।
तदेभिर्मेलयेत्सर्वं वासनादीन् समावेशेत् ॥ १४ ॥
पूगपट्टे न तद्भक्तं वेष्टयित्वा च दापयेत् ।
पित्तवृद्धिकरो रुच्यः शूलव्याधिहरो ह्ययम् ॥ १५ ॥
इमली फल के रस से मिश्रित शाल्यन्न बनाने की विधि तथा गुण—इमली
के पके फल का रस निकाल ले । पुनः शालि धान के चावल के साथ अच्छी
तरह हींग के साथ भून ले । दूसरे नवीन शाल्यन्न में पूर्वोक्त इमली के रस को
छोड़ दे और लहसुन तथा अदरक के टुकड़ों को छोड़ दे । इसके बाद सभी को
एकत्र मिला दे तथा सुगन्धित द्रव्यों से सुगन्धित कर ले । तदनन्तर उस भात को
पूगपट्ट से वेष्टित कर खाने के लिये दे । यह पित्त को बढ़ाने वाला, रुचिकारक
तथा शूल एवं व्याधि को दूर करता है ॥ १२-१५ ॥

९८ पाकदर्पणम्
कैटर्यकल्कयुक्तशाल्यन्ननिर्माणविधिर्गुणाश्च
कैटर्यकल्कमन्यस्मिन्नन्ने निक्षिप्य मेलयेत् ।
भर्जितं रामठं तैले निक्षिपेद्रामठादिकम् ॥ १६ ॥
कर्पूरादींश्च निक्षिप्य नेत्रेण परिवेष्टयेत् ।
स्तन्यप्रदं क्रिमिहरं श्लेष्मदोषहरं भवेत् ॥ १७ ॥
कैटर्य कल्क के साथ शाल्यन्न बनाने की विधि तथा गुण - दूसरे शाल्यन्न
पात्र में कैटर्य ( कायफल ) का कल्क छोड़ कर तेल में भूने हुए हींग को मिला
दे और कर्पूर आदि सुगन्धित द्रव्यों से सुवासित कर तथा पूगपट्ट नेत्र से वेष्टित
कर खाने को दे । यह स्तन्यवर्द्धक, क्रिमिनाशक तथा कफ-विकार को नाश
करने वाला है ॥ १६-१७ ॥
सर्षपकल्कयुक्तशाल्यन्ननिर्माणविधिर्गुणाश्च
सर्षपोद्भवकल्केन मिलदन्नं कुर्याद्बुधः ।
जम्बीराम्लं यथायोग्यं निक्षिपेद्रामठादिभिः ॥ १८ ॥
कृत्वा च वासनादींश्च बद्ध्वा नेत्रेण दापयेत् ।
हिंगुमुष्णकरं भक्तं तथा छर्दिहरं भवेत् ॥ १९ ॥
सरसों के कल्क के साथ शाल्यन्न बनाने की विधि तथा गुण - पाकक्रिया
को जानने वाला बुद्धिमान् पाचक सरसों के कल्क के साथ शाल्यन्न को बनावे और
उचित मात्रा में जम्बीरी नींबू का रस ( या सत्व ) एवं भूने हुए ( तैलभृष्ट ) हींग
जीरा आदि छोड़ दे । कर्पूर आदि सुगन्धित द्रव्यों से सुवासित कर तथा पूगपट्ट
नेत्र से वेष्टित कर खाने के लिये दे । यह हिंगुयुक्त अन्न उष्णकारक होता है
तथा वमन को दूर करता है ॥ १८-१९ ॥
एवमादीनि भक्तानि तत्तद्द्रव्यैश्च साधयेत् ।
बहूनामन्नभेदानां स्वं स्वं तत्तद्गुणं भवेत् ॥ २० ॥
पूर्वोक्त प्रकार से भिन्न-भिन्न द्रव्यों के साथ अनेक प्रकार के भातों को सिद्ध
करे । वे सब अपने-अपने द्रव्यों के गुण के अनुसार गुणकारक होते हैं।
दधियुक्तशाल्यन्ननिर्माणप्रकारोगुणाश्च
अपरे सूदराड्भक्ते निक्षिपेन्मधुरं दधि ।
सहकारकणांस्तत्र लशुनादींश्च निक्षिपेत ॥ २१ ॥
शीतोष्णकणांस्तत्र शुंठीचूर्णं च निक्षिपेत ।
निस्त्वगाद्रंककैटर्यधान्याकशकलान्यपि ॥ २२ ॥
नलविरचितम् ९९
एतत्सर्वं विनिक्षिप्य कुर्यात्तन्मेलनं बुधः ।
पुनश्च निक्षिपेत्तत्र चूर्णमेलासमुद्भवम् ॥ २३ ॥
बीजपूरदलं तत्र केतकी कुसुमं न्यसेत् ।
कर्पूरादींश्च निक्षिप्य वेष्टयित्वा प्रदापयेत् ॥ २४ ॥
इदं जाड्यहरं रुच्यं वह्निमान्द्यहरं भवेत् ॥ २५ ॥
दधिमिश्रित शाल्यन्न का प्रकार तथा गुण - श्रेष्ठ पाचक दूसरे भात में
मीठा दही छोड़ दे और उसमें आम के टुकड़े तथा लहसुन के टुकड़े छोड़ दे ।
पुनः शीतल मरिच, सोंठ का चूर्ण, छिलका रहित अदरक के टुकड़े, कैटर्य तथा
धनिया के टुकड़ों को भी छोड़ दे । इन सब द्रव्यों को छोड़ कर मिला दे । पुनः
उसमें बिजौरा नींबू का रस तथा केतकी के पुष्प को छोड़ दे । इसके बाद कर्पूर
आदि सुगन्धित द्रव्यों से सुवासित कर तथा पूगपट्ट नेत्र से आवेष्टित कर खाने के
लिये दे । यह जड़ता को दूर करने वाला रुचिकारक तथा मन्दाग्नि को दूर करने
वाला है ॥ २१-२५ ॥
उपसंहारः
स्वैरप्रभेदाकृतिरन्नरूपा धेनुर्धरित्र्यां प्रवदन्ति भूरि ।
पयांसि सम्यग्रसनान्नपाने सदा दुदोहार्थिषु सादरेण ॥ २६ ॥
इति नलकृतपाकदर्पणे घृतान्ननिरूपणं नाम सप्तमप्रकरणं समाप्तम् ॥ ७ ॥
घृतशाल्यन्न प्रकरण का उपसंहार - इस पृथ्वी पर अपनी इच्छा के अनुसार
निर्मित विभिन्न आकृति वाली बहुत से अन्नरूप धेनु को बताते हैं । उस धेनु के
दूध को चाहनेवालों के जिह्वा की तृप्ति के लिये अन्नपान को सदा आदर पूर्वक
दुहते हैं ।
इति नलकृत पाकदर्पण का डा० इन्द्रदेव त्रिपाठीकृत माधुरी हिन्दी व्याख्या-
सहित घृतान्ननिरूपण नामक सप्तम प्रकरण समाप्त ॥ ७ ॥
च पा.द.

अथ लेह्यप्रकरणम्
सहकारादिलेह्यनिर्माणप्रकारोगुणश्च
सुपक्वफलसंदोहं सहकारादिसम्भवम् ।
आनीय सूदः शास्त्रज्ञः क्रिमिभ्यः शोधयेत् पृथक् ॥ १ ॥
भर्जयेच्च पुनस्तानि पृथक् शर्करया सह ।
तदुत्थमाहरेद्द्रव्यं त्वग्बीजानि समुत्सृजेत् ॥ २ ॥
द्रव्ये तस्मिन् घनीभूते सिञ्चेत्किञ्चिज्जलंततः ।
द्रव्यञ्च सूक्ष्मवस्त्रेण यावल्लेह्यं तु शोधयेत् ॥ ३ ॥
आनयेत् पूगपट्टस्य नेत्राण्यथ शुभानि च।
अनेकेषु च पात्रेषु मध्ये तेषु पुनर्न्यसेत् ॥ ४ ॥
लेह्यं चाङ्गुलिकं तेषु निक्षिपेच्च पृथक् पृथक् ।
ततश्च घनसारादि कल्कं तेषु च मेलयेत् ॥ ५ ॥
विचित्रवासनापुष्पैः लेह्यं सम्यक् च वासयेत् ।
ततः पुष्पाणि संत्यज्य सहकुर्याच्च पोटलीः ॥ ६ ॥
पूर्ववत्स्थापन

अथ शैत्यजलनिर्माणप्रकरणम्
शैत्यजलनिर्माणप्रकारो गुणाश्च
नुदलाबुफले सूक्ष्मं यत्नेन च जलं शुभम् ।
आनीय गाङ्गमुरंसि शुभ्रवस्त्रेण शोधयेत् ॥ १ ॥
पूरयेच्च शुभे कुम्भे तप्तस्वर्णविनिर्मिते ।
कल्कमालोडयेत्तत्र कर्पूरादि प्रमाणवित् ॥ २ ॥
विस्तृते पूगपट्टे च तज्जलं वेष्टयेत्ततः ।
कारयेत्प्रांशुतरुभिः दोलां सम्यक्प्रमाणवित् ॥ ३ ॥
सिक्थं च स्थापयेत्तत्र शुभ्रद्रव्यंविनिर्मितम् ।
सूदस्तु निःक्षिपेत्तत्र पोटलीं जलपूरिते ॥ ४ ॥
एकं सूत्रं ततः कुर्यात् एकनिष्कप्रमाणकम् ।
रुचकस्य मुखं तस्य वेष्टयेदग्रभागतः ॥ ५ ॥
मूलदेशे पुनस्तस्य शकलान् सन्निवेशयेत् ।
स्रजश्च तत्र बघ्नीयाज्जातीचम्पकनिर्मिता ॥ ६ ॥
सूक्ष्मरन्ध्रं ततः कुर्यादधस्तस्याः प्रमाणवित् ।
सूत्रस्थितशलाकायाः कुर्यात्सरन्ध्रशृङ्खलम् ॥ ७ ॥
शनैः शनैर्जलं तत्र यथा स्रवति विन्यसेत् ।
विना वस्त्रेण तस्याधो हेमभाण्डं विनिक्षिपेत् ॥ ८ ॥
तस्मिन् पाटलिजात्यादि प्रसूननि न्यसेद्बुधः ।
हिमाम्बुनाऽऽर्द्रवस्त्रेण तन्मुखं वेष्टयेद्बुधः ॥ ९ ॥
जलं स्रवति निःशेषमुदरस्थे व्यवस्थिते ।
शीतल जल बनाने का प्रकार तथा गुण — नवीन कद्दू के फल में प्रयत्न-
पूर्वक सूक्ष्म, स्वच्छ गंगा जल को लेकर स्वच्छ वस्त्र से छान ले और चमकीले
स्वर्णनिर्मित घड़े में भर दे । पुनः प्रमाण को जानने वाला पाचक उसमें कर्पूर
आदि सुगन्धित द्रव्यों का कल्क छोड़ दे । उसके बाद उस जल को विस्तृत
पूगपट्ट में आवेष्टित कर दे और प्रांशुवृक्षों के साथ प्रमाण को जानने वाला
पाचक अच्छी तरह दोला (झूला) बनाये । वहीं पर अच्छे द्रव्यों से निर्मित
सिक्थ (मोतियों का गुच्छा) रखे । पुनः पाचक उस जलपूरित घड़े में
पोटली छोड़ दे । इसके बाद एक निष्क प्रमाण का एक सूत्र बनाये और उससे
नलविरचितम् १०३
घड़े के आगे के चारों तरफ के भाग को आवेष्टित कर दे । पुनः उसके नीचे
टुकड़ों को रख दे तथा उसमें चमेली आदि सुगन्धित पुष्पों की माला बाँध दे ।
प्रमाण को जानने वाला उसके नीचे छोटा-छोटा छिद्र बना दे । सूत्र में स्थित
शलाका से अच्छे छिद्रों की शृङ्खला बना दे । उसमें जैसे धीरे-धीरे जल गिरे वैसे
रक्खे और उसके नीचे बिना वस्त्र का सोने का पात्र रख ले और उस में पाटिल,
चमेली आदि का फूल रख दे । पुनः ठण्डा जल से भीगे हुए वस्त्र से उसके मुख
को आवेष्टित कर दे । सुव्यवस्थित उसके अन्दर पूरा जल स्रवित हो जाता है ।
घटान्तरं न्यसेत्सूदो बालुकावेदिकां ततः ॥ १० ॥
स्रग्भिः समन्ततो युक्तां दक्षिणाानलसंयुताम् ।
तालवृन्तानिलैः सम्यक् शैत्यं कुर्याच्च तज्जलम् ॥ ११ ॥
अन्यस्मिन् पूगपट्टे च नानापुष्पैश्च वासिते ।
पूरयित्वा तु तत्तोयं प्रसूनानि च संत्यजेत् ॥ १२ ॥
न्यसेत् पोटलीं कृत्वा पात्रे सुजलपूरिते ।
तालवृन्तानिलैः सम्यक् कुर्याच्छैत्यतमं सुधीः ॥ १३ ॥
पानीयमीदृशं ग्रीष्मे कर्त्तव्यं मनुजेश्वर ! ।
पीपासां शमयेत्सम्यक् पिपासूनां श्रमं हरेत् ॥ १४ ॥
विधूमं जरयत्याशु भक्ष्यादीनां तथैव च।
पुनः पाचक दूसरा घड़ा लाये और उसको बालू की वेदी पर रक्खे । तदनन्तर
उसको दक्षिणी हवा के सम्मुख कर चारो तरफ से मालाएँ लगा दे और ताल
पंखा की हवा से इस जल को अच्छी तरह शीतल करे । अनेक पुष्पों से सुवा-
सित दूसरे पूगपट्ट में उस जल को भर कर फूलों को फेंक दे । पुष्प की पोटली
बनाकर स्वच्छ जल में रक्खे और बुद्धिमान् पाचक ताल पंखा की हवा से
शीतल बना ले । हे राजन् ! इस प्रकार का शीतल जल ग्रीष्म-ऋतु में बनावे ।
यह जल प्यासे व्यक्तियों की प्यास तथा थकावट को दूर करता है और भोजन
आदि के बिना पचे अन्न को पचाता है ॥ १०-१४ ॥
राज्ञः ऊषरजलस्वादुकरणविषयकः प्रश्नः
ऊषरक्षेत्रजातानां जलानां स्वादुवर्जितम् ॥ १५ ॥
स्वादुत्वं कथमापन्नमस्माकं वद बाहुक ! ।
राजा के ऊषर क्षेत्र के जल को स्वादिष्ट बनाने के सम्बन्ध में प्रश्न — हे
बाहुक ! मधुरता से रहित ऊषर स्थान पर उत्पन्न हम लोगों का जल कैसे स्वादिष्ट
हो जाता है इस को बतावें ॥ १५ ॥

१०४ पाकदर्पणम्
बाहुकेन ऊषरजलस्वादुनिर्माणप्रकारनिरूपणम्
विचित्रं शृणु भूपाल ! प्रयोगं किल साम्प्रतम् ॥ १६ ॥
अष्टाद्विगुणितं तोयं कषायेण समन्वितम् ।
एकेन शोणवर्णेन मृद्भाण्डेन विलोडयेत् ॥ १७ ॥
तत्तादृशं पचेत्सम्यक् आकषायविमोचनात् ।
कथं भवति पाकेन कषायगुणमोचनम् ॥ १८ ॥
किन्तु पाकविशेषेण द्रव्ययुक्तेन तद्भवेत् ।
यस्मादुत्पद्यते दोषस्तेनानेन प्रणश्यति ॥ १९ ॥
मृद्योगेन च सम्भूतो मृद्विशेषेण नश्यति ।
नल के द्वारा ऊषर जल स्वादिष्ट बनाने का प्रकार निरूपण — नल ने राजा
ऋतुपर्ण से कहा कि हे राजन् ! ऊषर जल को स्वादिष्ट बनाने का विचित्र प्रयोग
सुने । कषाय से युक्त अठारह गुना जल को एक शोणवर्ण (लाल वर्ण) के मिट्टी
के घड़े में मिलाये और उसको इस प्रकार तब तक पकाये जब तक कि उसका कषाय
गुण नष्ट न हो जाय । पकाने से कषाय गुण से मुक्ति कैसे सम्भव है ? किन्तु पाक
की विशेषता तथा विशिष्ट द्रव्यों के संयोग से यह सम्भव है । जिससे दोष
उत्पन्न होता है वह इस विधि से कषाय दोष नष्ट हो जाता है । मिट्टी के संयोग
से उत्पन्न दोष विशेष मिट्टी के संयोग से नष्ट हो जाता है ॥ १६-१९½ ॥
अतो मृदस्य सहजो दोषो नास्ति नराधिप ! ॥ २० ॥
तप्तं पयश्च विशमेत् तत्र कुर्यादनाविलम् ।
अनाविलं जलं भूयः पात्रेऽन्यस्मिन् प्रपूरयेत् ॥ २१ ॥
कल्कं कतकबोजस्य भाण्डेऽम्भसि समाविशेत् ।
तत्तादृशं सटीसान्द्रे तथा मण्डं विशोधयेत् ॥ २२ ॥
निःक्षिपेत्तत्र रम्याणि जात्यादिकुसुमानि च ।
हे राजन् ! इस प्रकार मिट्टी का कोई स्वाभाविक दोष नहीं है । गरम जल
जब शीतल हो जाय तब मिट्टी निकाल दे और उस अनाविल जल को दूसरे पात्र
में भर दे । इसके बाद निर्मली (रीठा) के बीज का कल्क उस जलपूर्ण पात्र
में छोड़ दे । वह घनी पोटली में बांधकर घुमाने से मण्ड (पंक) का शोधन हो
जाता है । इसके बाद उसमें सुगन्धित एवं रमणीय चमेली आदि के पुष्प को
छोड़ दे ॥ २०-२२ ॥
यस्मिन् देशे प्रसूनानि नास्ति तत्र कथं भवेत् ॥ २३ ॥


नलविरचितम् १०५
राजा ऋतुपर्ण ने नल से पूछा कि जिस देश में पुष्प न मिले वहाँ पर कैसे
जल को सुगन्धित किया जाय ॥ २३ ॥
उपायस्तन्त्ररूपोऽत्र सूक्ष्मोऽस्ति सुदुर्लभम् ।
यस्मिन् सन्ति प्रसूनानि देशे काले च बुद्धिमान् ॥ २४ ॥
तस्मिंस्तदा हि संगृह्य संगृही नावसीदति ।
तं प्रकाशमहं वच्मि शृणु भूपालसत्तम ! ॥ २५ ॥
हे राजन् ! जहाँ जिस देश में पुष्प नहीं हैं वहाँ के लिये देवताओं को भी
दुर्लभ, सूक्ष्म एवं तन्त्र रूप में उपाय है ।¹ बुद्धिमान् व्यक्ति जिस देश एवं काल
में पुष्प नहीं होते हैं उस समय पहले से ही पुष्पों का संग्रह कर ले । संग्रह करने
वाला व्यक्ति दुःखी नहीं होता । हे राजन् ! उसको हम अच्छी तरह समझा
कर कह रहे हैं ॥ २४-२५ ॥
प्रसूनाभावे देशे काले च तन्त्ररूपेण सुवासनाविधिः
अपक्वभाण्डमानीय कुम्भकारगृहान्नवम् ।
कल्केन घनसारादिसम्भवेन सुगन्धिना ॥ २६ ॥
अन्तर्बहिश्च तस्यापि लेपयेच्च समन्ततः ।
आतपेन विना कुर्यात् च्छायाशुष्कं पुनः पुनः ॥ २७ ॥
दिनेष्वेवं बहुषु कुर्यात्तत्र प्रयत्नतः ।
तथाविधं च तं भाण्डं छिन्द्यान्निष्पावमानतः ॥ २८ ॥
फलेन निर्मितं पात्रं नारिकेलस्य मानवित् ।
भावयेद्बहुभिः पुष्पैः घनसारादिना बहु ॥ २९ ॥
पुराणानि च पुष्पाणि प्रसूनानि नवानि च ।
पक्त्वा च पूरयित्वा च मासमेकं पुनः पुनः ॥ ३० ॥
पूरयेत्तादृशान् तस्मिन् वटकान् घटसम्भवान् ।
तस्मिंश्च घटखण्डानि पूरयेत्तानि गोपयेत् ॥ ३१ ॥
प्रसूनाभावदेशे च खण्डानेतान् घटोद्भवान् ।
पाने तक्रे च मूषादिवस्तुष्वेतान् प्रतिक्षिपेत् ॥ ३२ ॥
भवेयुस्तानि तान्येव तत्तद्गुणयुतानि च ।
तोरेषु घटखण्डानि तादृशानि विनिक्षिपेत् ॥ ३३ ॥
१. तन्त्र रूप से आज कल पुष्पों का सेन्ट एवं एसेन्स आदि का प्रयोग
होता है । प्राचीन काल में सुगन्धित बनाने की तन्त्ररूप प्रक्रिया का
आगे निरूपण है ।

पृष्ठ १०६

१०६ पाकदर्पणम्
प्रसूनाभावे देशे च कर्त्तव्योऽयं मनीषिभिः ।
पुष्परहित देश तथा काल में जल सुवासित करने की विधि—कुम्भकार
(कोहार) के घर से नवीन कच्चा घड़ा लाकर कर्पूर-कस्तूरी आदि सुगन्धित
द्रव्यों के कल्क से बाहर-भीतर बराबर-बराबर लेप करे और इसके बाद
छाया में सुखा ले । इस प्रकार बार-बार प्रयत्नपूर्वक कई दिन तक करे । इस
प्रकार सुगन्धित उस पात्र के निष्पाव (मटर) के बराबर टुकड़े बनाकर
नारियल के फल से निर्मित पात्र में प्रमाण को जाननेवाला पाचक बहुत से
पुष्प एवं कर्पूर आदि द्रव्यों से अनेक बार भावित कर ले । पुराने पुष्प तथा
नवीन पुष्पों को पकाकर तथा भर कर एक माह तक बार-बार घड़े के बनाये
उन वटकों को उस भाण्ड में भर दे । उन घड़े के टुकड़ों को भर कर गुप्त
स्थान में रख दे । जहाँ पर पुष्प नहीं होते हैं उन देशों में इन घड़े के टुकड़ों
को पीने के पानी में तथा तक्र (मट्ठा) में प्रयोग करे और घड़ा आदि
में मिला दे । वे जिन-जिन पुष्पों से भावित घड़े के टुकड़े होंगे उन-उन पुष्पों
के गुण के अनुसार गुण होंगे । इस प्रकार के घड़े के टुकड़ों को जल में छोड़े ।
विद्वान् लोग पुष्परहित देश में जल को सुगन्धित बनाने के लिये इस विधि का
प्रयोग करें ॥ २६-३३ ॥
एवं प्रसाद्य पानीयं पिपासूंश्च प्रदापयेत् ॥ ३४ ॥
इदं पित्तहरं पथ्यं श्रमजिद् बलवर्धनम् ।
पूर्वोक्त प्रकार से जल को शुद्ध कर प्यासे व्यक्ति को दे । यह जल पित्त को
दूर करता है, पथ्य है, थकावट को दूर करता है तथा बल को बढ़ाता है ॥३४॥
जलशैत्यीकरणे वादिप्रतिवादिनोरुक्तिः
एवमादि विचित्राणि सन्ति मध्येऽत्र भूमिषु ॥ ३५ ॥
पानीयविषये वादो वादिना प्रस्तुते सति ।
तयोरन्यं वदत्येकः शृणु मे वचनं परम् ॥
स्वभावशीतलं वारि कुरुते शीतलाधिकम् ॥ ३६ ॥
सिकता वेदिकायां च तालवृन्तसमीरणैः ।
पाटल्यादिप्रसूनैश्च वासनां कुरुते जले ॥ ३७ ॥
एवं तु घनशारेण विना बालुकवेदिकाम् ।
विना पुष्पैर्विना शैत्यैस्तालवृन्तानिलान् विना ॥ ३८ ॥
उष्मवारिक्षयेनैव कुरु शैत्ये च वासितम् ।
इति पानीयविषये वादिन्यतिवदत्यपि ॥ ३९ ॥


पृष्ठ १०७

नलविरचितम् १०७
क उपायो महानास्ते लघुर्बाहुक मे वद ।
जल के शीतल करने के सम्बन्ध में वादी तथा प्रतिवादी का कथन—इस
प्रकार पृथ्वी के ऊपर बीच-बीच में जल को शीतल करने के लिए विचित्र-विचित्र
साधन हैं । पानी के विषय में वादी के द्वारा वाद प्रस्तुत करने पर दोनों में से
एक ने जो कहा उसको सुनें । हे बाहुक ! स्वभाव से ही शीतल जल को अधिक
शीतल क्यों बनाते हैं । बालू की वेदी पर ताड़ के पंखा के हवा से तथा पाटल
आदि के पुष्प से जल को सुगन्धित करते हैं। इस प्रकार बिना कर्पूर की वासना
बालुका वेदी के बिना, पुष्पों के बिना तथा ताड़ के पंखा के बिना उष्ण
जल के क्षय से ही शीतल तथा सुवासित करे । इस प्रकार यदि वादी कहे तो
कौन सा उत्तम उपाय है जो हल्का हो उसे मुझसे कहो ॥ ३२-३८ ॥
राज्ञश्च वचनं श्रुत्वा तथेत्युत्तरमब्रवीत् ॥ ४० ॥
लघूपायं महद्वच्मि श्रूयनामत्र भूमिप ।
यदातपे हि तद्वस्त्रं शान्तं कुर्यात्प्रयत्नतः ॥ ४१ ॥
सुगन्धगुणसंयुक्तै बहुपुष्पैश्च वासिते ।
नव कुम्भे च तद्वस्त्रं सम्यङ्निक्षिप्य गोपयेत् ॥ ४२ ॥
राजा के वचन को सुनकर वैसा ही कहूँगा यह कहकर बोले कि हे राजन् !
सरल तथा उत्तम उपाय को कहता हूँ, सुनें । जो वस्त्र धूप में सुवासित कर
सुखाया गया है उसको प्रयत्न पूर्वक शीतल करे और सुगन्धित द्रव्यों से सुगन्धित
तथा अनेक पुष्पों से सुवासित नवीन घड़े में अच्छी तरह रखकर बन्द कर
रख दे ॥ ३७-४२ ॥
ईदृशस्तु यदा वादः सम्प्राप्तः सूदराट् तदा ।
शैत्योदकं तदा वादो दत्वा तु प्रातवादितः ॥ ४३ ॥
वादं कुरु बलस्याय यावच्छेत्यादिमेलनम् ।
तावत्करोम्यहं सम्यक् पथ्यं वैचित्र्यमुत्तमम् ॥ ४४ ॥
इस प्रकार का जब वाद-विवाद उपस्थित हुआ तब पाचक वादी प्रतिवादी
को शीतल जल देकर बोला कि जब तक शीतलता आदि का मिलान विषय का
वाद-विवाद करे तब तक मैं जलशीतल विषयक उत्तम विचित्र प्रकार को करता हूँ,
आप देखें ॥ ४३-४४ ॥
इत्युक्त्वा सूदराडाशु सुतप्तं जलमग्रहीत् ।
तस्मिन्नम्भसि तद्वस्त्रं प्रयत्नेन निमज्जयेत् ॥ ४५ ॥

१०८ पाकदर्पणम्
यस्याञ्चलानि चत्वारि वादिवारणकेशरी ।
चतुर्भिः पुरुषैराशु ग्राहयेद्वारिमण्डपे ॥ ६४ ॥
पीडयित्वा तु तद्वस्त्रं जलमादाय सूदराट् ।
इदमेतावता चोष्णं मज्जयेत्तज्जलं गुणैः ॥ ४७ ॥
अतस्तु वादी जयति प्रतिवादी गजांकुशः ।
इदं स्वादुतरं पथ्यं वातश्लेष्महरं भवेत् ॥ ४८ ॥
पाचक जल को ठण्डा करने के लिए सरल उपाय को बताते हुए उपरोक्त
बातों को कह कर शीघ्र ही संतप्त जल को ग्रहण कर उस जल में पूर्वोक्त सुवा-
सित वस्त्र को भिगो दे । इसके बाद प्रतिवादी चार पुरुषों के द्वारा चारों
अञ्चलों को जलमण्डप में ग्रहण कराये। पुनः उस वस्त्र को निचोड़ कर
उस उष्ण जल को उसके गुणों के साथ डुबा दे । अतः वादी तथा प्रतिवादी
गजांकुश की जीत है। यह जल स्वादिष्ट पथ्य तथा वात एवं कफ-नाशक
होता है ॥ ४५-४८ ॥
जलशैत्यकरणप्रकरणस्योपसंहारः
पानीयमेतादृशमन्यपूर्णमनेकजन्मान्तरितं हिताय ।
सम्पाद्य यत्नेन पिबेच्च यो वा स चोत्तमः पुण्यजनेषु मध्ये ॥४९॥
इति नलकृतपाकदर्पणे शैत्यजलनिरूपणं नाम नवमप्रकरणं समाप्तम् ॥ ९ ॥
जल शीतल करनेवाले प्रकरण का उपसंहार -- दूसरों से न पूर्ण होनेवाले
अनेक जन्मों के बीच का ऐसा जल हित के लिये प्रयत्न पूर्वक बनाकर जो पीता है
वह पुण्यजनों के मध्य में उत्तम है ॥ ४९ ॥
इति नलकृत पाकदर्पण का डा० इन्द्रदेव त्रिपाठीकृत माधुरी हिन्दी व्याख्या
सहित स्वच्छशैत्यजल निरूपण नामक नवम प्रकरण समाप्त ॥ ९ ॥


अथ क्षीरादिपाकनिरूपणप्रकरणम्
क्षीरपाकनिर्माणप्रकारः
सर्वपायसभेदानां कथितानां निदानके ।
करिष्यमाण दध्यादि कार्याणां मूलकारणम् ॥ १ ॥
अतोऽत्र कथ्यते सम्यक् क्षीरपाकमनुत्तमम् ।
क्षीरपाक बनाने का प्रकार — पहले सभी प्रकार के पायस आदि के भेदों
को कहा गया । अतः अब यहाँ किये जानेवाले दही आदि पदार्थों के आदि कारण
उत्तम क्षीरपाक को कहते हैं ॥ १ ॥
क्षीरपाकनिर्माणविधिः
महिष्याः सम्भवं क्षीरं सावधानः समाहरेत् ॥ २ ॥
तदादाय शुभे भाण्डे निदध्यात् सूदकोविदः ।
गाङ्गं जलं च ललितं पूरयेदपरे घटे ॥ ३ ॥
वासयेत्तज्जलं पुष्पैर्नाना परिम्लान्वितैः ।
मुहूर्तमेकमालोक्य तानि पुष्पाणि संत्यजेत् ॥ ४ ॥
क्षीरं जलं समं कृत्वा क्षीरभाण्डे पचेद्बुधः ।
त्रिनिष्कमानमुक्तानि प्रत्येकं तत्र मानवित् ॥ ५ ॥
घटानि त्रीणि निक्षिप्य कार्तस्वरकृतानि च ।
दर्व्या मुहुर्मुहुः क्षीरं सम्यगालोड्य तत्पचेत् ॥ ६ ॥
एवं द्वित्रि शुभे पात्रे पचेदनिलसंक्षयात् ।
दर्वी यथातथा संज्ञादवतार्य तदासुधा ॥ ७ ॥
पिधाय रन्ध्रं भाण्डाना मङ्गारेषु न्यसेच्च तत् ।
तस्मिन्मन्दे तु संजाते यथार्हा शर्करां क्षिपेत् ॥ ८ ॥
ईषदुष्णेन संयुक्तं दापयेत् क्षीरमुत्तमम् ।
वृष्यं पित्तादिदोषघ्नं शरीरबलवर्धनम् ॥ ९ ॥
श्रमजित् स्वादुसंयुक्तं बुद्धीन्द्रियबलप्रदम् ।
क्षीर पाक बनाने की विधि तथा गुण — पाचक सावधानी पूर्वक भैंस का
दूध लेकर उत्तम पात्र में रक्खे । स्वच्छ गंगा का जल दूसरे पात्र में भर दे
और अनेक प्रकार के सुगन्धों से युक्त पुष्पों से उस जल को सुवासित करे ।

११० पाकदर्पणम्
जल में थोडी देर रखने के बाद चलाकर पुष्पों को फेक दें । इसके बाद
दूध तथा जलको बराबर मिलाकर दूध के पात्र में बुद्धिमान् पाचक पकावे । प्रमाण
को जानने वाला पाचक त्रिनिष्क (तीन ग्राम) प्रमाण के तीन पात्र लेकर उनमें छोड़
दे और धीरे-धीरे शब्द होने तक पकावे । कलछुल से बारबार अच्छी तरह
चलाकर उसको पकावें । इस प्रकार दो-तीन उत्तम पात्र में जल के जलजाने
तक पकावे । जब कलछुल में लगने लगे तब बुद्धिमान् पाचक उनको उतार
कर तथा उनका मुख बन्द कर मन्दाग्नि पर रख दे । उसके थोड़ा ठण्डा हो
जाने पर उचित मात्रा में शक्कर छोड़ दे । इस उत्तम दूधपाक को थोड़ा गरम-
गरम खाने के लिये दे । यह क्षीर पाक वीर्यवर्द्धक, पित्त-कफ-वात आदि दोष-
नाशक, शरीर एवं बलवर्द्धक, थकावट को दूर करने वाला, स्वादिष्ट एवं बुद्धि
तथा इन्द्रियों के बल को बढ़ानेवाला है ॥ १८ ॥
प्रकारान्तरेण क्षीरपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
विना जलेन तत् क्षीरं क्षीरभाण्डे नियोजयेत् ॥ १०॥
स्थाल्यां पचेन्मृदावग्नौ दवघट्टनपुरःसरम् ।
अर्धावशिष्टमिति तत् लेह्यमाहुश्च कोविदाः ॥ ११ ॥
षड्भागशेषमिति तत् घटिकां प्रवदन्ति हि ।
ब्रुवन्त्यष्टावशिष्टं तत् शर्केरामिति साधकाः ॥ १२ ॥
चतुर्थजमिदं क्षीरं न्यसेद्भाण्डचतुष्टये ।
सम्यग्विश्राम्य तत्क्षीरं मानविद्भाण्डसंस्थितम् ॥ १३ ॥
तेषु क्षीरेषु मानज्ञाः फलपुष्पाणि निक्षिपेत् ।
पानरूपे पुनः क्षीरे पनसस्य फलं क्षिपेत् ॥ १४ ॥
सारामृतं पुनस्तत्र आर्द्रकस्य क्षिपेत्कणान् ।
जात्यादिकुसुमं तत्र पुनः सूदः प्रवेशयेत् ॥ १५ ॥
भूयो लेह्याह्वये दुग्धे खर्जूरफलमाहरेत् ।
फलस्वेदं पुनस्तत्र निक्षिपेदमृतोपमम् ॥ १६ ॥
न्यसेच्च पक्वं पुन्नागकुसुमं तत्र मानवित् ।
भूयश्च घटिकारूपे क्षीरे चूतफलं क्षिपेत् ॥ १७॥
सर्पिश्श्च माक्षिकं तत्र निक्षिपेत्सर्वरोगजित् ।
कुसुमं सत्फलादीनां न्यसेत्तत्र नवीदनम् ॥ १८ ॥
क्षीरे तु शर्कराकारे कृत्स्नरम्भाफलं न्यसेत् ।
पुनश्च शर्कराखण्डं जिह्वाजाड्यहरं शुभम् ॥ १९ ॥

नलविरचितम् १११
कुसुमं विन्यसेत्तत्र पुन्नागे च समुद्भवम् ।
तेषु क्षीरेषु सर्वेषु निक्षिपेत्केतकीफलम् ॥ २० ॥
कर्पूरमृगनाभ्योश्च कल्कं कुंकुमवर्जितम् ।
सूदस्तं पानरूपेषु क्षीरेषु प्रसवं न्यसेत् ॥ २१ ॥
संत्यज्य तानि पुष्पाणि वेष्टयित्वा प्रदापयेत् ।
अन्य प्रकार के क्षीर पाक बनाने की विधि तथा गुण-बिना जल मिला
भैंस का दूध दूध के पात्र में रक्खे और मन्द आँच से दुग्धपात्र में कलछुल से
चलाते हुए पकावे । यह क्षीर पाक का पहला प्रकार है। जब पकाते-पकाते आधा
रह जाय तब वह विद्वानों के पीने योग्य होता है । आधा भाग अवशेष दूध को
विद्वान् लोग "लेह्य" कहते हैं । षष्ठांश अवशिष्ट दूध को घटिका कहते हैं। इन
चारों प्रकार के दूध को चार पात्र में रख कर मात्रा को जाननेवाला पाचक
पात्र में स्थित दूध को थोड़ी देर तक स्थिर होने दे । पुनः उन चार पात्रों में
स्थित दूध में फल एवं पुष्पादि छोड़े। पुनः सारामृत में अदरक के टुकड़ों को
छोड़े। पुनः उसमें पाचक चमेली आदि का फूल रक्खे । पुनः लेह्य संज्ञक दूध
में खजूर का फल छोड़ दे । पुनः उसमें अमृत स्वरूप फलस्वेद (फल का रस)
को छोड़ दे और पके पुन्नाग (श्वेत कमल) का पुष्प छोड़ दे। पुनः घटिका
रूप दूध में आम का फल छोड़ दे । पुन. उसमें घी तथा सभी रोगों को जीतने
वाला मधु छोड़ दे । पुनः सत्फला (अनार) आदि का पुष्प तथा नवीन चावल
का भात छोड़ दे । शर्करा रूप दूध में पूरे केले फल छोड़ दे । पुनः उसमें खाँड
छोड़ दे । यह अच्छी तरह जिह्वा की जड़ता को दूर करता है। पुनः उसमें
पुन्नाग का पुष्प छोड़ दे और कर्पूर तथा कस्तूरी को भी छोड़ दे किन्तु केशर
को न छोड़े । पाचक पानरूप दूध में प्रसव (फूल-फल) छोड़ दे । सभी प्रकार
के दूधों से पुष्पों को निकाल कर और पूगपट्ट में बाँध कर खाने के लिये दे ।
क्षीरपाकस्य गुणाः
वातपित्तकफजानिदं पयो यस्य कुक्षिगतमात्रमामयान् ॥ २२ ॥
हन्ति सर्वसुरलोकदुर्लभं प्रार्थितं सुरगणैर्वृषमुख्यः ।
इति नलकृतपाकदर्पणे क्षीरपाकनिर्माणनिरूपणं नाम दशमं प्रकरणं समाप्तम् ॥
क्षीरपाक के गुण- यह क्षीरपाक इन्द्रप्रमुख देवगणों के द्वारा प्रार्थित
सभी देवलोक में दुर्लभ जो पेट में जाने मात्र से वातज, पित्तज तथा

११२ पाकदर्पणम्
कफज रोगों को नाश करता है। अर्थात् यह क्षीरपाक सभी प्रकार के रोगों को
नष्ट करता है ।। २२३ ।।
इति नलकृत पाकदर्पण का डा० इन्द्रदेव त्रिपाठीकृत माधुरी हिन्दी व्याख्या
सहित क्षीरादिपाकनिरूपण नामक दसवाँ प्रकरण समाप्त ।। १० ।।
अथ दधिभेदप्रकरणम्
दधिनिर्माणविधिर्गुणाश्च
अनेकचित्रसंयुक्तः क्षीरभेदश्च दर्शितः ।
दर्श्यते दधिभेदस्तु सुचित्रं विविधं यथा ॥ १ ॥
अर्धावशिष्टधवलं सुपक्वं क्षीरमुत्तमम् ।
सक्षीरखण्डमृद्भाण्डे समादाय शुभे न्यसेत् ॥ २ ॥
सुजातं मातुलुंगस्य फलं स्थूलं समाहरेत् ।
फणाकारसमायुक्तशलाकातीव्रधारया ॥ ३ ॥
वृन्तं मूलं ततस्तस्य किञ्चिच्छित्त्वाऽप्रमाणवित् ।
उद्धरेत्तद्गतान् सर्वान् बीजत्वक्केसरान् बुधः ॥ ४ ॥
एकवारं द्विवारं वा क्षालयेद्वारिणा च तत् ।
कल्केन घनसारादीन् तदन्तं लेपयेद् बुधः ॥ ५ ॥
वासयेद्बहुभिश्चैव जात्यादिकुसुमैः पुनः ।
तत्रत्यानि प्रसूनानि दधिपक्षे समुत्सृजेत् ॥ ६ ॥
ईषदुष्णेन संयुक्तं क्षीरं तत्र समण्डकम् ।
पूरयेन्नवनीतं च किञ्चित्तत्र विनिक्षिपेत् ॥ ७ ॥
छेदेनापूर्य छिन्नेन तन्मुखं छादयेत्सुधीः ।
अनेनैव प्रकारेण दधि कृत्वा प्रदापयेत् ॥ ८ ॥
इदं रुचिकरं पथ्यं सर्वारुचिनिवारणम् ।
बलपुष्टिकरं रम्यं भवेत्कायाग्निदीपनम् ॥ ९ ॥
इति नलकृतपाकदर्पणे दधिभेदनिरूपणं नाम एकादशप्रकरणं समाप्तम् ॥ ११ ॥
दही बनाने की विधि तथा गुण इसके पूर्व क्षीरप्रकरण में दूध के भेद
दर्शाये गये। अब अनेक प्रकार के विचित्र दही के भेद बताये जा रहे हैं। अच्छी
तरह पकाया हुआ अर्धावशिष्ट दूध लेकर उत्तम शक्करयुक्त दूध के पात्र में
रखे । इसके बाद बड़ा बिजौरा नींबू का फल ले आये और उसको फणाकार
तेज धार वाली शलाका से साफ कर ले । उसकी भेटी तथा मूल भाग का प्रमाण
को जानने वाला थोड़ा काट दे। पुनः उसके अन्दर के सभी पदार्थों (बीज केशर
आदि) को निकाल दे और उसको एक बार या दो बार जल से प्रक्षालन कर ले।
इसके बाद कर्पूर आदि के कल्क से उसके अन्दर लेप लगा दे। पुनः चमेली

११४ पाकदर्पणम्
आदि अनेक सुगन्धित पुष्पों से सुगन्धित कर ले । उसमें के सभी पुष्पों को
दही में छोड़ दे । तदनन्तर उसमें माण्ड सहित थोड़ा गरम दूध १ भर दे और
थोड़ा मक्खन छोड़ दे इस के बाद कटे नींबू के टुकड़े से उसका मुख ढक दे । इस
प्रकार दही बना कर खाने के लिये दे । यह दही रुचिकारक, पथ्य, सभी प्रकार
के अरुचियों को दूर करने वाला बल एवं पुष्टिकारक, मनोहर तथा जाठराग्नि को
प्रदीप्त करने वाला है ॥ १-९ ॥
इति नलकृत पाकदर्पण का डा० इन्द्रदेव त्रिपाठीकृत माधुरी हिन्दी व्याख्या
सहित दधिभेदनिरूपण नामक एकादश प्रकरण समाप्त ॥ ११ ॥
( १ ) आजकल भी यह परम्परा देखी जाती है कि दूकानदार मिट्टी के पुरवे में
अलग-अलग दही जमाकर बेचते हैं। सम्भवतः वही परम्परा आज भी
प्रचलित है । मद्रास में बहुधा अलग-अलग बर्तनों में दही इस प्रकार
बेचा जाता है ।