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पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)

पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)

Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary

राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished69 पृष्ठ

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पृष्ठ १०६

१०६ पाकदर्पणम्
प्रसूनाभावे देशे च कर्त्तव्योऽयं मनीषिभिः ।
पुष्परहित देश तथा काल में जल सुवासित करने की विधि—कुम्भकार
(कोहार) के घर से नवीन कच्चा घड़ा लाकर कर्पूर-कस्तूरी आदि सुगन्धित
द्रव्यों के कल्क से बाहर-भीतर बराबर-बराबर लेप करे और इसके बाद
छाया में सुखा ले । इस प्रकार बार-बार प्रयत्नपूर्वक कई दिन तक करे । इस
प्रकार सुगन्धित उस पात्र के निष्पाव (मटर) के बराबर टुकड़े बनाकर
नारियल के फल से निर्मित पात्र में प्रमाण को जाननेवाला पाचक बहुत से
पुष्प एवं कर्पूर आदि द्रव्यों से अनेक बार भावित कर ले । पुराने पुष्प तथा
नवीन पुष्पों को पकाकर तथा भर कर एक माह तक बार-बार घड़े के बनाये
उन वटकों को उस भाण्ड में भर दे । उन घड़े के टुकड़ों को भर कर गुप्त
स्थान में रख दे । जहाँ पर पुष्प नहीं होते हैं उन देशों में इन घड़े के टुकड़ों
को पीने के पानी में तथा तक्र (मट्ठा) में प्रयोग करे और घड़ा आदि
में मिला दे । वे जिन-जिन पुष्पों से भावित घड़े के टुकड़े होंगे उन-उन पुष्पों
के गुण के अनुसार गुण होंगे । इस प्रकार के घड़े के टुकड़ों को जल में छोड़े ।
विद्वान् लोग पुष्परहित देश में जल को सुगन्धित बनाने के लिये इस विधि का
प्रयोग करें ॥ २६-३३ ॥
एवं प्रसाद्य पानीयं पिपासूंश्च प्रदापयेत् ॥ ३४ ॥
इदं पित्तहरं पथ्यं श्रमजिद् बलवर्धनम् ।
पूर्वोक्त प्रकार से जल को शुद्ध कर प्यासे व्यक्ति को दे । यह जल पित्त को
दूर करता है, पथ्य है, थकावट को दूर करता है तथा बल को बढ़ाता है ॥३४॥
जलशैत्यीकरणे वादिप्रतिवादिनोरुक्तिः
एवमादि विचित्राणि सन्ति मध्येऽत्र भूमिषु ॥ ३५ ॥
पानीयविषये वादो वादिना प्रस्तुते सति ।
तयोरन्यं वदत्येकः शृणु मे वचनं परम् ॥
स्वभावशीतलं वारि कुरुते शीतलाधिकम् ॥ ३६ ॥
सिकता वेदिकायां च तालवृन्तसमीरणैः ।
पाटल्यादिप्रसूनैश्च वासनां कुरुते जले ॥ ३७ ॥
एवं तु घनशारेण विना बालुकवेदिकाम् ।
विना पुष्पैर्विना शैत्यैस्तालवृन्तानिलान् विना ॥ ३८ ॥
उष्मवारिक्षयेनैव कुरु शैत्ये च वासितम् ।
इति पानीयविषये वादिन्यतिवदत्यपि ॥ ३९ ॥


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नलविरचितम् १०७
क उपायो महानास्ते लघुर्बाहुक मे वद ।
जल के शीतल करने के सम्बन्ध में वादी तथा प्रतिवादी का कथन—इस
प्रकार पृथ्वी के ऊपर बीच-बीच में जल को शीतल करने के लिए विचित्र-विचित्र
साधन हैं । पानी के विषय में वादी के द्वारा वाद प्रस्तुत करने पर दोनों में से
एक ने जो कहा उसको सुनें । हे बाहुक ! स्वभाव से ही शीतल जल को अधिक
शीतल क्यों बनाते हैं । बालू की वेदी पर ताड़ के पंखा के हवा से तथा पाटल
आदि के पुष्प से जल को सुगन्धित करते हैं। इस प्रकार बिना कर्पूर की वासना
बालुका वेदी के बिना, पुष्पों के बिना तथा ताड़ के पंखा के बिना उष्ण
जल के क्षय से ही शीतल तथा सुवासित करे । इस प्रकार यदि वादी कहे तो
कौन सा उत्तम उपाय है जो हल्का हो उसे मुझसे कहो ॥ ३२-३८ ॥
राज्ञश्च वचनं श्रुत्वा तथेत्युत्तरमब्रवीत् ॥ ४० ॥
लघूपायं महद्वच्मि श्रूयनामत्र भूमिप ।
यदातपे हि तद्वस्त्रं शान्तं कुर्यात्प्रयत्नतः ॥ ४१ ॥
सुगन्धगुणसंयुक्तै बहुपुष्पैश्च वासिते ।
नव कुम्भे च तद्वस्त्रं सम्यङ्निक्षिप्य गोपयेत् ॥ ४२ ॥
राजा के वचन को सुनकर वैसा ही कहूँगा यह कहकर बोले कि हे राजन् !
सरल तथा उत्तम उपाय को कहता हूँ, सुनें । जो वस्त्र धूप में सुवासित कर
सुखाया गया है उसको प्रयत्न पूर्वक शीतल करे और सुगन्धित द्रव्यों से सुगन्धित
तथा अनेक पुष्पों से सुवासित नवीन घड़े में अच्छी तरह रखकर बन्द कर
रख दे ॥ ३७-४२ ॥
ईदृशस्तु यदा वादः सम्प्राप्तः सूदराट् तदा ।
शैत्योदकं तदा वादो दत्वा तु प्रातवादितः ॥ ४३ ॥
वादं कुरु बलस्याय यावच्छेत्यादिमेलनम् ।
तावत्करोम्यहं सम्यक् पथ्यं वैचित्र्यमुत्तमम् ॥ ४४ ॥
इस प्रकार का जब वाद-विवाद उपस्थित हुआ तब पाचक वादी प्रतिवादी
को शीतल जल देकर बोला कि जब तक शीतलता आदि का मिलान विषय का
वाद-विवाद करे तब तक मैं जलशीतल विषयक उत्तम विचित्र प्रकार को करता हूँ,
आप देखें ॥ ४३-४४ ॥
इत्युक्त्वा सूदराडाशु सुतप्तं जलमग्रहीत् ।
तस्मिन्नम्भसि तद्वस्त्रं प्रयत्नेन निमज्जयेत् ॥ ४५ ॥