पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)
Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary
राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा
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यस्याञ्चलानि चत्वारि वादिवारणकेशरी ।
चतुर्भिः पुरुषैराशु ग्राहयेद्वारिमण्डपे ॥ ६४ ॥
पीडयित्वा तु तद्वस्त्रं जलमादाय सूदराट् ।
इदमेतावता चोष्णं मज्जयेत्तज्जलं गुणैः ॥ ४७ ॥
अतस्तु वादी जयति प्रतिवादी गजांकुशः ।
इदं स्वादुतरं पथ्यं वातश्लेष्महरं भवेत् ॥ ४८ ॥
पाचक जल को ठण्डा करने के लिए सरल उपाय को बताते हुए उपरोक्त
बातों को कह कर शीघ्र ही संतप्त जल को ग्रहण कर उस जल में पूर्वोक्त सुवा-
सित वस्त्र को भिगो दे । इसके बाद प्रतिवादी चार पुरुषों के द्वारा चारों
अञ्चलों को जलमण्डप में ग्रहण कराये। पुनः उस वस्त्र को निचोड़ कर
उस उष्ण जल को उसके गुणों के साथ डुबा दे । अतः वादी तथा प्रतिवादी
गजांकुश की जीत है। यह जल स्वादिष्ट पथ्य तथा वात एवं कफ-नाशक
होता है ॥ ४५-४८ ॥
जलशैत्यकरणप्रकरणस्योपसंहारः
पानीयमेतादृशमन्यपूर्णमनेकजन्मान्तरितं हिताय ।
सम्पाद्य यत्नेन पिबेच्च यो वा स चोत्तमः पुण्यजनेषु मध्ये ॥४९॥
इति नलकृतपाकदर्पणे शैत्यजलनिरूपणं नाम नवमप्रकरणं समाप्तम् ॥ ९ ॥
जल शीतल करनेवाले प्रकरण का उपसंहार -- दूसरों से न पूर्ण होनेवाले
अनेक जन्मों के बीच का ऐसा जल हित के लिये प्रयत्न पूर्वक बनाकर जो पीता है
वह पुण्यजनों के मध्य में उत्तम है ॥ ४९ ॥
इति नलकृत पाकदर्पण का डा० इन्द्रदेव त्रिपाठीकृत माधुरी हिन्दी व्याख्या
सहित स्वच्छशैत्यजल निरूपण नामक नवम प्रकरण समाप्त ॥ ९ ॥
अथ क्षीरादिपाकनिरूपणप्रकरणम्
क्षीरपाकनिर्माणप्रकारः
सर्वपायसभेदानां कथितानां निदानके ।
करिष्यमाण दध्यादि कार्याणां मूलकारणम् ॥ १ ॥
अतोऽत्र कथ्यते सम्यक् क्षीरपाकमनुत्तमम् ।
क्षीरपाक बनाने का प्रकार — पहले सभी प्रकार के पायस आदि के भेदों
को कहा गया । अतः अब यहाँ किये जानेवाले दही आदि पदार्थों के आदि कारण
उत्तम क्षीरपाक को कहते हैं ॥ १ ॥
क्षीरपाकनिर्माणविधिः
महिष्याः सम्भवं क्षीरं सावधानः समाहरेत् ॥ २ ॥
तदादाय शुभे भाण्डे निदध्यात् सूदकोविदः ।
गाङ्गं जलं च ललितं पूरयेदपरे घटे ॥ ३ ॥
वासयेत्तज्जलं पुष्पैर्नाना परिम्लान्वितैः ।
मुहूर्तमेकमालोक्य तानि पुष्पाणि संत्यजेत् ॥ ४ ॥
क्षीरं जलं समं कृत्वा क्षीरभाण्डे पचेद्बुधः ।
त्रिनिष्कमानमुक्तानि प्रत्येकं तत्र मानवित् ॥ ५ ॥
घटानि त्रीणि निक्षिप्य कार्तस्वरकृतानि च ।
दर्व्या मुहुर्मुहुः क्षीरं सम्यगालोड्य तत्पचेत् ॥ ६ ॥
एवं द्वित्रि शुभे पात्रे पचेदनिलसंक्षयात् ।
दर्वी यथातथा संज्ञादवतार्य तदासुधा ॥ ७ ॥
पिधाय रन्ध्रं भाण्डाना मङ्गारेषु न्यसेच्च तत् ।
तस्मिन्मन्दे तु संजाते यथार्हा शर्करां क्षिपेत् ॥ ८ ॥
ईषदुष्णेन संयुक्तं दापयेत् क्षीरमुत्तमम् ।
वृष्यं पित्तादिदोषघ्नं शरीरबलवर्धनम् ॥ ९ ॥
श्रमजित् स्वादुसंयुक्तं बुद्धीन्द्रियबलप्रदम् ।
क्षीर पाक बनाने की विधि तथा गुण — पाचक सावधानी पूर्वक भैंस का
दूध लेकर उत्तम पात्र में रक्खे । स्वच्छ गंगा का जल दूसरे पात्र में भर दे
और अनेक प्रकार के सुगन्धों से युक्त पुष्पों से उस जल को सुवासित करे ।