पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)
Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary
राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा
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आदि अनेक सुगन्धित पुष्पों से सुगन्धित कर ले । उसमें के सभी पुष्पों को
दही में छोड़ दे । तदनन्तर उसमें माण्ड सहित थोड़ा गरम दूध १ भर दे और
थोड़ा मक्खन छोड़ दे इस के बाद कटे नींबू के टुकड़े से उसका मुख ढक दे । इस
प्रकार दही बना कर खाने के लिये दे । यह दही रुचिकारक, पथ्य, सभी प्रकार
के अरुचियों को दूर करने वाला बल एवं पुष्टिकारक, मनोहर तथा जाठराग्नि को
प्रदीप्त करने वाला है ॥ १-९ ॥
इति नलकृत पाकदर्पण का डा० इन्द्रदेव त्रिपाठीकृत माधुरी हिन्दी व्याख्या
सहित दधिभेदनिरूपण नामक एकादश प्रकरण समाप्त ॥ ११ ॥
( १ ) आजकल भी यह परम्परा देखी जाती है कि दूकानदार मिट्टी के पुरवे में
अलग-अलग दही जमाकर बेचते हैं। सम्भवतः वही परम्परा आज भी
प्रचलित है । मद्रास में बहुधा अलग-अलग बर्तनों में दही इस प्रकार
बेचा जाता है ।