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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ५५
अवश्य होना चाहिये, सो तो नहीं होता; याते स्नेहरूप कार्यकी समवायिकारणताकी
अवच्छेदक एक अनुगत जलत्व जातिकी सिद्धि नहीं होसकती. समाधान-जन्य-
स्नेहनिष्ठ जन्यता निरूपित जो जन्यजलनिष्ठा जनकता तादृश जनकताकी अवच्छे-
दक होनेसे जन्यजलमें जलत्वजाति सिद्ध हुए पश्चात् जन्यजलनिष्ठ जन्यतानिरू-
पित जो शुद्ध जलनिष्ठा जनकता तादृश जनकताकी अवच्छेदक होनेसे शुद्ध जल-
त्वजातिकी सिद्धि होतीहै. जलका रूप श्वेत है, केवल यह दिखलानेके लिये मूलमें
“वर्णः शुक्लः” यह पाठ लिखा है; किन्तु श्वेतरूपवत्त्व जलका लक्षण नहीं है.
अथवा नैमित्तिकद्रवत्ववदवृत्तिरूपवद्वृत्तिद्रव्यत्वसाक्षाद्व्याप्य-
जातिमत्त्वम्, अभास्वरशुक्लेतररूपासमानाधिकरणरूपवद्वृत्तिद्र-
व्यत्वसाक्षाद्व्याप्यजातिमत्त्वं वा तदर्थः । तेन स्फटिकादौ ना-
तिव्याप्तिः ।
भाषा-अथवा नैमित्तिक द्रवणवाले जो 'पृथिवी तेजः'उनमें न वर्तनेवाली तथा रूपवा-
लेंमें वर्तनेवाली जो द्रव्यत्वकी साक्षात् व्याप्य 'जलत्व' जाति तादृश जातिवाले होना
जलका लक्षण है; किंवा अप्रकाशक श्वेतरूपसे इतर जो 'नीलपीतादि तथा प्रकाशक
श्वेतरूप'उनका असमानाधिकरण होकर रूपवद् जो जलउसमें वर्तनेवाली जो द्रव्यत्वकी
साक्षात् व्याप्य जलत्वजाति तादृश जातिमत्ताही पूर्वोक्त “वर्णः शुक्लः” इस ग्रन्थका
अर्थ है. एवं लक्षण करनेसे स्फटिकमणिआदिमें अतिव्याप्ति नहींहै. अन्यथा शुक्ल
वर्णवत्त्वेन स्फटिकमणिरूप पृथिवीमें अतिव्याप्ति स्पष्टही थी.
-रसस्पर्शौ जले मधुरशीतलौ ।
भाषा-जलमें रस तथा स्पर्श यथाक्रम मधुर तथा शीतल है.
रसस्पर्शाविति । जलस्य मधुर एव रसः। शीत एव स्पर्शः । ति-
क्तरसवदवृत्तिमधुरवद्वृत्तिद्रव्यत्वसाक्षाद्व्याप्यजातिमत्त्वं तदर्थः,
तेन शर्करादौ नातिव्याप्तिः । ननु शुक्लरूपवत्त्वमेवेति कुतः,
कालिन्दीजलादौ नीलोपलब्धेरिति चेत्,न । नीलजनकतावच्छे-
दिकायाः पृथिवीत्वजातेरभावाज्जले नीलरूपासम्भवात् । का-
लिन्दीजले नीलत्वप्रतीतिस्त्वाश्रयौपाधिकी । अतएव वियति
विक्षेपे धवलिमोपलब्धिः ।

५६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
भाषा-अर्थात् जलमें रस मधुरही है. तथा स्पर्श शीतही है. इसकाभी तिक्तादि
रसवालेमें न वर्तनेवाली तथा मधुररसवालेमें वर्तनेवाली जो द्रव्यत्वकी साक्षात् व्याप्य
जलत्वजाति तादृश जातिमत्ता जलका लक्षण है, ऐसा जातिघटित लक्षण करना
उचित है. ऐसा कहनेसे चीनी शर्करादिमें अतिव्याप्तिभी नहींहै. क्योंकि ये पार्थिव
हैं. इनमें रहनेवाली पृथ्वीत्व जाति तिक्तादिरसवालेमें न वर्तनेवाली नहींहै, किन्तु
वर्तनेवालीही है; याते जातिघटित लक्षणकी वहां प्रसक्ति नहींहै. शंका-'जलका
शुक्लही रूप है' यह कैसे निश्चय किया जावे? क्योंकि यमुनाके जलमें नीलरूपभी
दिखाईदेताहै. समाधान-नीलरूपनिष्ठ जन्यता निरूपिता जो जनकता तादृश
जनकताकी अवच्छेदक जो पृथिवीत्वजाति उसका जलमें अभाव होनेसे जलमें नील
रूपका सम्भव नहीं होसकता.यमुनाके जलमें नीलरूपकी प्रतीति तो पृथ्वीसम्बन्धसे
औपाधिकी है अर्थात् नीचेकी पृथिवी नीली है उसीकी नीलता जलमें दीख पड़ती है.
इसीसे यमुनाके जलको यदि ऊपरको फेंके तो श्वेत प्रतीत होता है.
अथ जले माधुर्ये किं मानं, न हि प्रत्यक्षेण कोऽपि रसस्तत्रानुभूय-
ते, नच नारिकेलजलादौ माधुर्यमुपलभ्यत एवेति वाच्यम् ।
तस्याश्रयोपाधिकत्वात् । अन्यथा जम्बीरजलादावम्लादिरसोप-
लब्धेरम्लादिमत्त्वमपि स्यादिति चेत्, न। हरीतक्यादिभक्षणस्य
जलरसव्यञ्जकत्वात् । नच हरीतक्यामेव जलोष्णसंयोगाद्रसा-
न्तरोत्पत्तिरिति वाच्यम् । कल्पनागौरवात् ।
शंका-जलके मीठेपनेमें क्या प्रमाण है? रासनज प्रत्यक्षसे तो जलमें किसी
रसकीभी प्रतीति नहीं होती. यदि कहो कि नारियल तथा इक्षु आदिका जल मधुर
ही होताहै, तो युक्त नहीं; क्योंकि वह मधुरता पृथ्वी सम्बन्धसे पृथिवीहीकीहै जलकी
नहीं. (अन्यथा) निम्बु गलगलादिके रसमें आम्ल ( खट्टा) रसभी प्रतीतहोता है वहभी
जलमें मानना चाहिये.समाधान-जलमें अनुद्बुद्ध मधुर रस है. हरीतकी(हरड़) या
आमला खानेके पश्चात् जल पीनेसे उसमें मधुरता उद्बुद्ध होतीहै.शंका-जल तथा
ऊष्म ( मुखकी भाफ ) के सम्बन्धसे हरीतकीमें ही रसान्तरकी उत्पत्ति मान लीजाय
तो क्या दोष है? समाधान-कल्पनागौरव है. अर्थात् फलादिरूप पृथिवीमें रसकी
उत्पत्ति तेजःसंयोगसे देखी जाती है और यदि पूर्वोक्त हरीतकीके उदाहरणके अनु-
रोधसे जलके संयोगकोभी पृथिव रसका उत्पादक माना जाय तो यह एक जुदा
कार्यकारणभाव माननेमें कल्पनागौरव है,

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ५७
पृथिवीत्वस्याम्लादिजनकतावच्छेदकत्वाच्च जलेनाम्लादिकम् ।
जम्बीररसादौ त्वाश्रयोपाधिकी तथा प्रतीतिः । एवं जन्यशीत-
स्पर्शजनकतावच्छेदकं जन्यजलत्वम्, तदवच्छिन्नजनकताव-
च्छेदकं तु जलत्वमिति बोध्यम् । घृष्टचन्दनादौ तु शैत्योपलब्धि-
श्चन्दनान्तर्वर्तिशीततरसलिलस्यैव । तेजःसंयोगाज्जले उष्णप्रती-
तिरौपाधिकी स्फुटैव, तत्र पाकासम्भवात् ।
भाषा-अम्लादिनिष्ठ जन्यता निरूपित जनकतावच्छेदकत्व पृथिवीत्वको है; याते
अम्लादिक जलके धर्म नहींहैं. निम्बु गरगलादिके रसमें अम्लप्रतीति तो स्वसमवा-
यिसंयोग सम्बन्धसेहै याते औपाधिकी है. ऐसे जन्यशीतस्पर्शनिष्ठ जन्यता निरूपित जन-
कताकी अवच्छेदक जन्य जलमें जलत्वजाति है और जन्यजलनिष्ठ जन्यता निरूपित
जनकताकी अवच्छेदक शुद्ध जलत्व जाति है. शंका-घिसेहुये चन्दनकाभी तो शीत
स्पर्श होताहै याते जलका लक्षण चन्दनमें अतिप्रसक्त होगा. समाधान-चन्दनमें
शीतलता प्रतीति चन्दनान्तर्गत जलहीकी है, चन्दन शीतल नहीं है. आगआदिके
संयोगसे जलमें उष्णताकी प्रतीति तो औपाधिकी स्पष्टही है. जलमें पाक तो होही
नहीं सकता.
स्नेहस्तत्र-
भाषा-स्नेह अर्थात् चिकनापना जलहीमें रहता है.
स्नेहस्तत्रेति । घृतादावपि तदन्तर्वर्तिजलस्यैव स्नेहो जलस्य
स्नेहसमवायिकारणत्वात् । तेन जल एव स्नेह इति मन्तव्यम् ।
भाषा-घृतादिकोंमेंभी स्नेह घृतान्तर्वर्ति जलहीका है, क्योंकि स्नेहकी समवा-
यिकारणता जलहीमें सिद्ध है इससे जलहीमें स्नेहका मानना उचित है.
-द्रवत्वं तु सांसिद्धिकमुदाहृतम् ॥ ३९ ॥
भाषा-द्रवणगुण जलमें स्वाभाविक स्वीकार किया है ॥ ३९ ॥
द्रवत्वमिति । सांसिद्धिकद्रवत्वत्वं जातिविशेषः प्रत्यक्षसिद्धस्त-
दवच्छिन्नजनकतावच्छेदकमपि तदेवेति भावः । तैलादावापि
जलस्येव द्रवत्वम्, स्नेहप्रकर्षेण च दहनानुकूल्यमिति वक्ष्यति३९
भाषा-स्वाभाविक द्रवणमें स्वाभाविक द्रवणत्वरूपा जातिविशेष तो प्रत्यक्षही
सिद्ध है, स्वाभाविक द्रवणत्वावच्छिन्न जन्यता निरूपित जनकताकी अवच्छेदक भी

५८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
वही स्वाभाविक द्रवत्वरूपा जाति है.तैलादिकोंमेंभी द्रवणगुण जलहीका है स्नेहगुण
की अधिकतासे दहनानुकूलता तैलमें है, इस वार्त्ताको ग्रन्थकार आगे कहेगा.
नित्यतादि प्रथमवत्-
भाषा-जलमें नित्य अनित्यादि यावत् व्यवहार प्रथमवत् करने चाहिये,
प्रथमवदिति । पृथिव्या इवेत्यर्थः।तथाहि । जलं द्विविधं नित्यम-
नित्यं च । परमाणुरूपं नित्यम्, द्व्यणुकादिकं सर्वमनित्यम
वयवसमवेतं च । अनित्यमपि त्रिविधं शरीरेन्द्रियविषयभेदा त् ।
भाषा-अर्थात् पृथिवीवत् जलभी नित्य अनित्य भेदसे दो प्रकारका है,जो नित्य
है वह परमाणुरूप है, शेष द्व्यणुकादिरूप सम्पूर्ण अनित्य है तथा अवयवोंमें समवाय
सम्बन्धसे रहता है. शरीरभेदसे तथा इन्द्रिय भेदसे तथा विषयभेदसे अनित्यभी
तीन प्रकारका है.
पृथिवीतो यो विशेषस्तमाह, किंत्विति-
भाषा-'किंतु' इत्यादि ग्रंथसे पृथिवीसे जो विशेष है वह कहता है--

  • किंतु देहमयोनिजम् ।
    भाषा--पृथिवीसे जलमें इतना भेद है कि जलका शरीर योनिसे पैदा नहीं होता,
    अयोनिजमिति । अयोनिजमेवेत्यर्थः । जलीयं शरीरमयोनिजं
    वरुणलोके प्रसिद्धम् ।
    भाषा-जलसे उत्पन्न होनेवाला शरीर योनिसे पैदा नहीं होता यह वार्ता वरुण-
    लोकमें प्रसिद्ध है ।
    इन्द्रियं रसनं-
    भाषा-जलसे उत्पन्न होनेवाला इन्द्रिय रसना है.
    इन्द्रियमिति । रसनं जलीयमित्यर्थः।तथाहि रसनं जलीयं गन्धा-
    द्यव्यञ्जकत्वे सति रसव्यञ्जकत्वात्, सक्तुरसाभिव्यञ्जकोदकव
    त् । रसनसन्निकर्षे व्यभिचारवारणाय द्रव्यत्वं देयम् ।
    भाषा-यह कल्पना अनुमानसे करी जाती है. तथाहि गन्धादिकोंका न उद्बोधक
    होकर केवल रसहीका उद्बोधक होनेसे-रसना इन्द्रिय जलीय प्रतीत होताहै. दृष्टान्त
    में जैसे जल सक्तुओं ( सत्तूओं ) के गन्धादिका न उद्बोधक होकर केवल रसहीका
    उद्बोधक है, गन्धादिकोंका न उद्बोधक होकर केवल रसका उद्बोधक रसना वस्तुका

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ५९
संयोगभी है. उसमें पूर्वोक्त हेतुका व्यभिचार है.उसके वारणार्थ हेतुमें "द्रव्यत्वेसति"
यह विशेषण देना उचित है. अर्थात् द्रव्यत्वे सति गन्धादिकोंका न उद्बोधक होकर
केवल रसका उद्बोधक होनेसे रसना इन्द्रिय जलीय है.
विषयं दर्शयति, सिन्धुरिति-
भाषा-'सिन्धु' इत्यादि ग्रन्थसे विषयको दिखलाता है-
-सिन्धुहिमादिर्विषयो मतः ॥ ४० ॥
सिन्धुः समुद्रः । हिमं तुषारः। आदिपदात् सरित्कासारकरकादिः
सर्वो ग्राह्यः ।
भाषा-समुद्र, तुषार (बर्फ), आदि पदसे नदी, सरोवर, करक (गड़ा ), ये सम्पूर्ण
जलीय विषय हैं ॥ ४० ॥
न च हिमकरकयोः कठिनत्वात्पार्थिवत्वमिति वाच्यम्। ऊष्मणा
विलीनस्य तस्य जलत्वस्य प्रत्यक्षसिद्धत्वात् । यद्द्रव्यं यद्द्रव्य-
ध्वंसजन्यमिति व्याप्तेर्जलोपादानोपादेयत्वसिद्धेः। अदृष्टविशेषेण
द्रवत्वप्रतिरोधात् करकादीनां काठिन्यप्रत्ययस्य भ्रान्तित्वात् १॰
शंका-हिमकरकादि कठिन स्पर्शवाले होनेसे पार्थिव प्रतीत होतेहैं. समा-
धान-तेजःसंयोगसे विलीन (गले) हुये हिमकरकादि जलरूपसे साक्षात् प्रतीत
होते हैं. जो (जलरूप) द्रव्य जिस (हिमकरकादि) रूप द्रव्यके ध्वंससे उत्पन्न हो
वह (जल रूप) द्रव्य उस (हिमकरकादिरूप) द्रव्यका उपादानरूपेण (उपा-
देय) ग्रहण होता है, इस व्याप्तिसे हिमकरकादि जलसे अतिरिक्त पदार्थ नहीं है
हिमकरकादिमें द्रवणका प्रतिरोध जीवोंके हानिलाभकारक अदृष्टविशेषसे है, तथा
कठिनस्पर्शकी प्रतीति भ्रान्ति सिद्ध है ॥ ४० ॥
तेजो निरूपयति, स्पर्श उष्ण इत्यादिना-
भाषा-'स्पर्श उष्ण' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार तेजःका निरूपण करता है-
स्पर्श उष्णस्तेजसस्तु-
भाषा-जिसका स्पर्श उष्ण हो वह तेजःपदार्थ है.
उष्णत्वं स्पर्शनिष्ठो जातिविशेषः प्रत्यक्षसिद्धः। इत्थं च जन्यो
१ भ्रान्तित्वं नामातात्विकान्यथाभावेन वस्त्ववगाहनत्वम् ।

६० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष -
ष्णस्पर्शसमवायिकारणतावच्छेदकं तेजस्त्वं जातिविशेषः ।
तस्य परमाणुवृत्तित्वं तु जलत्वस्येवानुसन्धेयम् । न चोष्ण-
स्पर्शवत्त्वं चन्द्रकिरणादावव्याप्तमिति वाच्यम् । तत्राप्युष्णस्य
सत्त्वात् । किन्तु तदन्तःपातिजलस्पर्शैनाभिभवादग्रहः। एवं र-
त्नकिरणादौ पार्थिवस्पर्शैनाभिभवाच्चक्षुरादौ चानुद्भूतत्वादग्रहः।
भाषा-उष्णस्पर्शमें रहनेवाला ( उष्णत्व ) धर्म स्पर्शनिष्ठ जातिविशेष प्रत्यक्ष
सिद्ध है. इस रीतिसे जन्य उष्णस्पर्शनिष्ठ कार्यतानिरूपिता जो तेजोनिष्ठा समवायि
कारणता तादृश कारणताकी अवच्छेदक तेजस्त्व जाति विशेष है. उस तेजस्त्व जाति
विशेषकी परमाणुओंमें सिद्धि पूर्वोक्त जलत्वजातिकी तरह जाननी चाहिये अर्थात्
तेजःपरमाणुओंमें जन्य उष्णस्पर्श नहीं है. इसलिये जन्य स्पर्शनिष्ठ जन्यतानिरूपित
जनकताकी अवच्छेदक परमाणु साधारण तेजस्त्व जाति सिद्ध नहीं होसकती; किन्तु
जन्यस्पर्शनिष्ठ जन्यतानिरूपित जनकतावच्छेदकत्वरूपसे जन्यतेजस्त्वजातिकी सिद्धि
और जन्यतेजस्त्वावच्छिन्न जन्यतानिरूपित जनकतावच्छेदकत्व रूपसे शुद्ध तेजस्त्व
जातिकी सिद्धि होती है. शंका-उष्णस्पर्शवत्ता चन्द्रकिरणादिकोंमें अव्याप्तिग्रस्त है.
समाधान-चन्द्रकिरणादिमें उष्णस्पर्श है तो सही परन्तु चन्द्रकिरणोंके बीच जल
भी रहता है. जलके स्पर्शसे उष्णस्पर्श दबा रहता है इसलिये ग्रहण नहीं होता. ऐसे
ही रत्नभी तेजःपदार्थ है. उनका उष्णस्पर्श पार्थिवस्पर्शसे तिरस्कृत है और नेत्रादिमें
अनुद्भूत ( अनुद्बुद्ध ) स्पर्श है इसलिये प्रत्यक्ष नहीं होता.
-स्याद्रूपं शुक्लभास्वरम् ।
भाषा-तेजःपदार्थका रूप श्वेत तथा प्रकाशवान् है.
रूपमित्यादि । वैश्वानरे मरकतकिरणादौ च पार्थिवरूपेणाभिभ-
वाच्छुक्लत्वाग्रहः । तद्रूपाग्रहे धर्म्मिणोऽपि चाक्षुषत्वं न स्यादिति
चेत्, न । अन्यदीयरूपेणापि धर्म्मिणो ग्रहसम्भवात्, शङ्खस्येव
पित्तपीतिम्ना । वह्नेस्तु शुक्लरूपं नाभिभूतं किंतु तदीयं शुक्ल-
त्वमभिभूतमित्यन्ये ।
भाषा-प्रज्वलित अग्निमें तथा मणिकिरणादिमें जो रक्त ( लाल ) रूप
दिखाई देता है वह पृथिवीका है, पार्थिवरूपसे तेजका वास्तवश्वेतरूप तिरस्कृत
है; याते प्रत्यक्ष नहीं होता. शंका-यदि तेजका वास्तवरूप ग्रहण नहीं होता तो

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेतां. ६१
उस रूपके धर्मी अग्नि आदिकाभी ग्रहण न हुआ चाहिये. समाधान-धर्मीका
ग्रहण रूपान्तरसेभी होसकताहै. जैसे पित्तदोषदूषित नेत्रोंद्वारा श्वेतशंखका पीतरूपसे
पार्थिवरूपसे अग्निका रूप तिरस्कृत ( दबा हुआ ) नहींहै, किन्तु अग्निके शुक्लरूपमें
जो ' शुक्लत्व ' जाति वह दबी है ऐसाभी कई लोग मानते हैं.
नैमित्तिकं द्रवत्वं तु-
भाषा-निमित्तसे अर्थात् अग्निसंयोगसे द्रवण तेजःपदार्थमें है.
नैमित्तिकमिति । सुवर्णादिरूपे तेजसि तत्सत्त्वात् । न च नैमि-
त्तिकद्रवत्वं न लक्षणं दहनादावव्याप्तेर्घृतादावतिव्याप्तेश्चेति वा-
च्यम् । पृथिव्यवृत्तिनैमित्तिकद्रवत्ववद्वृत्तिजातिमत्त्वस्य विव-
क्षितत्वात् ।
भाषा-सुवर्णादिरूप तेजःपदार्थमें नैमित्तिक द्रवण प्रसिद्ध है. शंका-नैमित्तिक
द्रवण तेजःपदार्थका लक्षण नहीं होसकता; क्योंकि वह अग्निआदिकोंमें अव्याप्त है तथा
घृतादिकोंमें अतिव्याप्त है. समाधान-पृथिवीमें न वर्तनेवाली जो नैमित्तिक द्रवण
वालेमें वर्तनेवाली तेजस्त्वजाति तादृश जातिमत्ता यावत् तेजःपदार्थमें दिखलानेकी
वक्ताकी इच्छा है; याते दोष नहीं.

  • नित्यतादि च पूर्ववत् ॥ ४१ ॥
    पूर्ववदिति । जलस्यैवेत्यर्थः ।
    भाषा--तेजःपदार्थका नित्यानित्य व्यवहार जलवत् जानना चाहिये ॥ ४१ ॥
    तथाहि । तद्विविधं नित्यमनित्यं च। नित्यं परमाणुरूपं तदन्यद-
    नित्यं अवयवि च । तच्च त्रिधा शरीरेन्द्रियविषयभेदात् । शरी-
    रमयोनिजमेव, तच्च सूर्यलोकादौ प्रसिद्धम् ॥ ४१ ॥
    भाषा-वह यह है कि तेज दोप्रकारका है एक नित्य है, दूसरा अनित्य है. नित्य
    परमाणुरूप है, उससे भिन्न अनित्य है तथा अवयवजन्य है. वह अनित्य शरीरभेदसे
    तथा इंद्रियभेदसे और विषयभेदसे पुनः तीन प्रकारका है. तैजसशरीर अयोनिज
    सूर्य्यलोकमें प्रसिद्ध है.
    अत्र यो विशेषस्तमाह, इन्द्रियमिति-
    भाषा-'इन्द्रिय' इत्यादिग्रन्थसे तेजःपदार्थमें जो औरोंसे विशेषताहै वह कहताहै.-
    इन्द्रियं नयनं-
    भाषा-नेत्र इन्द्रिय तेजःपदार्थसे उत्पन्न हुआ है.

काल, दिक्, आत्मा, मन एवं चतुर्विंशति गुण खण्ड (रूप से लेकर संस्कार पर्यन्त)

६२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- प्रत्यक्ष--
चक्षुस्तैजसं परकीयस्पर्शाद्यव्यञ्जकत्वे सति परकीयरूपव्यञ्ज-
कत्वात्प्रदीपवत् । प्रदीपस्य स्वीयस्पर्शव्यञ्जकत्वादाद्यं परकी-
येति, घटादेः स्वीयरूपव्यञ्जकत्वात् व्यभिचारवारणाय द्वितीयं
परकीयेति । अथवा प्रभाया दृष्टान्तत्वसम्भवादाद्यं परकीयेति
न देयम् । चक्षुःसन्निकर्षे व्यभिचारवारणाय द्रव्यत्वं देयम् ।
भाषा-घटपटादिकोंके स्पर्शादिका न ग्राहक होकर केवल उन (घटादि) के
रूपका ग्राहक होनेसे नेत्रेन्द्रिय तैजस प्रतीत होताहै. जैसे प्रदीप घटादिके स्पर्शा-
दिका ग्राहक न होकर केवल रूपका ग्राहक है और तैजसभी है. दृष्टान्तमें प्रदीपको
स्वस्पर्शका ग्राहक होनेसे हेतुकी विशेषणासिद्धि वारणके लिये प्रथम 'परकीय' पद है.
परकीय स्पर्शादिकोंके ग्राहक न होकर विषयतासम्बन्धसे स्वकीयरूप ग्राहकत्व घटादि-
पदार्थोंमेंभी है; उनमें पूर्वोक्तहेतुका व्यभिचार होगा. उस (व्यभिचार) के वार;
णार्थ हेतुमें दूसरे 'परकीय' पदका निवेश है. अथवा 'प्रदीप' की जगह 'प्रभा' को
दृष्टान्त रक्खें तो प्रथम 'परकीय' पदके न देनेसेभी दोष नहीं प्रभामें स्वपरस्पर्शादि
ग्राहकत्व नहींहै. नेत्र घटादिके संयोगमें पूर्वोक्त हेतुका व्यभिचार होगा इसलिये
हेतुमें 'द्रव्यत्व' पदका निवेश करना चाहिये अर्थात् "द्रव्यत्वे सति स्पर्शाद्यव्यञ्ज-
कत्वे सति परकीयरूपव्यञ्जकत्वात्" इति ।
विषयं दर्शयति, वह्निरिति-
भाषा-'वह्नि' इत्यादि मूलसे ग्रन्थकार तैजसविषयको दिखलाताहै-
-वह्निस्वर्णादिर्विषयो मतः ।
भाषा-अग्नि तथा सुवर्णादि धातु यह तैजस विषय है.
ननु सुवर्णस्य तैजसत्वे किं मानमिति चेत्, न । सुवर्णं तैजसम्
असति प्रतिबन्धकेऽत्यन्तानलसंयोगेऽप्यनुच्छिद्यमानजन्यद्रव-
त्वात्, यन्नैवं तन्नैवं यथा पृथिवीति । न चाप्रयोजकं पृथि-
वीद्रवत्वस्य जन्यजलद्रवत्वस्य चाग्निसंयोगनाश्यत्वात् । ननु
पीतिमगुरुत्वाश्रयस्य पार्थिवभागस्यापि तदानीं द्रुतत्वात्तेन
व्यभिचार इति चेत्, न । जलमध्यस्थमसीक्षोदकवत्तस्याद्रु
तत्वात् ।

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ६३
शंका-सुवर्णके तैजस होनेमें क्या प्रमाण है? समाधान-किसी प्रतिबन्धकके
न होनेसेभी अत्यन्त अग्निका संयोग होनेसेभी सुवर्णमें अनुच्छिद्यमान द्रवण रहता है
इसलिये जाना जाता है कि, सुवर्ण तैजस है. ( यन्नैवं ) जो प्रतिबन्धकके न होनेसे
अत्यन्त अग्निके संयोग होनेसे अनुच्छिद्यमान द्रवणवाला नहींहै अर्थात् जिसके द्रव-
णका उच्छेद ( विनाश ) होजाताहै, ( तन्नैवं ) वह तैजसभी नहीं है; जैसे पृथिवीहै.
शंका-तुम्हारा अनुमान अप्रयोजक है अर्थात् अनुकूल तर्कके अभाववाला है.
याते सुवर्णके तैजस न होनेसेभी पूर्वोक्त हेतु सुवर्णमें रहे तो दोष नहीं. समाधान-
घृतलाक्षादि पृथिवीमें जो द्रवण है तथा जन्य जलमें जो द्रवण है वह अग्निसंयोगसे नष्ट
हो जाताहै. सुवर्णके द्रवणका नाश नहीं होता. यही पूर्वोक्त अनुमानमें अनुकूलतर्क
है.शंका- पीतरूपके तथा गुरुत्वके आश्रय पृथिवीके भागोंकाभी तो उसकालमें
सुवर्णके साथही द्रवण होताहै. उनमें पूर्वोक्त हेतुका व्यभिचार होगा. समाधान-
जलके बीच घुले हुये स्याहीके चूर्णकी तरह सुवर्णमें होनेवाले पृथिवीके पीत भागभी
द्रवणयुक्त नहीं केवल जलके तथा सुवर्णके सम्बन्धसे उभयत्र पार्थिव भागोंमें द्रवणकी
भ्रमात्मक प्रतीति होतीहै.
अपरे तु पीतिमाश्रयस्यात्यन्ताग्निसंयोगेऽपि रूपापरावृत्तिदर्श-
नात्तत्प्रतिबन्धकं विजातीयं द्रवद्रव्यं कल्प्यते । तथाहि ।
अग्निसंयोगे पीतिमगुरुत्वाश्रयो विजातीयरूपप्रतिबन्धकद्रवद्र-
व्यसंयुक्तः,अत्यंताग्निसंयोगेऽपि पूर्वरूपविजातीयरूपानधिकरण-
पार्थिवत्वात् । जलमध्यस्थपीतपटवत्, तस्य च पृथिवीजल-
भिन्नस्य तेजस्त्वनियमात् ।
भाषा-कई एक आचार्य ऐसेभी कहतेहैं कि, पीतरूपके आश्रय पार्थिवभागोंका
अति अग्निके संयोग होनेसेभी रूप बदलता नहीं देखाजाता इसलिये अग्निसंयोगसे
पार्थिवभागोंमें रूप न बदलने देनेवाला कोई विजातीय विलक्षण तथा द्रवणयुक्त
द्रव्यप्रतिबन्धक कल्पना करना उचितहै उस कल्पनाका प्रकार यह है कि, जैसे जल-
पूरित पात्रमें पीत वस्त्र डालकर अग्निपर वह पात्र रखा जाय तो अत्यन्त अग्निका
संयोग होनेसेभी वस्त्रका पूर्वरूपसे विलक्षण रूप नहीं देखाजाता; वैसेही पीतरूपयुक्त
तथा गुरुत्वके आश्रय सुवर्णस्थ पार्थिवभागोंमेंभी अत्यन्त अग्निसंयोग होनेसेभी पूर्वरूप
से विलक्षणरूपकी अधिकरणता प्रतीत नहीं होती.इससे जाना जाताहै कि वह सुवर्णस्थ .
पार्थिवभाग किसी विलक्षण तथा रूपके प्रतिबन्धक द्रवणयुक्त द्रव्यके साथ मिश्रित
हैं; वह विलक्षण द्रव्य पृथिवी जलसे भिन्न होनेसे नियमसे तेजःपदार्थ है.

६४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
वायुं निरूपयति, अपाकज इति ।
भाषा-'अपाकज' इत्यादिग्रंथसे मूलकार वायुका निरूपण करताहै ।
अपाकजोऽनुष्णाशीतस्पर्शस्तु पवने मतः ॥ ४२ ॥
तिर्यग्गमनवानेष ज्ञेयः स्पर्शादिलिङ्गकः ।
भाषा-अग्निसंयोगसे न उत्पन्न होनेवाला जो शीत उष्णसे भिन्न मध्यराशीका
स्पर्श उसवाला वायु है ॥ ४२ ॥ यह वायु टेढ़ी गतिवाला है, स्पर्शादिक हेतुओंसे
वायुका आनुमानिक ज्ञान होताहै.
अनुष्णाशीतस्पर्शस्य पृथिव्यामपि सत्त्वादुक्तमपाकज इति ।
अपाकजस्पर्शस्य जलादावपि सत्त्वादुक्तमनुष्णाशीतेति । तेन
वायवीयो विजातीयः स्पर्शो दर्शितः। तज्जनकतावच्छेदकं वायु-
त्वमिति भावः ।
भाषा-अनुष्णाशीतस्पर्शयुक्त पृथ्वीभी है, उससे वायुके लक्षणकी अव्याप्ति-वार-
णार्थ लक्षणमें 'अपाकज' पद अनुष्णाशीतस्पर्शका विशेषण किया है, अपाकजस्पर्श
जल तथा अग्निमें है; उनसे अतिव्याप्तिवारणार्थ लक्षणमें 'अनुष्णाशीत' पदका प्रवेश
है, इतने कथनसे वायुमें अग्नि जल पृथ्वीसे विलक्षण स्पर्श दिखलाया है, उस वि-
लक्षणस्पर्शनिष्ठजन्यता निरूपित जनकता वायुमें है, जनकताका अवच्छेदक 'वा-
युत्व जाति है.
एष वायुः स्पर्शादिलिङ्गकः । वायुर्हि स्पर्शशब्दधृतिकम्पैरनु-
मीयते, विजातीयस्पर्शेन विलक्षणशब्देन तृणादीनां धृत्या
शाखादीनां कम्पनेन च वायोरनुमानात् । यथा च वायोर्न प्रत्यक्षं
तथाऽग्रे वक्ष्यते ।
भाषा-इस वायुका स्पर्शादि (लिङ्ग) हेतुओंसे आनुमानिक ज्ञान होता है. इसके
अनुमापक स्पर्श शब्द, धारण, और कम्पन ये चार हेतु हैं. अर्थात् विलक्षणस्पर्शसे वि-
लक्षण शब्दसे तृणादि गुरुपदार्थोंके धारणसे वृक्षादिकोंके कंपनसे वायुका आनुमानिक
ज्ञान होता है. अनुमान रचनाका प्रकार यह है कि-जो यह रूपवाले द्रव्यमें समवाय
सम्बन्धसे न रहनेवाला स्पर्श है वह किसीके आश्रितहै. पृथ्वी समवेतस्पर्शकीतरह स्पर्श
होनेसे । इति १ । एवं रूपवाले द्रव्यका अभिघात न होनेसेभी जो यह पुष्पपत्रादि

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ६५
कोंमें शब्द सन्तति है; वह किसी स्पर्शवाले तथा वेगवाले द्रव्यके संयोगसे जन्य है.
दण्डाभिघातसे भेरीशब्दकी तरह अवयवोंके न विभाग होनेसेभी द्रव्यसम्बन्धि शब्द
सन्तति होनेसे-इति २; एवं आकाशमें तृणतूलादिकोंकी धृति किसी स्पर्शवाले
तथा वेगवाले द्रव्यके संयोगहेतुका है, नौका धृतिकी तरह अस्मदादिकोंसे अनधिष्ठित
द्रव्यधृति होनेसे-इति ३; एवं रूपवाले द्रव्यके अभिघातसे विना जो तृणशाखादिमें
क्रिया है वह किसी स्पर्शवाले तथा वेगवाले द्रव्यके अभिघातसे जन्य है. नदीप्रवाह
में प्रवाहित तृणक्रियाकी तरह विलक्षण क्रिया होनेसे-इति ४; जिस रीतिसे वायुका
प्रत्यक्ष नहीं होता वह रीति आगे आत्मानिरूपणमें कहेगा.
पूर्ववन्नित्यतायुक्तं -
भाषा-वायुका नित्य अनित्यपना जलकी तरहही कहा है.
पूर्ववदिति । वायुर्द्विविधः, नित्योऽनित्यश्च, परमाणुरूपो नित्य-
स्तदन्योऽनित्यः समवेतश्च, सोऽपि त्रिविधः शरीरेन्द्रियविषय-
भेदात् । तत्र शरीरमयोनिनं पिशाचादीनाम्, परंतु जलीय-
तैजसवायवीयशरीराणां पार्थिवभागोपष्टम्भादुपभोगसाधनत्वं
जलादीनां प्राधान्याज्जलीयत्वादिकमिति ।
भाषा-अर्थात् वायु नित्यानित्यभेदसे दो प्रकारका है. परमाणुरूप वायु नित्य है
और कार्य्यरूप अनित्य है. तथा समवायसम्बन्धसे स्वअवयवोंमें रहता है. वह अ-
नित्यवायुभी शरीरभेदसे, इन्द्रियभेदसे तथा विषयभेदसे तीन प्रकारका है. उनमेंसे
वायवीय शरीर तो अयोनिज पिशाचादिकोंका वायुलोकमें मसिद्ध है; परन्तु इतना वि-
शेष है कि जलीय शरीरोंको तथा तैजस शरीरोंको तथा वायवीय शरीरोंको भोग उप
करणता पार्थिवभागोंकी मिलावटसे है. जलीयत्व आदि व्यवहार तो जलादिकों
की प्रधानता होनेसे होताहै.
अत्र यो विशेषस्तमाह, देहव्यापीति-
भाषा-'देहव्यापि' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार त्वगिन्द्रियनिष्ठ विशेषताको कहताहै-
देहव्यापि त्वगिन्द्रियम् ॥ ४३ ॥
भाषा-सर्वशरीरमें व्यापक त्वगिन्द्रिय वायवीय है ॥ ४३ ॥
शरीरव्यापकं स्पर्शग्राहकमिन्द्रियं त्वक् । तच्च वायवीयं रूपा-
दिषु स्पर्शस्यैव व्यञ्जकत्वादङ्गसङ्गिसलिलशैत्यव्यञ्जकव्यजन-
वातवत् ।
५

६६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
भाषा-यावत् शरीरमें व्यापक तथा स्पर्शका ग्राहक त्वक्इन्द्रिय है. वह रूपादि-
कोंके मध्यमेंसे स्पर्शहीका ग्राहक होनेसे वायवीय है, जैसे व्यजन (पंखे) का
पवन शरीरसम्बन्धि स्वेदरूप जलके केवल शैत्यहीका ग्राहक है तद्वत् ॥ ४३ ॥
विषयं दर्शयति, प्राणादिरिति-
भाषा-‘प्राणादि’ इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार वायवीय विषयको दिखलाता है-
प्राणादिस्तु महावायुपर्यन्तो विषयो मतः ।
भाषा-प्राणादिवायुसे लेकर महावायुपर्यन्त वायवीय विषय है.
यद्यप्यनित्यो वायुश्चतुर्विधस्तस्य चतुर्थी विधा तु प्राणादिरि-
त्युक्तमाकरे । तथापि संक्षेपादत्र त्रैविध्यमुक्तम् । प्राणस्त्वेक एव
हृदादिनानास्थानवशान्मुखनिर्गमादिनानाक्रियावशाच्च नाना-
संज्ञां लभत इति ।
भाषा-यद्यपि अनित्य वायु चार प्रकारका है. उसका चौथा भेद प्राणादिवायु है;
यह वार्ता प्रशस्तपादभाष्यमें लिखी है, तथापि इस ग्रन्थमें संक्षेपसे अनित्य वायुके
तीन भेदही कहे हैं. प्राणवायु एकभी हृदयादि नानास्थानभेदसे तथा मुखनिर्गमनादि
नानाक्रियाके भेदसे ‘प्राण अपान आदि’ नाना संज्ञाको लाभ करता है.
आकाशं निरूपयति, आकाशस्येति-
भाषा-‘आकाशस्य’ इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार आकाशका निरूपण करे है-
आकाशस्य तु विज्ञेयः शब्दो वैशेषिको गुणः ॥ ४४॥
भाषा-शब्दात्मक विशेष गुणवाला आकाश जानना योग्य है ॥ ४४ ॥
आकाशकालदिशामेकैकव्यक्तित्वादाकाशत्वादिकं न जातिः
किंवाकाशत्वं शब्दाश्रयत्वम् । वैशेषिक इति कथनं तु विशेष-
गुणान्तरव्यवच्छेदाय । एतेन प्रमाणमपि दर्शितम् ।
भाषा-आकाश काल तथा दिशाको एक एक व्यक्ति होनेसे आकाशत्वादिधर्म
जातिरूप नहीं है, किंतु समवायसम्बन्धसे शब्दका आश्रयही आकाश है. मूल
कारिकामें ‘वैशेषिक’ यह कथन तो विशेष गुणान्तर व्यवच्छेदके वास्ते है; अ-
र्थात् आकाशमें शब्दके सिवाय विशेष गुणान्तर नहीं है; इतने कथनसे आकाशमें
प्रमाणभी दिखलाया है; वह प्रमाण अनुमान है.

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ६७
तथाहि । शब्दो विशेषगुणश्चक्षुर्ग्रहणायोग्यबहिरिन्द्रियग्राह्यजा-
तिमत्त्वात् स्पर्शवत्, शब्दो द्रव्यसमवेतो गुणत्वात् संयोगवत्
इत्यनुमानेन शब्दस्य द्रव्यसमवेतत्वे सिद्धे, शब्दो न स्प-
र्शवद्विशेषगुणोऽग्निसंयोगासमवायिकारणकत्वाभावे सत्यकारण-
गुणपूर्वकप्रत्यक्षत्वात् सुखवत् । पाकजरूपादौ व्यभिचारवार-
णाय सत्यन्तम् । पटरूपादौ व्यभिचारवारणायाकारणगुणपूर्व-
केति । जलपरमाणुरूपादौ व्यभिचारवारणाय प्रत्यक्षति ।
भाषा—उसका प्रकार यह है कि-शब्दभी स्पर्शकी तरह गुणहै. नेत्रसे ग्रहणके अ-
योग्य होकर बाह्य इन्द्रियसे ग्रहण योग्य'शब्दत्व'जातिवाला होनेसे-इति. इस अनुमान
से शब्दको गुण न माननेवाले वैयाकरण तथा मीमांसकके मतका खण्डन किया
और अग्रिम अनुमानमें स्वरूपासिद्धिका परिहारभी किया है. दूसरा अनुमान यह
है कि-शब्द संयोगकी तरह गुण होनेसे किसी एक द्रव्यमें समवायसम्बन्धसे रहता
है, इस अनुमानसे 'शब्द ' को द्रव्यसमवेतत्वसिद्धिके पश्चात् ' शब्द ' स्पर्शवाले
द्रव्योंका विशेष गुण नहीं है, सुखकी तरह अग्निसंयोगरूप असमवायिकारणत्व अ-
भावविशिष्ट अकारणगुणपूर्वक प्रत्यक्ष होनेसे; इस अनुमानसे यह सिद्ध हुआ कि
'शब्द' पृथिवी आदि चतुष्टयका विशेष गुण नहीं है, पृथिवीनिष्ठ पाकजरूपका प्रत्यक्ष
अकारण गुणपूर्वकहै उससे प्रकृत हेतुका व्यभिचार वारणार्थ"अग्निसंयोगासमवायिकारण
कत्वाभावेसति"यह सप्तमीअन्त हेतुका विशेषण कहा. पार्थिवरूपका असमवायिकारण
अग्निसंयोग है, याते व्यभिचार नहीं है. एवं यदि सप्तमीअन्तमात्र हेतु रक्खें तो
पटादिके रूपमें हेतु व्यभिचारी होगा,क्योंकि पटके रूपमें अग्निसंयोगासमवायिकारण-
कत्वाभाव सिद्ध है, इसलिये 'अकारण गुणपूर्वक प्रत्यक्षत्व' कहा. पटके रूपका प्रत्यक्ष
अकारण गुणपूर्वक नहीं है;किन्तु पटका कारणीभूत जो तन्तु उनके रूपग्रहणपूर्वक
पटके रूपका प्रत्यक्ष है, याते व्यभिचार नहीं है. एवं यदि हेतुमें 'प्रत्यक्ष' पद नहीं
देवें तो समग्र हेतुका व्यभिचार जलीय परमाणुओंके रूपमें होगा; क्योंकि जलीय
परमाणुभी अग्निसंयोगासमवायिकारणकत्वाभावविशिष्ट अकारणगुणपूर्वक है; परन्तु
प्रत्यक्ष नहीं है याते व्यभिचार नहीं है-इति ॥
शब्दो न दिक्कालमनोगुणो विशेषगुणत्वात् । नात्मविशेषगुणो
१ जो लौकिक सम्बन्धसे इन्द्रियग्राह्य हो और लौकिक सम्बन्धहीसे द्विइन्द्रियसे ग्रहणकी
योग्यता न रखता हो तथा गुणत्वव्याप्य जातिवाला हो वह ' विशेषगुण ' कहाताहै. इस
लक्षणके लक्ष जो विशेषगुण हैं उनका निरूपण ' बुद्ध्यादिषट्कं ' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार
स्वयं करेगा.

६८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
बहिरिन्द्रियग्राह्यत्वादूपवत् । इत्थं च शब्दाधिकरणं नवमद्रव्यं
गगननामकं सिद्ध्यतीति । न च वायववयवेषु सूक्ष्मशब्दक्रमेण
वायौ कारणगुणपूर्वकः शब्द उत्पद्यतामिति वाच्यम् । अया-
वद्द्रव्यभावित्वेन वायुविशेषगुणत्वाभावात् ॥ ४४ ॥
भाषा-तत्पश्चात् 'शब्द' दिशाका तथा कालका तथा मनकाभी गुण नहीं है;
रूपकी तरह विशेष गुण होनेसे-इति. ऐसा अनुमान करना उचित है. एवं शब्द
आत्माका विशेष गुणभी नहीं है, रूपकी तरह बाह्य इन्द्रियसे ग्रहणकी योग्यतावाला
होनेसे-इति. इसीरीतिसे शब्दका अधिकरण नवम द्रव्य 'गगन' नामकासिद्ध होता है.
शंका-यदि ऐसा मानलें कि, वायुके अवयवोंमें प्रथम सूक्ष्मशब्द उत्पन्न होता है,
पश्चात् क्रमसे स्थूलवायुमें कारणगुणपूर्वक स्थूल शब्द उत्पन्न होता है तो क्या दोषहै?
समाधान-पृथ्वीआदि चतुष्टयमें जो गुण रहता है वह सभी अपने आश्रयके नाश
होनेसे नाश होता है और शब्द अयावत् द्रव्यभावीहै अर्थात् शब्द के आश्रय द्रव्यके
नाशसे जन्य जो नाश उस नाशका प्रतियोगी शब्द नहीं है; याते शब्दवायुका विशेष
गुणभी नहीं है-
तत्र शरीरस्य विषयस्य चाभावादिन्द्रियं दर्शयति,इन्द्रियमिति-
भाषा-आकाशीय शरीर तथा विषयका अभाव होने से. 'इन्द्रियं' इत्यादि
ग्रन्थसे मूलकार इन्द्रियको दिखलाता है ।
इन्द्रियं तु भवेच्छ्रोत्रं -
भाषा-श्रवण इन्द्रिय आकाशसे उद्बुद्ध हुआ है.
नन्वाकाशं लाघवादेकं सिद्धम्,श्रोत्रं तु पुरुषभेदेन भिन्नं तत्कथ-
माकाशं स्यादत आह, एकः सन्नपीत्यादि-
शंका-आकाश लाघवसे एक सिद्धहै और श्रोत्र तो पुरुषभेदसे भिन्नरहै वहकैसे
आकाश हो सकताहै?समाधान-'एकइत्यादि'ग्रन्थसे मूलकार समाधान लिखताहै-

  • एकः सन्नप्युपाधितः ।
    भाषा-आकाश एकभी उपाधि भेदसे भिन्न २ है.
    आकाश एक एव सन्नप्युपाधेः कर्णशष्कुल्यादेर्भेदाद्भिन्नं श्रोत्रा-
    त्मकं भवतीत्यर्थः ।

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ६९
भाषा-एकही आकाश ( कर्णशष्कुली ) श्रोत्रछिद्ररूप उपाधिके भेदसे भिन्न २
श्रोत्रात्मक होता है-इति ।
कालं निरूपयति, जन्यानामिति-
भाषा-‘जन्यानां’ इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार कालका निरूपण करे है-
जन्यानां जनकः कालः-
भाषा-जन्य पदार्थोंका ( जनक) साधारण निमित्त कारण काल है,
तत्र प्रमाणं दर्शयितुमाह, जगतामिति-
भाषा-जगतां ‘इत्यादि’ ग्रन्थसे मूलकार कालमें प्रमाण दिखलाता है-
-जगतामाश्रयो मतः ॥ ४५ ॥
भाषा-वह काल सर्व जगत्का आधार है ॥ ४५ ॥
तथाहि । इदानीं घट इत्यादिप्रतीतिः सूर्यपरिस्पन्दादिकं
विषयीकरोति तदा सूर्यपरिस्पन्दादिना घटादेः सम्बन्धो
वाच्यः । स च संयोगादिर्न सम्भवतीति काल एव तत्सम्बन्ध-
घटकः कल्प्यते । इत्थं च तस्याश्रयत्वमपि सम्यक् ॥ ४५ ॥
भाषा-उसका प्रकार यह है कि “इदानींघटः-अर्थात् इसकालमें घटहै” इत्याकारक
(प्रतीति) ज्ञान यदि सूर्यकी क्रियाको विषय करता है तो सूर्यकी क्रियाके साथ
घटादिकोंका कोई सम्बन्ध कहना चाहिये; वह सम्बन्ध संयोगसमवाय तो नहीं है.
किन्तु ‘स्वाश्रयतपनसंयोगि संयोग’ रूपसम्बन्ध है. ‘स्व’ पदसे सूर्यकी क्रियाका
ग्रहण है, उसका आश्रय सूर्य है, उसका संयोगि काल है, उसका संयोग घटादिके
साथ है. इत्याकारक सम्बन्धका (घटक) मध्यपातिरचक कालही कल्पना किया जाताहै.
इस रीतिसे उक्त पदार्थोंसे भिन्न काल सिद्ध हुआ तो उसको पूर्वोक्त जगत्का आधार
भी कहना उचित है ॥ ४५ ॥
प्रमाणान्तरं दर्शयति, परापरत्वेति-
भाषा-‘परापरत्व’इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार कालमें प्रमाणान्तर दिखलाता है,
परापरत्वधीहेतुः-
भाषा-परत्व तथा अपरत्व बुद्धिका हेतुभी कालही है.
परत्वापरत्वबुद्धेर साधारणं निमित्तं काल एव । परत्वापरत्वयो-

७० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
रसमवायिकारणसंयोगाश्रयो लाघवादतिरिक्तः कल्प्यत
इति भावः ।
शंका-ज्येष्ठभ्रातामें 'परत्व' ज्ञान होता है, तथा कनिष्ठ भ्रातामें 'अपरत्व' ज्ञान
होता है. ऐसे परत्व अपरत्वके ज्ञानका असाधारण निमित्त कारण केवल ' काल '
है. कालिक परत्व अपरत्वका असमवायिकारण जो काल पिण्डका संयोग उसका (अनु-
योगिता सम्बन्धसे ) आश्रय लाघवसे एक पृथक् काल कल्पना हो सकता है.
नन्वेकस्य कालस्य सिद्धौ क्षणदिनमासवर्षादिसमयभेदो न
स्यादत आह, क्षणादिरिति-
शंका-कालके एकसिद्ध होनेसेभी क्षण दिवस मास वर्ष तथा युग इत्यादि भेदरूप
व्यवहार नहीं होसकेगा.

  • क्षणादिः स्यादुपाधितः ।
    समाधान-कालमें क्षणादिव्यवहार उपाधि प्रयुक्त है.
    कालस्त्वेकोऽप्युपाधिभेदात्क्षणादिव्यवहारविषयः । उपाधि-
    स्तु स्वजन्यविभागप्रागभावावच्छिन्नं कर्म । पूर्वसंयोगावच्छिन्न
    विभागो वा । पूर्वसंयोगनाशावच्छिन्न उत्तरसंयोगप्राग्भावो
    वा । उत्तरसंयोगावच्छिन्नं कर्म वा ।
    भाषा--काल एकही उपाधिके भेदसे क्षणादिव्यवहारका विषय होसकताहै. उपा-
    धि तो यहां 'स्व'शब्दसे क्रियाका ग्रहण है. सूर्यनिष्ठा किंवा मूर्तमात्रनिष्ठा जो क्रिया
    उस क्रियासे जन्य जो विभाग उस विभागका जो प्रागभाव उस प्रागभावावच्छिन्न
    कर्मरूपहै १। अथवा पूर्वसंयोगावच्छिन्न विभागरूप है २। अथवा पूर्वसंयोगनाशावच्छिन्न
    उत्तरसंयोगप्रागभावरूप है ३ । किंवा उत्तरसंयोगावच्छिन्नकर्मरूप है ४ ।
    न चोत्तरसंयोगानन्तरं क्षणव्यवहारो न स्यादिति वाच्यम् । क-
    र्मान्तरसत्त्वादिति । महाप्रलयक्षणादिव्यवहारो यद्यस्ति त-
    दाऽनायत्या ध्वंसेनोपपादनीयः । दिनादिव्यवहारस्तु तत्तत्क्षण-
    कूटैरेवेति ।
    शंका-एक क्रियासे पूर्वोक्त उपाधि उपहित चारक्षणोंमें उत्तरसंयोग हुआ. पुनः उसके
    पश्चात् क्रियाकी समाप्ति होनेसे क्षणादिव्यवहार नहीं होना चाहिये. समाधान-एक

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ७१
क्रियाकी समाप्तिके पश्चात् उसी मूर्त्तद्रव्यमें क्षणादिव्यवहारकी नियामिका क्रियान्तर
उत्पन्न होतीहै. सिद्धान्त तो यह है कि महाप्रलयमें क्षणादिव्यवहार नहीं होता, परन्तु
यदि कोई महाप्रलयमेंभी क्षणादिव्यवहार किया चाहे तो वहां सिवाय 'तत् तत्'
पदार्थ ध्वंसके और कोई उपाधि नहीं बनसकती अर्थात् ( अनायत्या ) उपायान्तरके
अभाव होनेसे महाप्रलयकालमें क्षणव्यवहारका नियामक 'तत् तत्' पदार्थका ध्वंसही
है. दिवस मासादि व्यवहार उन क्षणोंके समुदायविशेषोंसे होताहै-इति.
दिशं निरूपयति, दूरान्तिकेति-
भाषा-'दूरान्तिक' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार दिशाका निरूपण करताहै-
दूरान्तिकादिधीहेतुरेका नित्या दिगुच्यते ॥ ४६ ॥
भाषा-पदार्थोंमें दूर तथा समीप बुद्धिका नियामक एक तथा नित्य 'दिशा'
पदार्थ है ॥ ४६ ॥
दूरत्वमन्तिकत्वं च दैशिकं परत्वमपरत्वं बोध्यम् । तद्बुद्धेर-
साधारणं बीजं दिगेव। दैशिकपरत्वापरत्वयोरसमवायिकारणसं-
योगाश्रयतया दिक् सिद्ध्यतीति भावः ॥ ४६ ॥
भाषा-दूरता तथा समीपता दैशिक परत्व अपरत्वरूपा जाननी चाहिये ।
( तद्बुद्धेः ) दैशिकपरत्व अपरत्वबुद्धिका असाधारणरूपसे प्रयोजक 'दिशा'
है. दैशिकपरत्व अपरत्वका असमवायिकारण जो दिशाका तथा वस्तुका संयोग उसका
( अनुयोगितासम्बन्धसे ) आश्रयलाघवसे एक पृथक् दिशा पदार्थ सिद्ध होताहै॥४६॥
नन्वेकैव दिग् यदि तदा प्राचीप्रतीच्यादिव्यवहारः कथमुप-
पद्यतामित्यत आह, उपाधीति-
शंका-दिशा पदार्थ यदि एक है तो उसमें 'प्राची' तथा 'मतीची' इत्यादि व्यवहार
कैसे होगा?
उपाधिभेदादेकाऽपि प्राच्यादिव्यपदेशभाक् ।
समाधान-वह दिशा एकही उपाधियोंके भेदसे 'प्राची प्रतीची' इत्यादि संज्ञाको
लाभ करतीहै.
यत्पुरुषस्योदयगिरिसन्निहिता या दिक् सा तस्य प्राची । उ-
दयगिरिव्यवहिता च प्रतीची । एवं तत्पुरुषीयसुमेरुसन्निहिता

७२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
दिगुदीची। तद्व्यवहिता त्ववाची। सर्वेषामेव वर्षाणां मेरुरुत्तरतः
स्थित इति नियमात् ।
भाषा-१जिस पुरुषसे जो देश उदयाचलके समीप है वह देश उस पुरुषकी अपे-
क्षासे 'प्राची' दिशा है. २ इस प्रकरणमें 'पुरुष'पद वस्तुमात्रका बोधक है. एवं जिस
पुरुषसे जो देश अस्ताचलके समीप है वह देश उस पुरुषकी अपेक्षासे 'प्रतीची'
दिशा है. ३ एवं जिस पुरुषसे जो देश सुमेरुपर्वतके समीप है वह देश उस पुरुषकी
अपेक्षासे 'उदीची' दिशा है. ४ एवं (तद्व्यवहिता) सुमेरुपर्वतसे व्यवधानवाला जो
देश है अर्थात् पूर्वमुख स्थित पुरुषके दाहिने हाथका जो देश है वह उस पुरुषकी
अपेक्षासे 'अवाची' दिशा है. जम्बुद्वीपके जो भारतादि ९ वर्ष (खण्ड) उन सबके उत्तर
भागमें सुमेरुकी स्थिति नियमसे रहती है याते पूर्वोक्तग्रन्थ सम्यक् है-इति ।
आत्मानं निरूपयति, आत्मेन्द्रियेति !
भाषा-'आत्मेन्द्रिय' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार आत्माका निरूपण करे हैं--
आत्मेन्द्रियाद्यधिष्ठाता-
भाषा-इन्द्रिय तथा शरीरादिके धारण करनेहारा आत्मा है.
आत्मत्वजातिस्तु सुखदुःखादिसमवायिकारणतावच्छेदकतया
सिद्ध्यति । ईश्वरेऽपि सा जातिरस्त्येव, अदृष्टादिरूपकार-
णाभावान्न तु सुखदुःखाद्युत्पत्तिः, नित्यस्य स्वरूपयोग्यत्वे
फलावश्यम्भाव इति नियमस्याप्रयोजकत्वात् ।
भाषा-सुख दुःख ज्ञान इच्छादि कार्योंकी समवायिकारणताका अवच्छेदक जो
आत्मत्वरूप धर्म तद्रूपसे आत्मत्वजातिकी सिद्धि होती है. वह आत्मत्वजाति ईश्वरमें
भी रहती है. अदृष्ट तथा शरीररूप कारणके अभावसे ईश्वर आत्मामें सुख दुःखादिकी
उत्पत्ति नहीं है. यदि कहो कि, नित्यआत्मामें स्वरूप योग्यतारूप कारणता सदा
रहती है याते कदाचित् सुखाद्युत्पत्तिरूप फलभी अवश्य होना चाहिये. तो यह कथन
युक्त नहीं, क्योंकि यह नियम जलके परमाणुओंमें व्यभिचारी होनेसे दूषित है, अर्थात्
जलीयपरमाणुओंमें स्वरूपयोग्यतारूप कारणतः होनेसेभी स्नेहकी उत्पत्ति नहीं होती
किन्तु नित्य है, याते "नित्यस्य०" इत्यादि नियम अप्रयोजक अर्थात् कारणताका
संपादक नहीं है.
परेत्वीश्वरे सा जातिर्नास्त्येव, प्रमाणाभावात् । नच दशम-

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ७३
द्रव्यत्वापत्तिः । ज्ञानवत्त्वेन विभजनादिति वदन्ति इन्द्रिया-
दीति । इन्द्रियाणां शरीरस्य च परम्परया चैतन्यसम्पादकः ।
भाषा--कई नैयायिक कहते हैं कि-ईश्वरमें ‘आत्मत्व’ जातिके माननेमें प्रमा-
णका अभाव होनेसे ईश्वरमें ‘आत्मत्व’ जाति नहींहै. शंका-उनके मतमें ईश्वरको
दशम द्रव्य मानना होगा. समाधान-वे आचार्य आत्माका और द्रव्योंसे विभाग
(समवायेन) ज्ञानवत्त्वरूपसे करते हैं; याते दशम द्रव्यत्वकी आपत्तिरूप दोष
नहीं.(इन्द्रियादीति) इन्द्रियोंमें तथा शरीरमें परंपरा अर्थात् अवच्छेदकतासम्बन्धसे
ज्ञानका सम्पादक है. यहां शरीर इन्द्रिय ‘अवच्छेदक’ हैं और आत्मा‘अवच्छेद्य’ है.
यद्यप्यात्मन्यहं जानेऽहं सुखीत्यादिप्रत्यक्षविषयत्वमस्त्येव,तथा-
पि विप्रतिपन्नं प्रति प्रथमत एव शरीरादिभिन्नस्तत्प्रतीतिगोचर
इति प्रतिपादयितुं न शक्यत इत्यतः प्रमाणं दर्शयति,
करणमिति-
भाषा--यद्यपि आत्मामें 'मैं जानता हूं, मैं सुखी हूं' इत्यादि प्रतीति होनेसे
प्रत्यक्ष विषयताभी है तथापि विवाद करनेवाले पुरुषके प्रति प्रथमही यह नहीं कह
सकते कि शरीरादिसे भि 'मैं सुखी' इत्यादि प्रतीतिका विषयही आत्मा है इसलिये
मूलकार उसमें प्रमाण दिखलाताहै-
-करणं हि सकर्तृकम् ॥ ४७ ॥
भाषा-यह नियम है कि जो करण होताहै वह कार्यसम्पादनमें कर्त्ताकी अपेक्षा
रखता है ॥ ४७ ॥
कुठारादीनां छिदादिकरणानां कर्तारमन्तरेण फलानुपधानं
दृष्टम् । एवं चक्षुरादीनां ज्ञानकरणानां फलोपधानमपि कर्तार-
मन्तरेण नोपपद्यत इत्यतिरिक्तः कर्ता कल्प्यते ॥ ४७ ॥
भाषा-छेदनादि क्रियाके करण जो कुठारादि,उनको कर्तातक्षादिसे बिनाफल छिदि
क्रियाके अनुत्पादक देखा है. ऐसेही नेत्रादि इन्द्रियभी प्रत्यक्षज्ञानके करण हैं. इन-
कोभी प्रत्यक्षज्ञानरूप फलजनकता विनाकर्त्तासे नहीं बनसकती;इससे इन्द्रियोंसे जुदा
कर्त्ताकी कल्पना हो सकतीहै ॥ ४७ ॥
ननु शरीरस्यैव कर्तृत्वमस्त्वत आह, शरीरस्येति-
शंका-शरीरहीको कर्ता मानलें तो कुछ दोष नहीं.

७४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- प्रत्यक्ष-
शरीरस्य न चैतन्यं मृतेषु व्यभिचारतः ।
समाधान--कर्ता चेतन होताहै और शरीर चेतन नहींहै; क्योंकि मृतशरीरोंमें
चेतनताका अभाव देखाजाताहै.
ननु चैतन्यं ज्ञानादिकमेव मुक्तात्मनां त्वन्मत इव मृतशरीराणा-
मपि तदभावे का क्षतिः प्राणाभावेन ज्ञानाभावस्य सिद्धेरिति
चेत् । न । शरीरस्य चैतन्ये बाल्ये विलोकितस्य स्थविरे स्मर-
णानुपपत्तेः । शरीराणामवयवोपचयापचयैरूत्पादविनाशशालि-
त्वात् ।
चार्वाक शंका-चैतन्य नाम ज्ञान इच्छादिका है; सो वह जैसे तुम्हारे
मतमें मुक्त आत्मामें नहीं रहते वैसेही हमारे मतमें शरीररूप आत्मामें मृतअवस्थामें
न रहें तो दोष नहीं क्योंकि हमारे मतमें मृत शरीरमुक्त आत्मा है और आपको
शरीरमें ज्ञानाभाव प्राण तथा आत्मा उभयके अभाव प्रयुक्त मानना पड़ता है. हमा-
रेको केवल प्राणके अभावसे शरीरमें ज्ञानाभाव माननेमें लाघव है. समाधान-यदि
शरीर चेतन हो तो बालपनमें देखे पदार्थोंका वृद्ध अवस्थामें स्मरण न होना चाहिये
शरीर पुष्टिक्षीणताकारक अवयवोंके बढ़ने घटनेसे शररिसे उत्पत्ति विनाश स्वभाववाले
अनुभव सिद्ध हैं.
न च पूर्वशरीरोत्पन्नसंस्कारेण द्वितीयशरीरे संस्कार उत्पद्यत
इति वाच्यम् । अनन्तसंस्कारकल्पने गौरवात् । एवं शरीरस्य
चैतन्ये बालकस्य स्तनपानादौ प्रवृत्तिर्न स्यात् । इष्टसाधनता-
ज्ञानस्य तद्धेतुत्वात्तदानीमिष्टसाधनतास्मारकाभावात् । मन्मते
जन्मान्तरानुभूतेष्टसाधनत्वस्य तदानीं स्मरणादेव प्रवृत्तिः ।
शंका-प्रथम शरीरके संस्कार दूसरे शरीरके संस्कारोंके जनकहैं,याते पूर्व देखे पदार्थके
स्मरणकी अनुपपत्ति नहीं है. समाधान-अवयव वृद्धिक्षीणतामयुक्त यावत् शरीर
क्षणक्षणमें बदलते हैं; उनमें यदि पूर्व २ शरीरमें उत्पन्न संस्कारोंसे उत्तर २ शरीरमें
संस्कारोंकी उत्पत्ति माने तो अनेकसंस्कार कल्पनाओंसे अति गौरव होगा. ऐसेही
यदि शरीरही चेतन हो तो प्रथम उत्पन्न हुये बालककी अपनी माताके स्तनसे दूध
पीनेमें प्रवृत्ति नहीं होनी चाहिये;क्योंकि प्रवृत्तिका कारण इष्ट साधनताका "इदं मदि-
ष्टसाधन" इत्याकारक ज्ञान है और प्रथम उत्पन्न स्तनपानप्रवृत्तिके पूर्वकालमें इष्ट-