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नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

( ६० )
भरत के उत्तरभावी साहित्य के आचार्यों ने इसी अलङ्कारपद्धति को धीरे-धीरे
विकसित, व्यवस्थित एवं व्यापक बनाकर उसे शास्त्रीय गौरव की इतनी
ऊँचाई तक पहुँचा दिया कि फिर उनके सम्मुख 'लक्षण' नीची स्थिति में
दिखाई देने लगे तथा इसी कारण उनकी स्थिति गौण बनती चली गयी ।
इतना होने पर भी काव्यशास्त्र के (तथा काव्य के) अङ्ग के रूप में अलङ्कार
के निरूपक आचार्यों में भरत ही सर्वप्रथम आचार्य रहे थे । अतः यह
ऐतिहासिक गौरव भी केवल भरतमुनि को ही प्राप्त है, यह निर्विवाद है ।
लक्षण तथा अलङ्कारगत विभेद—भरत प्रतिपादित लक्षणों तथा
अलङ्कारों के सन्दर्भ में विचार की स्थिति में सर्वप्रथम इनके विभेद पर भी
ध्यान जाता है। भरतमुनि ने लक्षणों तथा अलङ्कारों के जो विवरण दिये
उनके अनुशीलन से यह स्पष्ट हो जाएगा कि लक्षण की महिमा से ही
अलङ्कारों के द्वारा काव्य में शोभा का आधान होता है। आचार्य अभिनव-
गुप्तपाद ने अलङ्कारों के इस आधारभूत तथ्य को काव्यरचना की प्रासाद-
रचना से तुलना करते हुए समझाया कि लक्षण तो काव्यरचना में भित्ति
स्थानीय होते है तथा उन पर चित्ररचना के कार्य के समान अलङ्कारों का
प्रयोग माना गया है । काव्य में अलङ्कार उस रत्नमाला के समान है जो
अलङ्कार्य या शरीर से भिन्न हो जब कि लक्षण शारीरिक ( एवं ) सहज
सौन्दर्य है जो बिना अङ्कारों के भी सुन्दर होता है ।१
नाट्यशास्त्र में निरूपित अलङ्कार—काव्य के प्रसंग में भरतमुनि ने
केवल चार अलङ्कारों का निरूपण किया है जिनमें उपमा, रूपक तथा दीपक
अलङ्कारों को उत्तरभावी आचार्यों ने अर्थालङ्कार तथा यमक को शब्दालङ्कार
माना । अलङ्कारों के सन्दर्भ में उनका शब्द तथा अर्थगत विभेद भरत के
समय तक उद्भावित नहीं हुआ था जिससे एक परम्परा प्रवर्तित हो, परन्तु
भरतमुनि अलङ्कारों के व्यापक सामर्थ्य से परिचित प्रतीत होते हैं, यह उनके
ग्रन्थ के अनुशीलन से समझा जा सकता है । इसी कारण उनके ग्रन्थ में
बीजरूप में अलङ्कारों का ( काव्य के उपकरणों के सन्दर्भ में ) निरूपण करने
के पश्चात् अन्त में यह भी कहा गया कि अर्थक्रियापेक्षी लक्षणों तथा अलङ्कारों
के द्वारा काव्य की रचना की जाए । यहाँ अर्थक्रिया से उनका आशय यही
है कि काव्य में रस की अपेक्षा अवश्य रहनी चाहिए, क्योंकि सौन्दर्याधायक
तत्व—चाहे वे फिर एतादृश अलङ्कार ही क्यों न हों—समवाय सम्बन्ध से
रस के उपकारक होंगे । उसी प्रकार जैसे कटक केयूर शरीर के शोभाधायक
१. द्रष्ट०—अभिनवभारती Vol. II पृ० २६२-२६७ ।

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बन कर उसकी आत्मा के भी उपकारक बन जाते हैं। वे केवल बहिरंग के
प्रसाधक मात्र नहीं रहते । भरतमुनि का यह संकेत मानवीय वृत्तियों एवं
संवेदनाओं की उद्भावक ऐसी ही काव्यरचनाओं को करता है जो रससम्पृक्त
हों । कालान्तर में अलङ्कार-पद्धति का विकास रस से स्वतन्त्र होकर
चमत्कार की उद्भावक एवं असाधारण उक्ति वैचित्र्य को प्रश्रय देने वाली
प्रवृत्तियों की बहुलता को लेकर हुआ, जिसने कविता को सर्वजनसंवेद्य एवं
सहजवेद्य ( तथा सरस ) रूप से हटाकर अनेक रत्नादि के हार तथा
विभूषणादि से मण्डित रमणी के सौन्दर्य को दिखलाने की प्रवृत्ति में अधिक
रुचि ली । यह शोभा के प्रसार की न्यूनाधिक मात्रा को अलङ्कारादि से
सम्पादित करने वाली विभेदकशक्ति थी जिसे इसी रुचि की पूर्ति में पूर्णतः
जुटा दिया गया था । अतः यहाँ अब हम क्रमशः नाट्यशास्त्र में चर्चित
अलङ्कारों का थोड़ा विवरण देते हैं ।
उपमा—गुण तथा आकृति की समानता के आधार पर दो भिन्न
वस्तुओं का उपमित होना 'उपमा' है । विषय की दृष्टि से नाट्यशास्त्र में
उपमा के प्रभेद भी पाँच रूप में दिखलाये गये हैं । प्रशंसा में प्रशंसोपमा,
निन्दा में निन्दितोपमा, कल्पना में कल्पितोपमा, सादृश्य में सादृश्योपमा तथा
किञ्चित् सादृश्य में किञ्चित् सदृशोपमा । यद्यपि उपमा के रूप प्राचीन वैदिक
मन्त्रों में प्राप्त थे तथा यास्क के निरुक्त में इसकी चर्चा भी है किन्तु इसकी
सर्वप्रथम शास्त्रीय परिभाषा देकर प्रभेद विनिश्चय प्रथमतः भरतमुनि ने ही
किया जिसके आधार पर बाद में आगे चलकर अनेक उपमामूलक नवीन
अलङ्कारों की उद्भावना हुई । भारतीय कविता की सौन्दर्यसृष्टि में उपमा
का योगदान महत्वपूर्ण तथा ऐतिहासिक भी है । अनन्वय, उपमेयोपमा,
प्रतिवस्तूपमा, अपह्नुति, सन्देह, भ्रान्तिमान्, अतिशयोक्ति जैसे सादृश्यमूलक
अलङ्कार उपमा के विस्तार,या विकास ही हैं। इसी कारण उत्तरभावी
अलङ्कार शास्त्र के प्रसिद्ध विद्वान् अप्पयदीक्षित ने उपमा को ऐसी नटी
निरूपित किया जो काव्य के रङ्गमञ्च पर विभिन्न भूमिकाओं में अवतरित
होकर सहृदयों के चित्त का अनुरञ्जन करती हो ।¹
दीपक—एक अर्थ के द्वारा अनेक अर्थों का दीपक की भाँति प्रकाशक
“दीपक” है। भरतमुनि ने उपमा की तरह दीपक के अनेक प्रभेद नहीं
किये । अभिनवगुप्तपाद ने भरत के लक्षण के आधार पर इसी के स्वरूप
१. “उपमैका शैलूषी सम्प्राप्ता चित्रभूमिकाभेदात् ।
रञ्जयति काव्यरङ्गे नृत्यन्ती तद्विदां चेतः ॥”—कुव०

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को—'एक अवान्तर से असंयुक्त रहकर जो क्रिया, गुण, जाति आदि की
आकाङ्क्षा की सम्यक् पूर्ति करता हो तो उसे दीपक की प्रकृति के कारण
‘दीपक’ समझना चाहिए’ कहकर विशेष स्पष्ट किया जिसकी भरतमुनि के
द्वारा दिये गये उदाहरण से पुष्टि होती है ।
रूपक—इस अलङ्कार में किञ्चित् सादृश्य तथा तुल्यावयवत्व की स्थिति
होती है । इसके भी मुनि ने प्रभेद नहीं किये किन्तु उनके विवरण से रूपक के
साङ्ग या एकदेशविवर्ति होने के संकेत अवश्य मिल जाते हैं । यहाँ पाठभेद में
रूपक का अन्य एक लक्षण भी मिलता है । ( जिसकी व्याख्या यथास्थान
देखनी चाहिए ) ।
यमक—भरतमुनि ने यमक अलङ्कार के लक्षण तथा उसके प्रभेदों के
सोदाहरण विवरण से शब्दालङ्कारों को आधार प्रदान किया यह स्पष्ट ही
प्रतीत होता है । यहाँ भरतमुनि ने वर्गीकरण के उद्देश्य से यमक के प्रभेद
नहीं किये केवल वर्णन ही उनका लक्ष्य था । इसी कारण उन्होंने शब्दाभ्यास
को ही यमक का लक्षण बतला कर उसके दस प्रभेद कर डाले थे । यहाँ
इस प्रकार किसी क्रम की स्थापना प्रतीत नहीं होती है । आगे चलकर ये
प्रभेद इस प्रकार बन जाते हैं—(१) पादान्त-यमक, (२) काञ्ची-यमक,
(३) समुद्ग-यमक, (४) विक्रान्त-यमक, (५) चक्रवात-यमक, (६) सन्दष्ट-
यमक, (७) पादादि-यमक, (८) आम्रेडित-यमक ( या पादान्ताम्रेडित-
यमक ), (६) चतुर्व्यवसित-यमक तथा (१०) माला-यमक ।
नाट्यशास्त्र में इन प्रभेदों के लक्षण तथा उदाहरण देकर विषय को
हृदयंगम करवाया गया है । इसमें मालायमक में एक व्यञ्जन की समस्त
पद्य में आवृत्ति रहने से इसे परवर्ती आचार्यों ने एक विशिष्ट अलङ्कार के
अनुप्रास नाम को देकर इसके प्रभेद दिखलाये । भरत प्रतिपादित इन प्रभेदों
ने आगे चल कर यमक के अनेक प्रभेदों को आधार प्रदान किया जिसे
अग्निपुराण, दण्डी के काव्यादर्श, भामह के काव्यालङ्कार तथा भट्टिकाव्य में
देखा जा सकता है । यहाँ हम विस्तारभय से तथा अप्रासङ्गिक रहने से
इसकी चर्चा नहीं करेंगे । क्योंकि यमकों के प्रभेद उस समय वर्गीकरण की
स्थिति में नहीं थे अतः इनके उदाहरणों की स्थिति से भी अन्वेषक विद्वानों
को अधिक सन्तोष नहीं हुआ१ । आचार्य अभिनवगुप्तपाद ने यमक के प्रभेदों
के उदाहरणों की यथाशक्य संगति बैठाने का अवश्य उद्योग किया था ।
१. विस्तार के लिए द्रष्टव्य—डॉ० रुद्रदेव त्रिपाठी—'संस्कृत साहित्य में
शब्दालङ्कार, पृष्ठ—११६-१२० का विवरण ।

( ६३ )
अलङ्कारशास्त्र को नाट्यशास्त्र का आधार—यद्यपि नाट्यशास्त्र में
शब्द तथा अर्थ के आधार पर शब्दालङ्कार तथा अर्थालंकारों की परिकल्पना
तथा चर्चा नहीं हुई और नहीं विभाजन ही हुआ किन्तु इन अलङ्कारों के
विवेचन में परवर्ती अलंकारों की शब्द तथा अर्थगत स्थिति के प्रभेदों की
सम्भावनाएँ विद्यमान थीं। भरतमुनि ने नाट्यलक्षणों के अतिरिक्त चार पृथक्
अलंकारों का विवरण दिया था जब कि अलङ्कारों की संख्या अप्पयदीक्षित के
समय ( १७ वीं शती ) तक एक सौ चौबीस हो चुकी थी ( और वह भी
केवल अर्थालङ्कारों की ) जिनमें अलंकारों के अवान्तर भेदों का पृथक् (ही)
विस्तार है। इस प्रसंग में एक स्वाभाविक प्रश्न उपस्थित होता है कि क्या
भरतमुनि को केवल चार अलङ्कारों का निरूपण ही अभीष्ट था तथा उन्होंने
अपने समय तक प्रचलित सभी साहित्यिक तथ्यों के सभी पक्षों पर समान रूप
में तथा न्यायपूर्ण चिन्तन किया था। अब इस प्रश्न के सन्दर्भ में साहित्य तथा
उसके ऐतिहासिक क्रम पर दृष्टि डाली जाए तो यह स्पष्ट हो जायगा कि
नाट्यशास्त्र को गम्भीरता से देखने पर उपर्युक्त आशंका के लिये स्थान ही
कम रह जायगा।
भरतमुनि ने लक्षणों एवं अलङ्कारों का निरूपण किया था तथा उनमें विभेद
भी दर्शाया था जैसा पिछले विवरण से स्पष्ट है। इसमें जहाँ लक्षणों की संख्या
छत्तीस है वहीं पाठान्तरगत लक्षणों के भेद से यह संख्या और भी अधिक हो
गयी है। अलङ्कारशास्त्र के उत्तरभावी आचार्यों ने अलङ्कार तथा लक्षणों के
इन प्रभेदों की ओर गम्भीरता से अवधान न देकर अनेक लक्षणों को अलङ्कार
प्रभेद के रूप में प्रतिपादित करने की प्रवृत्ति ही दर्शायी जो कुछ शाब्दिक
परिभाषाओं के एवं उदाहरणों के नवीनीकरण को लिये हुए रहा भी था।
अतएव अलङ्कारशास्त्र के आचार्यों ने अनेक नये ऐसे अलङ्कारों की उद्भावना कर
डाली जिनसे भरतमुनि अनभिज्ञ नहीं थे। परन्तु इतना सही है कि भरतमुनि
लक्षणों का आधार लेकर ही अपने अलङ्कार तथा उनके प्रभेदों के आविष्कार
या निर्माण में समर्थ हो पाए थे। इस कारण सभी उत्तरभावी आलङ्कारिक
आचार्य किसी प्रकार अपने उपजीव्य ग्रन्थ नाट्यशास्त्र के आभारी हैं ही।
भरतमुनि ने मूलभूत अलङ्कारों तथा लक्षण, गुण, दोष आदि के द्वारा जिस
काव्यमार्ग का आरम्भ किया था उसे ही उत्तरभावी भामह, दण्डी आदि
आचार्यों ने अपनी मौलिक प्रतिभा के योग से विकसित एवं व्यवस्थित किया
था यह स्पष्टतः प्रतीत होता है।
दोषविधान—वाचिक अभिनय के इस क्रम में काव्यदोषों का भी भरत-

( ६४ )
मुनि ने विवरण दिया है। ऐसा प्रतीत होता है कि दोषपद्धति को प्राचीन
शास्त्र परम्परा के आधार पर—विशेषतः गौतम के न्यायसूत्र या महाभारत
आदि के आधार पर पल्लवित किया गया था। इनमें सामान्यतः जिन दोषों
को बतलाया गया था उन्हींके अनुसरण या आदर्श पर काव्यदोषों का भी
निरूपण हुआ जिसका उद्देश्य था काव्य में पूर्णता की स्थिति बनाए रखना ।
काव्यदोषों के निरूपण का विवरण सर्व प्रथम नाट्यशास्त्र में ही मिलता है ।
अतः इसके प्रवर्तक भी भरतमुनि ही थे यह स्पष्ट है। उत्तरभावी आचार्यों ने
दोष के स्वरूप का विवेचन तथा विस्तार लोकव्यवहार एवं विविधशास्त्रों के
परिशीलन के प्रकाश में ही किया है। भरतमुनि की पूर्ववर्ती जो काव्य-
शास्त्रीयपद्धति दोष आदि के लिये चल रही होगी उसका भी भरतमुनि ने
अपनी रचना में निवेश किया था तथा समकालीन मान्यताओं को ध्यान में
रखकर नाट्यशास्त्र में 'दोषविधान' निरूपित किया था जो उनके ग्रन्थ के
परिशीलन से स्पष्ट ही देखा जा सकता है।
दोष तथा उनके प्रभेद—भरत मुनि ने गुणों की संख्या दस मानी
है जिसे हम आगे दिखलाएँगे तथा गुणों को दोषों का विपर्यय मानने के
आधार पर दोषों की भी संख्या दस ही की है। निश्चित ही काव्य के क्षेत्र
में दोष पहिले उपस्थित थे क्योंकि काव्य भाषा के क्षेत्र की वस्तु मानी
जाती है तथा इसी कारण गुण ही दोषों के विपर्यय होंगे यह बात उपयुक्त
ही है। इन दोनों का क्रम इस प्रकार दिया गया है :—
( १ ) गूढ़ार्थ, ( २ ) अर्थान्तर, ( ३ ) अर्थहीन, ( ४ ) भिन्नार्थ,
(५) एकार्थ; ( ६ ) अभिप्लुतार्थ, ( ७ ) न्यायादपेत, ( ८ ) विषम,
( ६ ) विसन्धि तथा ( १० ) शब्द ( पद ) च्युत। क्रमशः इनका विवरण
इस प्रकार है।
गूढ़ार्थ—शब्दों के गूढ़ार्थ को पर्याय शब्द से बतलाना 'गूढ़ार्थ दोष' है।
नाट्य एवं काव्य के प्रयोग में गूढ़ार्थता अर्थबोध में बाधक होती है। जैसे
( टिप्पणी में भी ) 'दशरथ' पद के लिये 'अधिकनवविमान' का प्रयोग ।
यहाँ ऐसे यदृच्छा शब्द को पर्याय द्वारा संकेतित किया गया जो दुर्बोधताग्रस्त
है। मम्मट ने इसे ही 'निहतार्थ' दोष कहा है ।
अर्थान्तर—अवर्ण्य का वर्णन करना 'अर्थान्तर नामक दोष' है। इसी कारण
वर्ण्य वस्तु का औचित्य दब जाता है तथा प्रतिपाद्य विषय या रस की उपेक्षा
होने लगती है। इसे मम्मटादि ने अवाच्यवचन या अमतपरार्थता जैसे दोषों में
परिगणित कर व्यापक विचार किया ।

( ६५ )
**अर्थहीन—**अर्थ की असम्बद्धता या अपूर्ण अर्थ की बहुलता से यह दोष
होता है। इसे मम्मटादि सम्मत न्यूनपद या निरर्थक के रूप में समझा जा
सकता है।
**भिन्नार्थ—**अविवक्षित अर्थ को कहने या ग्राम्यशब्दों के प्रयोग करने पर
यह दोष होता है। इसके दूसरे लक्षण से अनपेक्षित अर्थ में अभिहित अर्थ का
परिणत होना भी इसी दोष का स्वरूप हो जाएगा। इसे मम्मटादि सम्मत
प्रकाशितविरुद्धता या विरुद्धमतिकृत् के समान समझा जा सकता है।
**एकार्थ—**एक ही वर्ण्य के लिये अनेक पदों का प्रयोग करना जो
पुनरुक्तता सा लगे तो 'एकार्थ' दोष कहलाता है।
**अभिप्लुतार्थ—**पद्य के प्रत्येक पाद में अर्थ का समाप्त हो जाना, जो
कि एक दूसरे से निरपेक्ष हों तो 'अभिप्लुतार्थ' दोष होता है अथवा लम्बे
समास का एक पूरे पद्य के पाद में प्रयोग के द्वारा अर्थ को दुर्बोध बनाना।
इसे मम्मटादि सम्मत क्लिष्टत्व के समान माना जा सकता है।
**न्यायादपेत—**लोकपरम्परा के विरोध होने या देश, काल, कला,
न्याय या आगम के विरुद्ध किसी उपयुक्त तर्क के न देने पर यह दोष होता
है। इसमें प्रतिज्ञा या दृष्टान्त का विरोध या अभाव रहता है। यह मम्मटादि
सम्मत विद्याविरुद्धता या प्रसिद्धिविरुद्धता जैसे दोषों के समान समझा जा
सकता है।
**विषम—**छन्द या वृत्तों के अनुचित प्रयोग करने पर यह छन्दोशैथिल्य
के कारण दोष होता है। यह विवक्षित अर्थ या रस के प्रतिकूल होता है।
मम्मटादि सम्मत हतवृत्तता के समान इसे समझा जा सकता है।
**विसन्धि—**जब पदों को सन्धि के नियमानुसार न रख कर सन्धिहीन
स्थिति में प्रयुक्त किया जाता है तो यह दोष होता है।
**शब्दच्युत—**उचित शब्दों के यथासमय प्रयोग न करने से यह दोष
होता है। इस दोष का क्षेत्र विस्तीर्ण है जिसमें विवक्षित भाव का प्रकाशन
न होना इस दोष की स्थिति निर्माण करता है। क्योंकि ऐसे अपशब्दों के
प्रयोग से विवक्षित अर्थ के बोध में बाधा उत्पन्न हो जाती है। इसे सम्मटादि
सम्मत अवाचकत्व, असमर्थत्व तथा च्युतसंस्कृति जैसा समझा जा सकता है।
यह व्याकरण से भी एक ओर सम्बन्ध रखता है तथा अर्थ से भी।
इस प्रकार इस दोषनिरूपण के विवरण से स्पष्ट है कि शब्द के साधु
प्रयोग, वर्ण्य या अर्थ के उपयुक्त काव्यरचना करना तथा रसानुवर्ती छन्द
५ ना० द्वि० भू०

( ६६ )
का विधान होने से काव्य उत्तम या निर्दोष होता है। यद्यपि भरतमुनि के
समय शब्द और अर्थ में विभाजन होकर दोष विचार आरम्भ नहीं हो पाया
था परन्तु ऐसे विभाजन की सम्भावनाओं के आधार अवश्य निर्मित हो
चुके थे। भरत के दोषनिरूपण ने उत्तरभावी आचार्यों को दोषों के सूक्ष्म
विवेचन (तथा दोषों की अनित्यता तथा अनौचित्य जैसे बिन्दुओं पर विचार)
करने की प्रेरणा (अवश्य) दी। नाट्यशास्त्र में अलङ्कारों की संख्या
अतिन्यून तथा सीमित रहने से अलङ्कार में आनेवाले दोषों की चर्चा नहीं
हो पायी यद्यपि दोष के आधार का तत्व भरतमुनि ने ही संकेतित किया
है। भरतमुनि ने निर्दोषता को उत्तम काव्यरचना का सौन्दर्य मानकर
काव्य में अदोषत्व का विचार मुख्य बिन्दुरूप में स्थापित किया जो काव्यशास्त्र
के इतिहास में विशेषतः उल्लेखनीय तथा महत्वपूर्ण भी है।
गुणविधान—काव्यगत गुणों का विवरण भी इसी क्रम में आता है।
भरतमुनि ने दस गुणों के विवरण के प्रसङ्ग में दोषों के अभाव या विपर्यय के
रूप में 'गुण' को प्रतिपादित किया था। इस काव्यगुण के विवेचन ने शब्दार्थ
तथा रसाश्रित गुणविवेचन को आधार प्रदान किया। वाचिक-अभिनय में
नाट्य-प्रयोग की दृष्टि से किया गया यह गुणनिरूपण रीतिवादी एवं रसवादी
प्रवृत्तियों का मूल विचारबिन्दु बन कर उन्हें प्रभावित करने में आगे
चल कर समर्थ हो सका जिसके प्रवर्तन का श्रेय भी भरतमुनि को ही है।
गुणस्वरूप—भरत ने दोषों की तरह गुणों के भी दस प्रभेद कर
उनका विवरण दिया है। ये हैं—( १ ) श्लेष, ( २ ) प्रसाद, ( ३ ) समता,
( ४ ) समाधि, ( ५ ) माधुर्य, ( ६ ) ओज, ( ७ ) सौकुमार्य, ( ८ ) अर्थ-
व्यक्ति, ( ६ ) उदारता तथा ( १० ) कान्ति। क्रमशः संक्षेप में इनके
स्वरूप इस प्रकार हैं—
श्लेष—जहाँ पदों की श्लिष्टता अभिलषित अर्थपरम्परा या समुदाय
से सम्बद्ध रहती हो अथवा जहाँ पद में गहन विचार की अर्थधारा स्वभावतः
स्फुट होती हो तो वहाँ श्लेष गुण होता है। अभिनवगुप्तपाद ने इसके लक्षण-
गत दोनों पाठों को शब्द तथा अर्थश्लेष अलङ्कार का उद्भव स्रोत निदर्शित
किया है।
प्रसाद—शब्दार्थ के आह्लादक संयोग से अर्थ के स्वच्छ स्फटिक की
तरह प्रतिभासित होने पर 'प्रसाद' गुण होता है। अपनी अर्थ विमलता
के कारण यह अर्थगुण हो जाता है—यह अभिनवगुप्तपाद आचार्य

( ६७ )
ने माना है। तीन गुणों को ही काव्य में मान्य करने वाले मम्मटादि ने भी
इसे एक गुण ही स्वीकृत किया है ।
समता—जिसमें न अधिक असमस्त पद तथा न व्यर्थाभिधायी या
दुर्बोध पद हों तो 'समता' गुण होता है। अन्य पाठ के अनुसार गुण तथा
अलङ्कारों का समुचित योग होना 'समता' है। आचार्य हेमचन्द्र ने अन्य पाठ
को मान्य कर बतलाया कि भिन्न अधिकरण में अवस्थित गुण तथा अलङ्कार
परस्पर विभूषित नहीं करते। सर्वेश्वर ने भी (अपने साहित्यसार ग्रन्थ में)
यही पाठ स्वीकार किया। वामन ने समता को वृत्ति में अन्तर्भुक्त किया
तथा अन्य कुछ आचार्य मार्ग की भिन्नता के कारण समता को दोष मानने
लगे थे ।
समाधि—इष्टार्थ की अभिव्यक्ति के लिये उपमा को ग्रहण करना या
कविप्रतिभा द्वारा प्रयुक्त पद या वाक्य से विशिष्ट अर्थान्तर की प्रतीति होना
'समाधि' है। आचार्य अभिनवगुप्तपाद ने इसे शब्द का गुण निरूपित कर
विस्तृत विवरण दिया है ।
माधुर्य—वाक्य की बार-बार आवृत्ति होने पर भी उद्वेग रहित मधुरता
का बना रहना 'माधुर्य' हैं। इस गुण को मम्मटादि ने त्रिगुण में मान्यता दी
है तथा अभिनवगुप्त इसे अर्थगुण बतलाते हैं ।
ओज—जिसमें समासबहुल रचना हो तथा जो अनेक विचित्र, उदार
तथा परस्पर अपेक्षित अर्थों से अनुमत रहे तो 'ओज' गुण होता है। अन्य
पाठ के अनुसार शब्दार्थ की समृद्धि से उदात्त अर्थ का प्रतिभासित होना
'ओज' है। आचार्य हेमचन्द्र ने ओज के इसी लक्षण को मान्य करते हुए
इसे प्रकृत कवि कर्म निरूपित किया । आचार्य अभिनवगुप्त पाद ने ओज को
अर्थगुण माना तथा मम्मटादि ने इसे त्रिगुण में एक गुण के रूप में मान्य
किया। डॉ० वी० राघवन्¹ ने इसके पाठ में 'सानुरागैः' के सानु शब्द के
स्थान पर काकुशब्द सुझाया तथा तदनुसार अर्थसङ्गति को बैठाने का आग्रह
किया। परन्तु ऐसे पाठ को मानने का आधार (किन्हीं नाट्यशास्त्र की
प्राचीन प्रति या हस्तलेखों में प्राप्त नहीं होने) स्पष्टतः प्राप्त नहीं होता ।
दूसरे अभिनवगुप्तपाद ने इसके दोनों पाठों की भी परम्परा के अनुगत व्याख्या
दी है तथा इसी कारण विषय के अनुगत स्वतन्त्र कल्पना को अधिक बढ़ावा
मिलने के सभी अवसर क्षीण हो गये हैं ।


१. द्रष्ट-डॉ० राघवन्-भोज का शृङ्गारप्रकाश-पृष्ठ २६८ ।

( ६८ )
सौकुमार्य—सुखपूर्वक उच्चारण या प्रयोग के उपयुक्त तथा सुश्लिष्ट
सन्धि एवं कोमल अर्थ से अनुप्राणित रचना ‘सौकुमार्य’ कहलाती है। आचार्य
अभिनवगुप्तपाद ने इसे शब्द तथा अर्थ गुण मानकर बतलाया है कि ‘सुकुमारता’
दोनों में होती है। दण्डी तथा हेमचन्द्राचार्य ने इसे शब्दगुण माना है।
अर्थव्यक्ति—नाट्य या काव्य व्यापार में सुप्रसिद्ध तथा लोकप्रसिद्ध
पदार्थ या क्रिया का अभिधान होने से अर्थ का सुस्पष्ट अवबोध होना
‘अर्थव्यक्ति’ है। अन्य पाठ के अनुसार पात्र के द्वारा अपने मनोबल के योग
द्वारा प्रेक्षक के हृदय में अवस्थित भाव या वस्तु का अभिनय द्वारा प्रस्तुती-
करण ‘अर्थव्यक्ति’ होता है। आचार्य हेमचन्द्र ने इसी अन्य पाठ को लिया है।
आचार्य वामन इसे अर्थगुण तथा दण्डी एवं अन्य आचार्य इसे जाति या
स्वाभावोक्ति अलङ्कार के निकटवर्ती मानते हैं। विश्वनाथ कविराज तथा
मम्मट भट्ट आदि ने इसे प्रसाद गुण स्वीकार नहीं किया ।
उदारत्व ( उदात्तता, उदारता )—विविध दिव्यभावों से विभूषित
तथा शृङ्गार एवं अद्भुत रसों से समायोजित ‘उदारत्व’ गुण है। अन्य पाठ
के अनुसार अनेक विशिष्ट या सूक्ष्म अर्थों तथा सौष्ठव से पूर्ण रचना ‘उदात्त’
कहलाती है। इस अन्य पाठ को हेमचन्द्र, वामन तथा भोज ने लिया है।
उदारत्व काव्य का प्राणभूत तत्व माना जाता है। आचार्य वामन ने उदारता
को ग्राम्यत्व दोष का अभाव बतलाया तथा ओज में अन्तर्भाव माना क्योंकि
दोषाभाव स्वतन्त्र गुण नहीं हो सकता । श्री मम्मट तथा विश्वनाथ कविराज
आदि ने भी वामन का अनुसरण किया परन्तु आचार्य अभिनवगुप्त इसे
शब्द गुण मान कर व्याख्या करते हैं।
कान्ति—चन्द्र के समान मन तथा श्रोत्र को आह्लादित करने वाली,
लीला आदि चेष्टालङ्कारों से रमणीय शब्दबन्ध या रचना ‘कान्ति’ कहलाती
है। वामन ने इसे ‘दीप्तरस’ कहा तथा दण्डी इसमें लोकसीमा का अतिक्रमण
मानते हैं। आचार्य अभिनवगुप्तपाद इसे शब्दगुण मानते हैं, परन्तु कान्ति में
अर्थगुण का भी समन्वय दिखलाई पडता है।
गुण-स्वरूप तथा स्थिति-मीमांसा—नाट्यशास्त्र में निर्देशित गुण
निरूपण से स्पष्ट है कि ये शब्द तथा अर्थ दोनों को ही ध्यान में रखकर
भरतमुनि ने निरूपित किये थे तथा इनकी विभाजक रेखा भी इन गुणलक्षणों
में देखी जा सकती है, किन्तु यह तथ्य केवल परिभाषित स्वरूप के परिशीलन
से प्राप्त होता है। इस परिशीलन से बाद में दो मत प्रधानतः उभरते हैं
जिनमें प्रथम मत में भी दो वर्ग हैं। इनमें भरतमुनि, वामन तथा अभिनव-

( ६६ )
गुप्तपाद के अनुसार ये गुण शब्द तथा अर्थ दोनों से सम्बद्ध हैं। द्वितीय
वर्ग के आचार्य दण्डी का मत है कि श्लेष जैसे कुछ गुण शब्दों से, प्रसाद
जैसे कुछ गुण अर्थों से तथा सौकुमार्य जैसे कुछ गुण दोनों से सम्बद्ध हैं।
आचार्य वामन के मत में भरत निरूपित दस गुण शब्दों के तथा दस
अर्थगुण होते हैं। इस प्रकार कुल मिलाकर गुण बीस हैं। भोजराज
ने वामन का अनुसरण करते हुए चौबीस गुणों का प्रतिपादन किया। इनके
मत में गुणयोग नित्य हैं तथा अलंकृत होने पर भी गुण-रहित काव्य प्रीतिकर
नहीं होता। काव्य में गुण-आदान नियमतः या नित्य होता है तथा अलङ्कार
का विधान कामचार है। उद्भट के काव्यालङ्कारसूत्र के व्याख्याकार
प्रतीहारेन्दुराज के अनुसार गुण काव्य का नित्य धर्म होता है। जयदेव ने
चन्द्रालोक में वामन के अनुसार ही गुणों का विवरण दिया है।
इन गुणों की संख्या के विषय में भी दो भिन्न-भिन्न मत साहित्य में
विकसित हुए। सर्वप्राचीन आचार्य तथा गुणों के प्रवर्तक भरतमुनि के मत में
गुणों की संख्या दस है। इस मत का अनुसरण वामन, दण्डी तथा अभिनव-
गुप्तपादाचार्य करते हैं। द्वितीयमत के अनुसार गुणों की संख्या मात्र तीन हैं।
इस मत के प्रवर्तक आचार्य भामह हैं जो काव्य के लिये तीन गुणों—माधुर्य,
ओज तथा प्रसाद—का ही उल्लेख करते हैं। भामह का आधार भरत तथा
दण्डी से भिन्न है तथा वे दस गुणों की प्रामाणिकता स्वीकार नहीं करते।
आगे इस मत का अनुसरण किया आनन्दवर्धनाचार्य तथा उनके अनुयायी
मम्मटादि ने भी गुणों की संख्या तीन मान कर। ये भी कुछ गुणों को
स्वतन्त्रगुण न मान कर उन्हें दोषाभाव तथा कुछ गुणों को अलङ्कारों के
अन्तर्गत स्वीकार करते हैं।
इस प्रकार काव्यगुणों के विषय में दो परस्पर स्वतन्त्र या निरपेक्ष मत
विकसित हुए थे। इनमें एक का भरतमुनि ने तथा अन्य का प्रवर्तन आचार्य
भामह ने किया था। यह भी इस सन्दर्भ में ध्यातव्य है कि जहाँ आचार्य
भरत नाट्यविद्या के सम्प्रदाय के प्रमुख थे वहीं आचार्य भामह काव्यशास्त्र के
प्रमुख रहे। दोनों में इस विषय में भिन्नता है कि काव्यरचना के साधनवर्ग
में कौन अधिक अपेक्षित है। इस क्रम में भरतमुनि के मत में नाट्यरचना के
लिये गुणों की अधिक आवश्यकता होगी, अलङ्कारों की नहीं। इसी कारण
काव्यरचना के साधनों में नाट्यशास्त्रीय आचार्य भरत ने अपने साधनों की
सूची में काव्यगुणों तथा लक्षणों की संख्या अधिक रखी तथा अलङ्कारों की

( ७० )
कम । दूसरे पक्ष के आचार्यों में—जिनमें भामह प्रमुख थे—काव्यरचना के
साधनों की सूची में अलङ्कारों पर प्रधानरूप से ध्यान देते हुए अलङ्कारों को
अधिक संख्या में रख कर अन्य ऐसे तत्वों को भी काव्यरचना के साधनों में
सम्मिलित कर लिया गया जिन्हें नाट्यशास्त्र में काव्यगुणों की सूची में रखा
गया था ।
**गुणों का सम्बन्ध—**इसके अतिरिक्त आचार्यों में गुणों के सम्बन्ध
में भी मतैक्य नहीं है। काव्यलक्षणवादी आचार्य भामह के अनुसार काव्य
गुणों का शब्द तथा अर्थ के साथ विशेषणविशेष्यभाव सम्बन्ध है। इनके
अनुसार माधुर्य आदि गुण इसी प्रकार शब्द एवं अर्थ के गुण हैं जैसे सामान्य
व्यवहार में दूध का गुण सहज मधुर होता है। परन्तु अन्यपक्ष में इस विषय
में भी भिन्न मत हैं। काव्यगुणों का रस के साथ रसानुभवात्मा समवाय
सम्बन्ध रहता है, क्योंकि काव्य की मधुरता अनुभवस्वरूप होती है। अतएव
इसमें शब्द तथा अर्थ की सत्ता मात्र अवस्थित नहीं होती। यह केवल दृष्टि-
भेद मात्र था परमार्थतः दोनों की विवेचना ने वास्तविकता का ही प्रतिपादन
किया पर भिन्न दृष्टि अपेक्षाभेद से रहती ही है ऐसा समझना चाहिए।
इस प्रकार स्पष्ट है कि आचार्य आनन्दवर्द्धन, अभिनवगुप्तपाद, मम्मट,
हेमचन्द्राचार्य, जयदेव तथा विश्वनाथ कविराज के विचारों का स्रोत भरत-
मुनि के नाट्यशास्त्र में विद्यमान है। इन आचार्यों ने गुण, अलङ्कार तथा
लक्षण जैसे काव्याङ्गों का विवेचन रस के सन्दर्भ में ही किया तथा भरत की
रसवादी दृष्टि को इनकी समीक्षापद्धतियों ने आत्मसात् कर लिया। भरत के
अनुसार कोई काव्यार्थ रस के बिना प्रवृत्त ही नहीं हो सकता था।
ध्वनिकार आनन्दवर्धन ने काव्य एवं नाट्य के प्राण के रूप में उसे साहित्य
के साधनों में शीर्ष स्थान प्रदान किया। इनके मत में रस रूप आत्मा के
गुण नित्य धर्म हैं तथा ये समान अङ्गों के माध्यम से आत्मरूप रस के
उपकारक होते हैं। आनन्दवर्धनाचार्य की इस नव्यसमीक्षा ने साहित्य के
क्षेत्र में मौलिक उद्भावना की तथा भरत के रससिद्धान्त को पुनरुज्जीवित
करते हुए ध्वनिसिद्धान्त की स्थापना की जो काव्यशास्त्रीय समीक्षा के इतिहास
में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
**भाषाविधान—**नाट्यशास्त्र के अष्टादश अध्याय में वाचिक अभिनय के
अन्तर्गत काव्यशरीर के अङ्गों के रूप में छन्द, लक्षण, अलङ्कार, गुण आदि के
विवेचन क्रम में भाषा का भी विचार किया गया कि यह काव्य या नाट्य का

( ७१ )
शरीर है तथा सर्वस्व भी । भाषा के अन्तर्गत नाट्यशास्त्र में विभिन्न
भाषाओं, सम्बोधनादि विधियों, पात्रों के नामकरण तथा पाठ्यविधि जैसे
नाट्योपयोगी विषयों को लेकर उनका तात्विक विवेचन हुआ है । जिनमें से
इस अध्याय में भाषा का विशेषरूप में विवरण दिया गया है ।
भाषाएँ—नाट्यशास्त्र में भाषाविषयक विवरण संक्षेप में हैं, जो
संस्कृत तथा प्राकृत के है। इस अष्टादशअध्याय के अतिरिक्त ध्रुवाध्याय
( अध्याय ३२ ) में भी प्राकृतभाषा के अनेक उदाहरण प्राप्य हैं, जो इस
भाषा की ऐतिहासिक स्थिति के अध्ययन में बड़ा मूल्य रखते हैं। इसके विषय
में नाट्यशास्त्र के चतुर्थभाग में विशिष्ट रूप में विचार किया जा रहा है ।
यहाँ ( इसके अतिरिक्त ) सामान्य तथ्य यह है कि रङ्गमञ्च पर व्यवहार में
आने वाली भाषाओं में नाटकादि की ( प्राचीन काल में ) प्रयुज्यमान भाषायें
संस्कृत तथा प्राकृत रही हैं। भाषा के इसी तथ्य को भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र
में अपनी ही पद्धति में इस प्रकार रखा भी है—
भाषा चतुर्विधा ज्ञेया दशरूपप्रयोगतः ।
संस्कृतं प्राकृतञ्चैव यत्र पाठ्यं प्रयुज्यते ॥
अतिभाषार्यभाषा च जातिभाषा तथैव च ।
तथा योन्यन्तरी चैव भाषा नाट्ये प्रतिष्ठिता ॥
( नाट्यशास्त्र १८ । २५-२६ )
इस प्रकार स्पष्ट है कि भरतमुनि ने रूपकों में प्रयुक्त की जाने वाली
भाषा के ये चार प्रभेद किये—( १ ) अतिभाषा, ( २ ) आर्यभाषा,
( ३ ) जातिभाषा तथा ( ४ ) योन्यन्तरी भाषा । इनमें अतिभाषा वैदिक
शब्दबहुल भाषा है । आर्यभाषा श्रेष्ठजन की भाषा होती है तथा योन्यन्तरी
भाषा मनुष्येतर या पशुपक्षियों की भाषा मानी जाती है ।
जातिभाषा के प्रधानतः दो भेद होते हैं—(१) संस्कृत तथा (२) प्राकृत
जिनका रूपकादि में प्रयोग होता है । इनमें जो संस्कार गुण से सम्पन्न भाषा
है वही संस्कृत भाषा है, जिसमें देशादि भेद से स्वरूप में अन्तर नहीं पड़ता ।
जनभाषा है प्राकृत जिसमें संस्कारगुण सम्पन्नता नहीं होती तथा इसी कारण
जिसमें देशादि भेद के कारण प्रकृति में भिन्नता आ जाती है । इनमें संस्कृत
तथा प्राकृत भाषा के व्यवहार रूपकों में सम्भाषणप्रथा के अनुगत रखे
जाते थे । यह सम्भाषणप्रथा भाषा के प्रयोग का विचार करने पर किस
विशिष्ट पात्र को किस विधि से सम्भाषण करना है—इस प्रश्न पर आकर
विस्तीर्ण रूप धारण करती है तथा थोड़ी उलझन भी उत्पन्न करती है ।

( ७२ )
भाषा-नियम—भरतमुनि ने पात्रानुसारी भाषा के नियम दिखलाये
हैं । तदनुसार उत्तम एवं उच्चवर्ण के संस्कारी पात्रों की संस्कृतभाषा होती
है तथा सभी स्त्री पात्रों, विभिन्न स्तर के सेवकों, सामान्यजन तथा
निम्नवर्ग ( वर्ण ) के पात्रों की प्राकृत-भाषा । इस नियम का अपवाद यह है
कि ऐश्वर्यादि से प्रमत्त या दरिद्रता से अभिभूत धीरोदात्त आदि पात्रों की
भी प्राकृतभाषा बीच-बीच में आवश्यकतानुसार रखी जाती है । इसी प्रकार
नारीपात्रों में भी महारानी, वेश्या, शिल्पकारिणी जैसे पात्रों की वैदग्ध्यार्थ
संस्कृतभाषा भी रखी जाती है । अप्सरा आदि दिव्यपात्र होने से संस्कृत-
भाषा का प्रयोग करती हैं परन्तु यदि ये नृपपत्नी के रूप में नायिका भाव
प्राप्त करे तो इन्हें भी प्राकृतभाषा में ही अपना व्यवहार रखना पड़ेगा ।
प्राकृत-भाषा-भेद—भाषाविधान के प्रसंग में नाट्यशास्त्र में सात
प्राकृतभाषाओं का उल्लेख किया गया है । ये हैं—( १ ) मागधी,
( २ ) अवन्तिजा, ( ३ ) प्राच्या, ( ४ ) शौरसेनी, ( ५ ) अर्धमागधी,
( ६ ) बाह्लीका तथा ( ७ ) दाक्षिणात्या । ये ही वे सात भाषाएँ हैं जो
तत्कालीन विविध जनपदों की प्रचलित भाषायें रही थीं । इसके अतिरिक्त
विभाषायें होती हैं—जिनके अन्तर्गत शकार, आभीर, चाण्डाल, शबर, द्रमिल
( द्रविड ) तथा वनेचरों की भाषाएँ आती हैं तथा जिनका नाट्यशास्त्र में
विधान दिया गया है । इन भाषाओं का विधान पात्रों में देश, जाति तथा
अवस्था के अनुरूप किया जाता है, क्योंकि भाषायें भी देश तथा जातिभेद से
विभिन्नता धारण करने वाली होती ही हैं । इन भाषाओं को रूपकों में
सम्भाषण के अनुसार रखा जाता है तथा भाषा के प्रयोग का ( विधाना-
नुसारी तथा विचार पूर्वक रखा गया ) पात्रानुसारी प्रस्तुतीकरण रहता है ।
भाषाविधान—हम पूर्व में दिखला आये हैं कि नाटकों में प्रयुज्यमान
भाषाओं में संस्कृत तथा प्राकृतभाषायें आती हैं । नाट्यशास्त्र में संस्कृत
भाषा के विषय में संक्षेप में विवरण देकर फिर प्राकृतभाषा का भी विवेचन
किया गया है । यहाँ हम पूर्व कथित चारों भाषा प्रभेदों पर क्रमशः विचार
करेंगे । ये हैं—( १ ) अतिभाषा, ( २ ) आर्यभाषा, ( ३ ) जातिभाषा
तथा ( ४ ) योन्यन्तरी भाषा । इनमें अन्तिम भाषा योन्यन्तरी उन पशु-
पक्षियों की भाषा होती है जिनका मञ्च पर प्रस्तुतीकरण अभीष्ट होता है ।
अतिभाषा—शेष या अन्य तीन भाषाओं में सर्व प्रथम ‘अतिभाषा’ आती
है जो प्राचीन आर्यभारतीय भाषा या वैदिकभाषा जैसी कोई शिष्टभाषा थी

( ७३ )
तथा जिसका तत्कालीन प्रजाजन में बोलचाल में व्यवहार होता था । यही
भाषा नाट्यशास्त्र में वर्णित 'अतिभाषा' थी जिसका देवताओं की ( या
पवित्र ) भाषा के रूप में विवरण दिया गया है । इसका स्वरूप कैसा था ?
यह प्रश्न कोई कठिन बात नहीं क्योंकि ऐसे स्थान पर हमें पाणिनि से थोड़ी
सहायता मिल जाती है । पुराकालीन वैयाकरणों ( तथा पाणिनि ) ने अपने
ग्रन्थों में छन्दों की ( वेदादि की ) भाषा के साथ-साथ अपने समय में प्रचलित
भाषा के रूप दिये हैं। इन सभी आचार्यों ने पूर्वशास्त्रकालीन संस्कृतभाषा
को छन्दों की भाषा मान्य की है। जो निश्चित रूप में प्राचीनभारतीय-आर्य
भाषा या वैदिक-संस्कृतभाषा थी तथा जिसका ब्राह्मणों के द्वारा यज्ञविधियों
आदि में प्रयोग होता था। इसी का महर्षि पाणिनि ने छन्दोभाषा के रूप में
निरूपण किया था तथा दिव्यपात्रों में इसी भाषा का अतिभाषा के रूप में
भरतमुनि ने विधान दिया है। आचार्य अभिनवगुप्त का मत है कि वैदिक-
शब्दों के बहुल प्रयोग तथा स्वरभेद आदि संस्कार से पूर्ण मण्डित भाषा की
स्थिति को 'अतिभाषा' में देखा जा सकता है।
आर्यभाषा—अतिभाषा की परवर्ती भाषा आर्यभाषा थी, जिसका
व्यवहार ( नाटकादि ) रूपक में राजा जैसे उदात्त पात्र करते थे। आर्यभाषा
का स्वरूप हम मोटे रूप में शास्त्रीय-संस्कृत या लौकिकसंस्कृत मान सकते
हैं। जिसका समाज के उच्चस्तरीय वर्ग में व्यवहार होता था। इसका
आर्यभाषा नामकरण तथा नाट्यशास्त्र में स्थित विवरण यह संकेत करने
के लिये पर्याप्त है कि यह समग्र आर्यावर्त से सम्बद्ध भाषा थी। आचार्य
अभिनवगुप्त का मत है कि पूर्ण संस्कार सम्पन्न संस्कृतभाषा को ही आर्य-
भाषा समझना चाहिए ।१
जातिभाषा—आर्यभारतीय प्रजा की आवासीय या प्रादेशिक भाषाएँ
ही 'जातिभाषा' है। ये संस्कृत तथा प्राकृतभाषा के अन्तर्वर्ती विस्तीर्ण
प्रभेद रखती थीं। अब यहाँ प्रश्न यह होगा कि क्या यह भाषा सामान्य-
भारतीय प्रजा की आवासीय या क्षेत्रीय भाषा रही थी ? इसका उत्तर बहुत
साफ है। यद्यपि हमारे पास तत्कालीन समाज के स्पष्ट नृवंशीयतत्व से
सम्बद्ध चित्र विद्यमान नहीं है परन्तु प्राप्य तथ्यों के तथा सुदृढ़ परिकल्पना के
आधार पर यह माना जा सकता है कि उस समय नाट्यप्रदर्शन देखने वाली
प्रजा विशुद्ध आर्यजातीय तथा मिश्र आर्यजातीय अवश्य रही थी तथा सामान्य
१. द्रष्टव्य-अभि० भार० Vol II पृ० ३७२ ( बडौदा सं० ) ।

( ७४ )
प्रजा में आर्यजाति के समाज से सामीप्य रखने वाली जातियाँ या उनसे
सम्बद्ध कुछ अनार्य जातियाँ भी थी। अतः जातिभाषा विभिन्न प्रजातियों
की क्षेत्रीय या स्थानीय भाषाएँ रही जिनका प्रयोग संस्कृत या प्राकृतभाषा
की सम्बोध्यविधि के अनुसार रखा जाता था। इन भाषाओं में अपने
प्रजातीय तथा क्षेत्रीय शब्दों का मिश्रण रहता था जो बाद में अधिक विस्तार
पाने पर पृथक् विभाषा के रूप में विकास पा जाता था तथा जिनसे एक पृथक्
भाषा का रूप बन जाता था। इस क्रम ने पूर्वकालिक भाषाव्यवहार का
स्थान धीरे-धीरे ले लिया, जिसमें आर्यभाषा का प्रकृतविधि से व्यवहार
होता था तथा जिसे ये प्रजातियाँ समझती तथा स्वीकार करती थी। परन्तु
अतिशय स्पष्टता के साथ यह नहीं कहा जा सकता है कि प्रजातीय भाषाएँ
अपने तात्कालिक या वास्तविक रूप में (रूपकों में) प्रस्तुत की जाती थी।
यह तथ्य नाट्यशास्त्र के निम्न उद्धरण से स्पष्ट है—
द्विविधा जातिभाषा च प्रयोगे समुदाहृता ।
म्लेच्छशब्दोपचारा च भारतं वर्षमाश्रिता ॥ (ना० शा० १८।२८)
इस प्रकार स्पष्ट है कि जातिभाषा विभिन्न प्रजातियों की स्थानीय भाषा
थी, जो प्राचीन आर्यभारतीय सम्बोधविधि के अनुसार प्रयोज्य रहती थी
तथा जिसमें प्रजातीय शब्दों का मिश्रण रहता था।
इन भाषाओं पर विचार के पश्चात् हमारा ध्यान उन अब सात भाषाओं
पर भी जाता है जो इसी जातिभाषा के अन्तर्गत क्षेत्रों से सम्बद्ध हैं। ये सात
भाषाएँ पहिले कही जा चुकी हैं जिनमें शौरसेनी, मागधी तथा अर्धमागधी
स्पष्टतः, आर्यभाषा से उद्भूत हैं तथा यही स्थिति आवन्ती, प्राच्या,
बाह्लीकी तथा दाक्षिणात्या के उद्भव के विषय में भी है। यद्यपि आज हमें
अवन्ती या प्राच्या के अंश नाट्यकृति में अधिकता से प्राप्य नहीं है तथा
बाह्लीकी एवं दाक्षिणात्या का भी नाट्यशास्त्रगत विवरणमात्र ही मिलता है
जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि इनके रूप अतीत के गर्भ में (नमूने के साथ
साथ ही) विलीन हो चुके हैं। इन तथ्यों से एक बात और भी स्पष्ट रूप में
उभर कर आती है कि नाटकादि में अवस्थित प्राकृतभाषाएँ सर्वदा एक
लचीली दशा में ही स्थित रही थी जिनका प्रयोग पात्रों की स्थिति, प्रकृति
तथा देश के अनुरूप रखा जाता था। यहाँ नाट्यप्रयोग के प्रस्तोता को इसी
कारण भरतमुनि ने अपनी सुविधा के अनुरूप भाषाप्रयोग की स्वतन्त्रता दे दी है।
भरतमुनि के इस भाषाविधान का परवर्ती नाट्यशास्त्रीय ग्रन्थों तथा
नाट्यरचनाओं पर पर्याप्त प्रभाव रहा तथा भरतानुसारी भाषाविधान को लेते

( ७५ )
हुए उनमें नवीन अंश जुड़ते रहे। शारदातनय ने अपने भावप्रकाशन में
प्राकृतभाषा के पैशाची, मागधी तथा शौरसेनी प्रभेदों को ग्राम्य, नागरक
तथा उपनागरक प्रभेदों के विवरण देकर अठारह कर दिया जो भरत के
मत में दिखलाया गया था ( भाषा ४ + सप्तभाषा + सप्तविभाषा = १८) ।
आचार्य विश्वनाथ कविराज ने साहित्यदर्पण में तेरह प्राकृतभाषाओं का नामतः
विवरण देकर उनका प्रयोगविधान दिखलाया भी है। शौरसेनी, मागधी
तथा अर्धमागधी प्राकृतों का संस्कृत नाटकों में व्यवहार (सदा) लोकप्रियता
बनाये भी रहा। प्रायः (महाराष्ट्री तथा) शौरसेनी प्राकृत का प्रयोग सभी
नाटकों में मिलता है। सर्वाधिक प्राकृतभाषाओं के विधानानुगतप्रयोग के
दर्शन शूद्रक के मृच्छकटिक में हमें मिलते हैं जहाँ चाण्डाली, शाकारी तथा
ढक्की भाषाओं का भी प्रयोग हुआ है। इस प्रकार स्पष्ट है कि भरतमुनि का
दाय तथा प्रभाव नाट्यशास्त्रीयग्रन्थों तथा नाट्यरचनाओं पर सभी संभव
स्थितियों के साथ पड़ता रहा है यह निर्विवाद है।
नाट्यशास्त्र के उन्नीसवें अध्याय में भाषाविधान के एक अन्य प्रयोगगत
पक्ष को लेकर सम्बोधन तथा काकुस्वरव्यञ्जनादि की विधि निरूपित है। इनमें
सर्वप्रथम सम्बोधन का विवरण है—
सम्बोधन-प्रकार—नाटकों के पात्र अपनी उत्तम, मध्यम तथा हीन
स्थिति में अवस्थादि के अनुसार एक दूसरे को सम्बोधित कर सम्भाषण करते
हैं, जिनका नाट्यशास्त्र में विस्तार से विवरण दिया गया है। इन असंख्य
सम्बोधनों का आधार पात्रों की सामाजिक स्थिति, पारिवारिक भावना,
आदरअनुराग व्यवसाय तथा सेवादि नियोजित कार्य तो है ही उनका लोक-
प्रचलित व्यवहार भी है। ये सभी सम्बोधन पुरुष तथा नारी पात्रों को एक
विशिष्ट व्यक्तित्व प्रदान कर भारतीय समाज की महनीय स्थिति को संकेतित
करते हैं।
इसके अतिरिक्त भरतमुनि ने इस सम्बोधन-विधान के साथ साथ पात्रों
के विभिन्न जातीय एवं सामाजिक स्तर का ध्यान रखते हुए तदनुसारी
नामकरण के विधान भी दिये हैं, जो बड़े व्यापक है तथा जिनसे पात्रों के
कर्मादि के अनुरूप नामकरण की प्रवृत्ति का भी आभास मिलता है। इसका
प्रभाव परवर्ती नाट्यरचनाओं पर पर्याप्त रूप में प्राप्त होता है।
पाठ्य—(गुण तथा उसकी उपयोगिता) :—वाचिक अभिनय का
प्रस्तुतीकरण संवाद या पाठ्य के द्वारा सम्पन्न होने के कारण भरतमुनि ने
पाठ्यतत्व को वाचिकअभिनय का प्राण कहा है। इस सन्दर्भ में मुनि ने

( ७६ )
‘पाठ्य-गुण’ पद का प्रयोग किया था जिसकी व्याख्या करते हुए आचार्य
अभिनवगुप्तपाद ने बतलाया कि पाठ्य के जो उपकारक या आधार हों उन
( उपकरणों ) का विश्लेषण जिनसे अभिनय का पल्लवन किया जाए ‘पाठ्य-
गुण’ कहलाते हैं। ये उपकारक उपकरण हैं :—सप्तस्वर, तीन स्थान, चार
वर्ण, दो काकु, छः अलङ्कार तथा छः अङ्ग । यहाँ क्रमशः इनका विवरण दे
रहे हैं :—
सप्तस्वर—रसों के सन्दर्भ में गीतादि के स्वरों का विनियोजन ही
पाठ्य का सप्तस्वर गुण कहलाता है। ये सप्तस्वर हैं—षड्ज, ऋषभ,
गान्धार, मध्यम पञ्चम, धैवत तथा निषाद । इनमें हास्य तथा शृङ्गाररस के
योग में मध्यम तथा पञ्चम स्वरों का करुणरस के योग में गान्धार तथा
निषाद स्वरों का तथा भयानक एवं बीभत्स रस के योग में धैवत स्वर का
विधान विहित है।
स्थान—इसके अन्तर्गत शरीर के शिर, कण्ठ तथा उरस् प्रदेश आते हैं
जिनके विशिष्ट क्रम से स्वरों का उत्थान किया जाता है तथा काकु का
प्रयोग। पाठ्य के प्रसंग में पात्रों की दूरस्थ स्थिति में शिर तथा कण्ठ को
किञ्चिद् दूरी में रखते हुए तथा निकटस्थ पात्रों के साथ संवाद की स्थिति में
उरस् का प्रयोग किया जाता है। आचार्य अभिनवगुप्तपाद ने इस प्रसंग में
बतलाया कि दूरस्थ पात्रों को शिर या मूर्धा निष्पन्न स्वर से तार या उच्च-
ध्वनि में बुलाया या संभाषण किया जाता है जब कि अतिदूरी के न होने पर
कण्ठ के मध्य स्वर से संभाषण किया जाता है। इसी प्रकार समीपवर्ती पात्र
से उरस् या वक्षःस्थल के समीपवर्ती मन्द्रस्वर से संभाषण होता है।
वर्ण—नाट्यशास्त्र में चार पाठ्यवर्ण बतलाये हैं—उदात्त, अनुदात्त,
स्वरित तथा कम्पित जिनका हास्य आदि रसों के योग में प्रयोग ( या
उपयोग ) होता है। स्वरित तथा उदात्त का प्रयोग हास्य तथा शृङ्गार
रस में, उदात्त तथा कम्पित का वीर, रौद्र तथा अद्भुतरस में तथा करुण,
बीभत्स एवं भयानक रसों में अनुदात्त, स्वरित तथा कम्पित वर्णों का प्रयोग
किया जाता है।
काकु—पाठ्यगुण का प्राणभूततत्व काकु होता है, क्योंकि काकु के ही
द्वारा स्वरवैभिन्य से विचित्रता आती है तथा नवीन अर्थ का आधार
विस्तीर्णता को प्राप्त करता है। इस काकु के दो प्रभेद होते हैं—
( १ ) साकाङ्क्ष, ( २ ) निराकाङ्क्ष । प्रकरणादि की अपेक्षा करने वाला
काकुविधान साकाङ्क्ष कहलाता है। इसमें तार से मन्द्र तक स्वर, अनियत

( ७७ )
अर्थ, उदात्त आदि वर्ण तथा उच्चादि अलङ्कार अपरिसमाप्त रहते हैं।
निराकाङ्क्ष-काकु में इसके विपरीत अर्थ नियत, 'उच्च आदि वर्ण तथा
अलङ्कार परिसमाप्त स्थान शिर और मन्द्र से तार तक स्वरों की योजना
रहती है। काकु का जिह्वा के द्वारा सम्पादन होता है तथा उच्च, दीप्त
आदि वर्णों तथा सन्धिविच्छेद आदि के द्वारा पाठ्य में काकु को प्रमुखता दी
जाती है क्योंकि सर्वत्र काकु प्रधान रहता है।
पाठ्यगत अलङ्कार—पाठ्य के छः अलङ्कार माने गये हैं, जिनसे काकु
को पूर्णता प्राप्त होती है। ये हैं—(१) उच्च, (२) दीप्त, (३) मन्द्र,
(४) नीच, (५) द्रुत, तथा (६) विलम्बित। दूरस्थित पात्रों की विस्मय,
त्रास तथा बाधा की दशा में होने वाले संवादों में पाठ को उच्चस्वर में रखा
जाता है। पारस्परिक आक्षेप, क्रोध, तथा कलह आदि की स्थिति में
विलम्बितस्वर में पाठ रखा जाता है। इस प्रकार विभिन्न भावदशाओं के
अनुरूप पात्रों का पाठविधान भी रखा गया है जिससे अभिनय या नाट्यप्रयोग
को प्रभावशाली एवं सफल बनाया जा सके ।
पाठ्याङ्ग—पाठ्य के छः अङ्ग भी होते हैं—(१) विच्छेद, (२) अर्पण,
(३) विसर्ग, (४) अनुबन्ध, (५) दीपन तथा (६) प्रशमन। विराम के
कारण पाठ में 'विच्छेद' होता है। यह नाट्यार्थ के अनुरोध पर या उसे
ध्यान में रख कर किया जाता है तथा यह अर्थदर्शक होता है। इसी
कारण नाट्यार्थ को पूर्णतः हृदयंगम करने एवं अर्थानुरोध के लिये विरामों
की योजना रखी जाती है। इन अर्थदर्शक विरामों से युक्त जब पाठ्य होता
है या किया जाता है तो नाट्यप्रयोग को यह समृद्ध कर देता है। गम्भीर
एवं मधुरस्वर में पात्र द्वारा किये जाने वाले पाठ के द्वारा दर्शकों
का अभिनीत भावों में समाहित हो जाना 'अर्पण' कहलाता है। इसमें
अभिनेता कवि या नाट्यकार द्वारा उन्नीत संवेदना को दर्शकों को अर्पण
करता है। वाक्य की समाप्ति होना 'विसर्ग' तथा पाठ्य की शृङ्खला को
बनाए रखना 'अनुबन्ध' कहलाता है। विभिन्न स्थानों से उत्थित स्वर का
उत्तरोत्तर दीप्त होना 'दीपन' तथा तार स्वर में उच्चारित स्वर का क्रमशः
मन्द्रस्थिति में आना 'प्रशमन' है।
भरतमुनि ने इन अङ्गों से होने वाले रसाश्रित प्रयोग भी दिखलाये हैं।
तदनुसार हास्य तथा शृङ्गाररस में अर्पण, विच्छेद, दीपन तथा प्रशमन
नामक अङ्गों का, वीर, रौद्र तथा अद्भुत रसों में विच्छेद, प्रशमन, दीपन

और अनुबन्ध का तथा बीभत्स एवं भयानकरस में विसर्ग तथा विच्छेद का
विधान रखा जाता है। इन अङ्गों के विभिन्न रसाश्रित प्रयोगों को तार,
मन्द्र तथा मध्य नामक अलङ्कारों के आधार पर रखा जाता है। तारस्वर
से मन्द्र तथा मन्द्र से तार स्वर पर सहसा पाठ नहीं रखा जाता है; क्योंकि
ऐसा करना नाट्यार्थ का प्रतिरोधक होता है। किन्तु द्रुत, मध्य तथा
विलम्बित का प्रयोग नाट्यार्थ की उद्दीपित करने के कारण सदा इष्ट
होता है।
इस प्रकार भाषाविभेद सम्बोधन विधि, पात्रों के नामकरण तथा काकु,
स्वर, अलङ्कार तथा पाठ्याङ्गों के विवरण के साथ छन्दों की तथा भाषा की
प्रकृत्ति को विस्तार से देकर वाचिक-अभिनय का साङ्ग एवं तात्विक विवरण
नाट्यशास्त्र में इन चार अध्यायों में दिया गया है। इससे पाठ्य के अङ्गों
के ठीक रखने की स्थिति का निर्माण होता है जो नाट्यार्थ की भावना को
व्यवस्थित कर देता है। ऐसा होने पर कवि या नाट्यकार की उद्भावित
संवेदना का दर्शक समाहित दशा में अवबोध करने में समर्थ हो जाता है।
पाठ्यगुणों का व्यवस्थित एवं साङ्ग विवरण सर्वप्रथम नाट्यशास्त्र में ही
हुआ जो उस समय की प्रयोग-पद्धति का पूर्ण संकेत देता है कि वह कितनी
समृद्ध रही थी। यह विवरण तथा इसमें निदर्शित विधान से यदि अभिनयगत
निपुणता प्राप्त की जाए तो नाट्यप्रयोग सदा ही निश्चित रूप से सफलता
प्राप्त करेंगे। भरतमुनि की प्रयोग विज्ञानगत निपुणता तो इस विवरण से
प्रकट होती ही है साथ ही उनकी दीर्घदृष्टि का भी इससे बोध होता है।
परवर्तीकाल में नाट्यशास्त्रीय ग्रन्थकारों ने ऐसे विषयों का अधिक विस्तार से
विवरण ही नहीं दिया तथा ऐसे विषयों का व्यवस्थित विश्लेषण भी नाट्य-
शास्त्र के ( सार तत्व के ) आधार पर नहीं लिखा गया। उनने पाठ्यादि के
भरतोक्त विवेचन को ऐसा करते हुए बिना किसी संशोधन के सार्वकालिक
स्वीकृति ही प्रदान की तथा भरतमुनि की प्रतिभा को ही इस सन्दर्भ में
( आदि से लेकर अन्तिम भाग तक ) अक्षुण्ण मान्यता प्रदान करते हुए ऐसा
प्रतीत होता है कि अपना एकमत से इसे समर्थन ही दे दिया था।
**प्रस्तुत खण्ड तथा उसके पाठान्तर—**इस प्रकार इस द्वितीयभाग में
नाट्यशास्त्र के अष्टमअध्याय से एकोनविंश अध्याय तक के विवरण को
उपस्थापित किया गया। विंश अध्याय से षट्त्रिंश अध्याय तक इसी प्रकार
क्रमशः अगले भागों में विवेचन किया जाता रहेगा। यह हम पूर्व में भी
बतला चुके हैं कि नाट्यशास्त्र के प्रस्तुत संस्करण में प्रायः सभी अद्यतन एवं

( ७६ )
उपलब्ध सामग्री का यथाशक्य उपयोग किया गया है तथा प्रायः सभी अद्यतन
सामग्री का प्राप्य तथ्यों के आधार पर अनुशीलन भी। नाट्यशास्त्र के
पाठों के अन्तर्गत जो पाठ नाट्यशास्त्र के प्रामाणिक तथ्य लिये हुए थे उन्हें
मूलपाठ बनाकर तथा अवशिष्ट पाठान्तरों को टिप्पणी में दिखलाया गया है
जिससे नाट्यशास्त्र के सभी उपलब्ध पाठान्तरों का एकत्र संग्रह हो जाए।
कुछ पाठान्तरों के अर्थ भी यथास्थान आवश्यकतानुसार दे दिये गये हैं जिससे
अध्येता एवं अनुशीलनकर्त्ता को सभी विषयों की अभिप्राप्ति हो तथा किसी
महत्वपूर्ण पाठ या पाठान्तर को वे भी अपने विचार का विषय बना सकें।
पाठान्तर सङ्केत—इसमें ‘क’ पाठ के अन्तर्गत गायकवाड ओरि० सीरीज
बड़ौदा से प्रकाशित अभिनवभारती व्याख्या के अनुगत पाठ तथा इसी के
साथ रहने वाले पाठान्तरों को भी कोष्ठकान्तर्गत ‘म’ या ‘भ’ देकर दिखलाया
गया है। इसी प्रकार ‘ख’ पाठ के अन्तर्गत काव्यमाला संस्करण बम्बई के
प्रकाशित पाठों को तथा ‘ग’ पाठ के अन्तर्गत प्रथमभाग की तरह ही काशी
संस्कृत ग्रन्थमाला चौखम्बा वाराणसी के पाठों को लिया गया है। इसमें भी
प्रथमभाग की तरह ही मूलपाठ को काशी संस्करण की दीर्घपाठ परम्परा के
अनुसार यथासम्भव रखा गया है किन्तु आवश्यकतानुसार इनमें अनेक स्थानों
पर ( थोड़ा ) परिवर्तन भी हो गया है। नवम अध्याय तथा आगे अध्यायों
में वर्णित हस्ताभिनयादि के रेखाचित्रों को भी इस भाग में यथाशक्य लगाया
गया है, जिससे नाट्यशास्त्रीय विषयों को हृदयंगम करने में सहायता मिलेगी।
यही क्रम अगले भागों में रखा जा रहा है तथा नाट्यशास्त्र के शेष भाग भी
शीघ्र ही प्रस्तुत करने का उद्योग जारी है। आवश्यक विवरण को पूर्ववत्
ध्यान में रख कर प्रस्तुत भाग के परिशिष्ट १ में अतिरिक्त टिप्पणियाँ तथा
परिशिष्ट २ में पद्यार्धानुक्रमणिका लगायी गयी हैं तथा अन्त में शुद्धिपत्र भी
दे दिया गया है। इतना रहने पर भी सुधी पाठकों से प्रमादवश छूटी हुई
अशुद्धियों तथा विषयगत विस्तार सम्बन्धी सुझावों को भेजने की अभ्यर्थना
है जिससे उनका उपयोग होकर अगले संस्करणों को और भी परिमार्जित
किया जा सकेगा।
पाठान्तर प्रक्रिया—नाट्यशास्त्र के प्रथमभाग में पाठों को लेकर कुछ
विवरण अल्प मात्रा में ही संकेत रूप में रखा गया था। इसका कारण यही
था कि वहाँ विषय-विवरण ने पर्याप्त स्थान ले लिया था तथा वही बात फिर
इस भाग के समय भी विद्यमान है परन्तु अपेक्षित बात को यहाँ अवश्य रखना