नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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अर्थ, उदात्त आदि वर्ण तथा उच्चादि अलङ्कार अपरिसमाप्त रहते हैं।
निराकाङ्क्ष-काकु में इसके विपरीत अर्थ नियत, 'उच्च आदि वर्ण तथा
अलङ्कार परिसमाप्त स्थान शिर और मन्द्र से तार तक स्वरों की योजना
रहती है। काकु का जिह्वा के द्वारा सम्पादन होता है तथा उच्च, दीप्त
आदि वर्णों तथा सन्धिविच्छेद आदि के द्वारा पाठ्य में काकु को प्रमुखता दी
जाती है क्योंकि सर्वत्र काकु प्रधान रहता है।
पाठ्यगत अलङ्कार—पाठ्य के छः अलङ्कार माने गये हैं, जिनसे काकु
को पूर्णता प्राप्त होती है। ये हैं—(१) उच्च, (२) दीप्त, (३) मन्द्र,
(४) नीच, (५) द्रुत, तथा (६) विलम्बित। दूरस्थित पात्रों की विस्मय,
त्रास तथा बाधा की दशा में होने वाले संवादों में पाठ को उच्चस्वर में रखा
जाता है। पारस्परिक आक्षेप, क्रोध, तथा कलह आदि की स्थिति में
विलम्बितस्वर में पाठ रखा जाता है। इस प्रकार विभिन्न भावदशाओं के
अनुरूप पात्रों का पाठविधान भी रखा गया है जिससे अभिनय या नाट्यप्रयोग
को प्रभावशाली एवं सफल बनाया जा सके ।
पाठ्याङ्ग—पाठ्य के छः अङ्ग भी होते हैं—(१) विच्छेद, (२) अर्पण,
(३) विसर्ग, (४) अनुबन्ध, (५) दीपन तथा (६) प्रशमन। विराम के
कारण पाठ में 'विच्छेद' होता है। यह नाट्यार्थ के अनुरोध पर या उसे
ध्यान में रख कर किया जाता है तथा यह अर्थदर्शक होता है। इसी
कारण नाट्यार्थ को पूर्णतः हृदयंगम करने एवं अर्थानुरोध के लिये विरामों
की योजना रखी जाती है। इन अर्थदर्शक विरामों से युक्त जब पाठ्य होता
है या किया जाता है तो नाट्यप्रयोग को यह समृद्ध कर देता है। गम्भीर
एवं मधुरस्वर में पात्र द्वारा किये जाने वाले पाठ के द्वारा दर्शकों
का अभिनीत भावों में समाहित हो जाना 'अर्पण' कहलाता है। इसमें
अभिनेता कवि या नाट्यकार द्वारा उन्नीत संवेदना को दर्शकों को अर्पण
करता है। वाक्य की समाप्ति होना 'विसर्ग' तथा पाठ्य की शृङ्खला को
बनाए रखना 'अनुबन्ध' कहलाता है। विभिन्न स्थानों से उत्थित स्वर का
उत्तरोत्तर दीप्त होना 'दीपन' तथा तार स्वर में उच्चारित स्वर का क्रमशः
मन्द्रस्थिति में आना 'प्रशमन' है।
भरतमुनि ने इन अङ्गों से होने वाले रसाश्रित प्रयोग भी दिखलाये हैं।
तदनुसार हास्य तथा शृङ्गाररस में अर्पण, विच्छेद, दीपन तथा प्रशमन
नामक अङ्गों का, वीर, रौद्र तथा अद्भुत रसों में विच्छेद, प्रशमन, दीपन