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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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उपलब्ध सामग्री का यथाशक्य उपयोग किया गया है तथा प्रायः सभी अद्यतन
सामग्री का प्राप्य तथ्यों के आधार पर अनुशीलन भी। नाट्यशास्त्र के
पाठों के अन्तर्गत जो पाठ नाट्यशास्त्र के प्रामाणिक तथ्य लिये हुए थे उन्हें
मूलपाठ बनाकर तथा अवशिष्ट पाठान्तरों को टिप्पणी में दिखलाया गया है
जिससे नाट्यशास्त्र के सभी उपलब्ध पाठान्तरों का एकत्र संग्रह हो जाए।
कुछ पाठान्तरों के अर्थ भी यथास्थान आवश्यकतानुसार दे दिये गये हैं जिससे
अध्येता एवं अनुशीलनकर्त्ता को सभी विषयों की अभिप्राप्ति हो तथा किसी
महत्वपूर्ण पाठ या पाठान्तर को वे भी अपने विचार का विषय बना सकें।
पाठान्तर सङ्केत—इसमें ‘क’ पाठ के अन्तर्गत गायकवाड ओरि० सीरीज
बड़ौदा से प्रकाशित अभिनवभारती व्याख्या के अनुगत पाठ तथा इसी के
साथ रहने वाले पाठान्तरों को भी कोष्ठकान्तर्गत ‘म’ या ‘भ’ देकर दिखलाया
गया है। इसी प्रकार ‘ख’ पाठ के अन्तर्गत काव्यमाला संस्करण बम्बई के
प्रकाशित पाठों को तथा ‘ग’ पाठ के अन्तर्गत प्रथमभाग की तरह ही काशी
संस्कृत ग्रन्थमाला चौखम्बा वाराणसी के पाठों को लिया गया है। इसमें भी
प्रथमभाग की तरह ही मूलपाठ को काशी संस्करण की दीर्घपाठ परम्परा के
अनुसार यथासम्भव रखा गया है किन्तु आवश्यकतानुसार इनमें अनेक स्थानों
पर ( थोड़ा ) परिवर्तन भी हो गया है। नवम अध्याय तथा आगे अध्यायों
में वर्णित हस्ताभिनयादि के रेखाचित्रों को भी इस भाग में यथाशक्य लगाया
गया है, जिससे नाट्यशास्त्रीय विषयों को हृदयंगम करने में सहायता मिलेगी।
यही क्रम अगले भागों में रखा जा रहा है तथा नाट्यशास्त्र के शेष भाग भी
शीघ्र ही प्रस्तुत करने का उद्योग जारी है। आवश्यक विवरण को पूर्ववत्
ध्यान में रख कर प्रस्तुत भाग के परिशिष्ट १ में अतिरिक्त टिप्पणियाँ तथा
परिशिष्ट २ में पद्यार्धानुक्रमणिका लगायी गयी हैं तथा अन्त में शुद्धिपत्र भी
दे दिया गया है। इतना रहने पर भी सुधी पाठकों से प्रमादवश छूटी हुई
अशुद्धियों तथा विषयगत विस्तार सम्बन्धी सुझावों को भेजने की अभ्यर्थना
है जिससे उनका उपयोग होकर अगले संस्करणों को और भी परिमार्जित
किया जा सकेगा।
पाठान्तर प्रक्रिया—नाट्यशास्त्र के प्रथमभाग में पाठों को लेकर कुछ
विवरण अल्प मात्रा में ही संकेत रूप में रखा गया था। इसका कारण यही
था कि वहाँ विषय-विवरण ने पर्याप्त स्थान ले लिया था तथा वही बात फिर
इस भाग के समय भी विद्यमान है परन्तु अपेक्षित बात को यहाँ अवश्य रखना