सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 83, कुल 668 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 83

( ७२ )
भाषा-नियम—भरतमुनि ने पात्रानुसारी भाषा के नियम दिखलाये
हैं । तदनुसार उत्तम एवं उच्चवर्ण के संस्कारी पात्रों की संस्कृतभाषा होती
है तथा सभी स्त्री पात्रों, विभिन्न स्तर के सेवकों, सामान्यजन तथा
निम्नवर्ग ( वर्ण ) के पात्रों की प्राकृत-भाषा । इस नियम का अपवाद यह है
कि ऐश्वर्यादि से प्रमत्त या दरिद्रता से अभिभूत धीरोदात्त आदि पात्रों की
भी प्राकृतभाषा बीच-बीच में आवश्यकतानुसार रखी जाती है । इसी प्रकार
नारीपात्रों में भी महारानी, वेश्या, शिल्पकारिणी जैसे पात्रों की वैदग्ध्यार्थ
संस्कृतभाषा भी रखी जाती है । अप्सरा आदि दिव्यपात्र होने से संस्कृत-
भाषा का प्रयोग करती हैं परन्तु यदि ये नृपपत्नी के रूप में नायिका भाव
प्राप्त करे तो इन्हें भी प्राकृतभाषा में ही अपना व्यवहार रखना पड़ेगा ।
प्राकृत-भाषा-भेद—भाषाविधान के प्रसंग में नाट्यशास्त्र में सात
प्राकृतभाषाओं का उल्लेख किया गया है । ये हैं—( १ ) मागधी,
( २ ) अवन्तिजा, ( ३ ) प्राच्या, ( ४ ) शौरसेनी, ( ५ ) अर्धमागधी,
( ६ ) बाह्लीका तथा ( ७ ) दाक्षिणात्या । ये ही वे सात भाषाएँ हैं जो
तत्कालीन विविध जनपदों की प्रचलित भाषायें रही थीं । इसके अतिरिक्त
विभाषायें होती हैं—जिनके अन्तर्गत शकार, आभीर, चाण्डाल, शबर, द्रमिल
( द्रविड ) तथा वनेचरों की भाषाएँ आती हैं तथा जिनका नाट्यशास्त्र में
विधान दिया गया है । इन भाषाओं का विधान पात्रों में देश, जाति तथा
अवस्था के अनुरूप किया जाता है, क्योंकि भाषायें भी देश तथा जातिभेद से
विभिन्नता धारण करने वाली होती ही हैं । इन भाषाओं को रूपकों में
सम्भाषण के अनुसार रखा जाता है तथा भाषा के प्रयोग का ( विधाना-
नुसारी तथा विचार पूर्वक रखा गया ) पात्रानुसारी प्रस्तुतीकरण रहता है ।
भाषाविधान—हम पूर्व में दिखला आये हैं कि नाटकों में प्रयुज्यमान
भाषाओं में संस्कृत तथा प्राकृतभाषायें आती हैं । नाट्यशास्त्र में संस्कृत
भाषा के विषय में संक्षेप में विवरण देकर फिर प्राकृतभाषा का भी विवेचन
किया गया है । यहाँ हम पूर्व कथित चारों भाषा प्रभेदों पर क्रमशः विचार
करेंगे । ये हैं—( १ ) अतिभाषा, ( २ ) आर्यभाषा, ( ३ ) जातिभाषा
तथा ( ४ ) योन्यन्तरी भाषा । इनमें अन्तिम भाषा योन्यन्तरी उन पशु-
पक्षियों की भाषा होती है जिनका मञ्च पर प्रस्तुतीकरण अभीष्ट होता है ।
अतिभाषा—शेष या अन्य तीन भाषाओं में सर्व प्रथम ‘अतिभाषा’ आती
है जो प्राचीन आर्यभारतीय भाषा या वैदिकभाषा जैसी कोई शिष्टभाषा थी