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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 89, कुल 668 में से

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और अनुबन्ध का तथा बीभत्स एवं भयानकरस में विसर्ग तथा विच्छेद का
विधान रखा जाता है। इन अङ्गों के विभिन्न रसाश्रित प्रयोगों को तार,
मन्द्र तथा मध्य नामक अलङ्कारों के आधार पर रखा जाता है। तारस्वर
से मन्द्र तथा मन्द्र से तार स्वर पर सहसा पाठ नहीं रखा जाता है; क्योंकि
ऐसा करना नाट्यार्थ का प्रतिरोधक होता है। किन्तु द्रुत, मध्य तथा
विलम्बित का प्रयोग नाट्यार्थ की उद्दीपित करने के कारण सदा इष्ट
होता है।
इस प्रकार भाषाविभेद सम्बोधन विधि, पात्रों के नामकरण तथा काकु,
स्वर, अलङ्कार तथा पाठ्याङ्गों के विवरण के साथ छन्दों की तथा भाषा की
प्रकृत्ति को विस्तार से देकर वाचिक-अभिनय का साङ्ग एवं तात्विक विवरण
नाट्यशास्त्र में इन चार अध्यायों में दिया गया है। इससे पाठ्य के अङ्गों
के ठीक रखने की स्थिति का निर्माण होता है जो नाट्यार्थ की भावना को
व्यवस्थित कर देता है। ऐसा होने पर कवि या नाट्यकार की उद्भावित
संवेदना का दर्शक समाहित दशा में अवबोध करने में समर्थ हो जाता है।
पाठ्यगुणों का व्यवस्थित एवं साङ्ग विवरण सर्वप्रथम नाट्यशास्त्र में ही
हुआ जो उस समय की प्रयोग-पद्धति का पूर्ण संकेत देता है कि वह कितनी
समृद्ध रही थी। यह विवरण तथा इसमें निदर्शित विधान से यदि अभिनयगत
निपुणता प्राप्त की जाए तो नाट्यप्रयोग सदा ही निश्चित रूप से सफलता
प्राप्त करेंगे। भरतमुनि की प्रयोग विज्ञानगत निपुणता तो इस विवरण से
प्रकट होती ही है साथ ही उनकी दीर्घदृष्टि का भी इससे बोध होता है।
परवर्तीकाल में नाट्यशास्त्रीय ग्रन्थकारों ने ऐसे विषयों का अधिक विस्तार से
विवरण ही नहीं दिया तथा ऐसे विषयों का व्यवस्थित विश्लेषण भी नाट्य-
शास्त्र के ( सार तत्व के ) आधार पर नहीं लिखा गया। उनने पाठ्यादि के
भरतोक्त विवेचन को ऐसा करते हुए बिना किसी संशोधन के सार्वकालिक
स्वीकृति ही प्रदान की तथा भरतमुनि की प्रतिभा को ही इस सन्दर्भ में
( आदि से लेकर अन्तिम भाग तक ) अक्षुण्ण मान्यता प्रदान करते हुए ऐसा
प्रतीत होता है कि अपना एकमत से इसे समर्थन ही दे दिया था।
**प्रस्तुत खण्ड तथा उसके पाठान्तर—**इस प्रकार इस द्वितीयभाग में
नाट्यशास्त्र के अष्टमअध्याय से एकोनविंश अध्याय तक के विवरण को
उपस्थापित किया गया। विंश अध्याय से षट्त्रिंश अध्याय तक इसी प्रकार
क्रमशः अगले भागों में विवेचन किया जाता रहेगा। यह हम पूर्व में भी
बतला चुके हैं कि नाट्यशास्त्र के प्रस्तुत संस्करण में प्रायः सभी अद्यतन एवं