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नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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पृष्ठ 85

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प्रजा में आर्यजाति के समाज से सामीप्य रखने वाली जातियाँ या उनसे
सम्बद्ध कुछ अनार्य जातियाँ भी थी। अतः जातिभाषा विभिन्न प्रजातियों
की क्षेत्रीय या स्थानीय भाषाएँ रही जिनका प्रयोग संस्कृत या प्राकृतभाषा
की सम्बोध्यविधि के अनुसार रखा जाता था। इन भाषाओं में अपने
प्रजातीय तथा क्षेत्रीय शब्दों का मिश्रण रहता था जो बाद में अधिक विस्तार
पाने पर पृथक् विभाषा के रूप में विकास पा जाता था तथा जिनसे एक पृथक्
भाषा का रूप बन जाता था। इस क्रम ने पूर्वकालिक भाषाव्यवहार का
स्थान धीरे-धीरे ले लिया, जिसमें आर्यभाषा का प्रकृतविधि से व्यवहार
होता था तथा जिसे ये प्रजातियाँ समझती तथा स्वीकार करती थी। परन्तु
अतिशय स्पष्टता के साथ यह नहीं कहा जा सकता है कि प्रजातीय भाषाएँ
अपने तात्कालिक या वास्तविक रूप में (रूपकों में) प्रस्तुत की जाती थी।
यह तथ्य नाट्यशास्त्र के निम्न उद्धरण से स्पष्ट है—
द्विविधा जातिभाषा च प्रयोगे समुदाहृता ।
म्लेच्छशब्दोपचारा च भारतं वर्षमाश्रिता ॥ (ना० शा० १८।२८)
इस प्रकार स्पष्ट है कि जातिभाषा विभिन्न प्रजातियों की स्थानीय भाषा
थी, जो प्राचीन आर्यभारतीय सम्बोधविधि के अनुसार प्रयोज्य रहती थी
तथा जिसमें प्रजातीय शब्दों का मिश्रण रहता था।
इन भाषाओं पर विचार के पश्चात् हमारा ध्यान उन अब सात भाषाओं
पर भी जाता है जो इसी जातिभाषा के अन्तर्गत क्षेत्रों से सम्बद्ध हैं। ये सात
भाषाएँ पहिले कही जा चुकी हैं जिनमें शौरसेनी, मागधी तथा अर्धमागधी
स्पष्टतः, आर्यभाषा से उद्भूत हैं तथा यही स्थिति आवन्ती, प्राच्या,
बाह्लीकी तथा दाक्षिणात्या के उद्भव के विषय में भी है। यद्यपि आज हमें
अवन्ती या प्राच्या के अंश नाट्यकृति में अधिकता से प्राप्य नहीं है तथा
बाह्लीकी एवं दाक्षिणात्या का भी नाट्यशास्त्रगत विवरणमात्र ही मिलता है
जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि इनके रूप अतीत के गर्भ में (नमूने के साथ
साथ ही) विलीन हो चुके हैं। इन तथ्यों से एक बात और भी स्पष्ट रूप में
उभर कर आती है कि नाटकादि में अवस्थित प्राकृतभाषाएँ सर्वदा एक
लचीली दशा में ही स्थित रही थी जिनका प्रयोग पात्रों की स्थिति, प्रकृति
तथा देश के अनुरूप रखा जाता था। यहाँ नाट्यप्रयोग के प्रस्तोता को इसी
कारण भरतमुनि ने अपनी सुविधा के अनुरूप भाषाप्रयोग की स्वतन्त्रता दे दी है।
भरतमुनि के इस भाषाविधान का परवर्ती नाट्यशास्त्रीय ग्रन्थों तथा
नाट्यरचनाओं पर पर्याप्त प्रभाव रहा तथा भरतानुसारी भाषाविधान को लेते