नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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शरीर है तथा सर्वस्व भी । भाषा के अन्तर्गत नाट्यशास्त्र में विभिन्न
भाषाओं, सम्बोधनादि विधियों, पात्रों के नामकरण तथा पाठ्यविधि जैसे
नाट्योपयोगी विषयों को लेकर उनका तात्विक विवेचन हुआ है । जिनमें से
इस अध्याय में भाषा का विशेषरूप में विवरण दिया गया है ।
भाषाएँ—नाट्यशास्त्र में भाषाविषयक विवरण संक्षेप में हैं, जो
संस्कृत तथा प्राकृत के है। इस अष्टादशअध्याय के अतिरिक्त ध्रुवाध्याय
( अध्याय ३२ ) में भी प्राकृतभाषा के अनेक उदाहरण प्राप्य हैं, जो इस
भाषा की ऐतिहासिक स्थिति के अध्ययन में बड़ा मूल्य रखते हैं। इसके विषय
में नाट्यशास्त्र के चतुर्थभाग में विशिष्ट रूप में विचार किया जा रहा है ।
यहाँ ( इसके अतिरिक्त ) सामान्य तथ्य यह है कि रङ्गमञ्च पर व्यवहार में
आने वाली भाषाओं में नाटकादि की ( प्राचीन काल में ) प्रयुज्यमान भाषायें
संस्कृत तथा प्राकृत रही हैं। भाषा के इसी तथ्य को भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र
में अपनी ही पद्धति में इस प्रकार रखा भी है—
भाषा चतुर्विधा ज्ञेया दशरूपप्रयोगतः ।
संस्कृतं प्राकृतञ्चैव यत्र पाठ्यं प्रयुज्यते ॥
अतिभाषार्यभाषा च जातिभाषा तथैव च ।
तथा योन्यन्तरी चैव भाषा नाट्ये प्रतिष्ठिता ॥
( नाट्यशास्त्र १८ । २५-२६ )
इस प्रकार स्पष्ट है कि भरतमुनि ने रूपकों में प्रयुक्त की जाने वाली
भाषा के ये चार प्रभेद किये—( १ ) अतिभाषा, ( २ ) आर्यभाषा,
( ३ ) जातिभाषा तथा ( ४ ) योन्यन्तरी भाषा । इनमें अतिभाषा वैदिक
शब्दबहुल भाषा है । आर्यभाषा श्रेष्ठजन की भाषा होती है तथा योन्यन्तरी
भाषा मनुष्येतर या पशुपक्षियों की भाषा मानी जाती है ।
जातिभाषा के प्रधानतः दो भेद होते हैं—(१) संस्कृत तथा (२) प्राकृत
जिनका रूपकादि में प्रयोग होता है । इनमें जो संस्कार गुण से सम्पन्न भाषा
है वही संस्कृत भाषा है, जिसमें देशादि भेद से स्वरूप में अन्तर नहीं पड़ता ।
जनभाषा है प्राकृत जिसमें संस्कारगुण सम्पन्नता नहीं होती तथा इसी कारण
जिसमें देशादि भेद के कारण प्रकृति में भिन्नता आ जाती है । इनमें संस्कृत
तथा प्राकृत भाषा के व्यवहार रूपकों में सम्भाषणप्रथा के अनुगत रखे
जाते थे । यह सम्भाषणप्रथा भाषा के प्रयोग का विचार करने पर किस
विशिष्ट पात्र को किस विधि से सम्भाषण करना है—इस प्रश्न पर आकर
विस्तीर्ण रूप धारण करती है तथा थोड़ी उलझन भी उत्पन्न करती है ।