नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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**अर्थहीन—**अर्थ की असम्बद्धता या अपूर्ण अर्थ की बहुलता से यह दोष
होता है। इसे मम्मटादि सम्मत न्यूनपद या निरर्थक के रूप में समझा जा
सकता है।
**भिन्नार्थ—**अविवक्षित अर्थ को कहने या ग्राम्यशब्दों के प्रयोग करने पर
यह दोष होता है। इसके दूसरे लक्षण से अनपेक्षित अर्थ में अभिहित अर्थ का
परिणत होना भी इसी दोष का स्वरूप हो जाएगा। इसे मम्मटादि सम्मत
प्रकाशितविरुद्धता या विरुद्धमतिकृत् के समान समझा जा सकता है।
**एकार्थ—**एक ही वर्ण्य के लिये अनेक पदों का प्रयोग करना जो
पुनरुक्तता सा लगे तो 'एकार्थ' दोष कहलाता है।
**अभिप्लुतार्थ—**पद्य के प्रत्येक पाद में अर्थ का समाप्त हो जाना, जो
कि एक दूसरे से निरपेक्ष हों तो 'अभिप्लुतार्थ' दोष होता है अथवा लम्बे
समास का एक पूरे पद्य के पाद में प्रयोग के द्वारा अर्थ को दुर्बोध बनाना।
इसे मम्मटादि सम्मत क्लिष्टत्व के समान माना जा सकता है।
**न्यायादपेत—**लोकपरम्परा के विरोध होने या देश, काल, कला,
न्याय या आगम के विरुद्ध किसी उपयुक्त तर्क के न देने पर यह दोष होता
है। इसमें प्रतिज्ञा या दृष्टान्त का विरोध या अभाव रहता है। यह मम्मटादि
सम्मत विद्याविरुद्धता या प्रसिद्धिविरुद्धता जैसे दोषों के समान समझा जा
सकता है।
**विषम—**छन्द या वृत्तों के अनुचित प्रयोग करने पर यह छन्दोशैथिल्य
के कारण दोष होता है। यह विवक्षित अर्थ या रस के प्रतिकूल होता है।
मम्मटादि सम्मत हतवृत्तता के समान इसे समझा जा सकता है।
**विसन्धि—**जब पदों को सन्धि के नियमानुसार न रख कर सन्धिहीन
स्थिति में प्रयुक्त किया जाता है तो यह दोष होता है।
**शब्दच्युत—**उचित शब्दों के यथासमय प्रयोग न करने से यह दोष
होता है। इस दोष का क्षेत्र विस्तीर्ण है जिसमें विवक्षित भाव का प्रकाशन
न होना इस दोष की स्थिति निर्माण करता है। क्योंकि ऐसे अपशब्दों के
प्रयोग से विवक्षित अर्थ के बोध में बाधा उत्पन्न हो जाती है। इसे सम्मटादि
सम्मत अवाचकत्व, असमर्थत्व तथा च्युतसंस्कृति जैसा समझा जा सकता है।
यह व्याकरण से भी एक ओर सम्बन्ध रखता है तथा अर्थ से भी।
इस प्रकार इस दोषनिरूपण के विवरण से स्पष्ट है कि शब्द के साधु
प्रयोग, वर्ण्य या अर्थ के उपयुक्त काव्यरचना करना तथा रसानुवर्ती छन्द
५ ना० द्वि० भू०