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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 87, कुल 668 में से

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पृष्ठ 87

( ७६ )
‘पाठ्य-गुण’ पद का प्रयोग किया था जिसकी व्याख्या करते हुए आचार्य
अभिनवगुप्तपाद ने बतलाया कि पाठ्य के जो उपकारक या आधार हों उन
( उपकरणों ) का विश्लेषण जिनसे अभिनय का पल्लवन किया जाए ‘पाठ्य-
गुण’ कहलाते हैं। ये उपकारक उपकरण हैं :—सप्तस्वर, तीन स्थान, चार
वर्ण, दो काकु, छः अलङ्कार तथा छः अङ्ग । यहाँ क्रमशः इनका विवरण दे
रहे हैं :—
सप्तस्वर—रसों के सन्दर्भ में गीतादि के स्वरों का विनियोजन ही
पाठ्य का सप्तस्वर गुण कहलाता है। ये सप्तस्वर हैं—षड्ज, ऋषभ,
गान्धार, मध्यम पञ्चम, धैवत तथा निषाद । इनमें हास्य तथा शृङ्गाररस के
योग में मध्यम तथा पञ्चम स्वरों का करुणरस के योग में गान्धार तथा
निषाद स्वरों का तथा भयानक एवं बीभत्स रस के योग में धैवत स्वर का
विधान विहित है।
स्थान—इसके अन्तर्गत शरीर के शिर, कण्ठ तथा उरस् प्रदेश आते हैं
जिनके विशिष्ट क्रम से स्वरों का उत्थान किया जाता है तथा काकु का
प्रयोग। पाठ्य के प्रसंग में पात्रों की दूरस्थ स्थिति में शिर तथा कण्ठ को
किञ्चिद् दूरी में रखते हुए तथा निकटस्थ पात्रों के साथ संवाद की स्थिति में
उरस् का प्रयोग किया जाता है। आचार्य अभिनवगुप्तपाद ने इस प्रसंग में
बतलाया कि दूरस्थ पात्रों को शिर या मूर्धा निष्पन्न स्वर से तार या उच्च-
ध्वनि में बुलाया या संभाषण किया जाता है जब कि अतिदूरी के न होने पर
कण्ठ के मध्य स्वर से संभाषण किया जाता है। इसी प्रकार समीपवर्ती पात्र
से उरस् या वक्षःस्थल के समीपवर्ती मन्द्रस्वर से संभाषण होता है।
वर्ण—नाट्यशास्त्र में चार पाठ्यवर्ण बतलाये हैं—उदात्त, अनुदात्त,
स्वरित तथा कम्पित जिनका हास्य आदि रसों के योग में प्रयोग ( या
उपयोग ) होता है। स्वरित तथा उदात्त का प्रयोग हास्य तथा शृङ्गार
रस में, उदात्त तथा कम्पित का वीर, रौद्र तथा अद्भुतरस में तथा करुण,
बीभत्स एवं भयानक रसों में अनुदात्त, स्वरित तथा कम्पित वर्णों का प्रयोग
किया जाता है।
काकु—पाठ्यगुण का प्राणभूततत्व काकु होता है, क्योंकि काकु के ही
द्वारा स्वरवैभिन्य से विचित्रता आती है तथा नवीन अर्थ का आधार
विस्तीर्णता को प्राप्त करता है। इस काकु के दो प्रभेद होते हैं—
( १ ) साकाङ्क्ष, ( २ ) निराकाङ्क्ष । प्रकरणादि की अपेक्षा करने वाला
काकुविधान साकाङ्क्ष कहलाता है। इसमें तार से मन्द्र तक स्वर, अनियत