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नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 75, कुल 668 में से

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मुनि ने विवरण दिया है। ऐसा प्रतीत होता है कि दोषपद्धति को प्राचीन
शास्त्र परम्परा के आधार पर—विशेषतः गौतम के न्यायसूत्र या महाभारत
आदि के आधार पर पल्लवित किया गया था। इनमें सामान्यतः जिन दोषों
को बतलाया गया था उन्हींके अनुसरण या आदर्श पर काव्यदोषों का भी
निरूपण हुआ जिसका उद्देश्य था काव्य में पूर्णता की स्थिति बनाए रखना ।
काव्यदोषों के निरूपण का विवरण सर्व प्रथम नाट्यशास्त्र में ही मिलता है ।
अतः इसके प्रवर्तक भी भरतमुनि ही थे यह स्पष्ट है। उत्तरभावी आचार्यों ने
दोष के स्वरूप का विवेचन तथा विस्तार लोकव्यवहार एवं विविधशास्त्रों के
परिशीलन के प्रकाश में ही किया है। भरतमुनि की पूर्ववर्ती जो काव्य-
शास्त्रीयपद्धति दोष आदि के लिये चल रही होगी उसका भी भरतमुनि ने
अपनी रचना में निवेश किया था तथा समकालीन मान्यताओं को ध्यान में
रखकर नाट्यशास्त्र में 'दोषविधान' निरूपित किया था जो उनके ग्रन्थ के
परिशीलन से स्पष्ट ही देखा जा सकता है।
दोष तथा उनके प्रभेद—भरत मुनि ने गुणों की संख्या दस मानी
है जिसे हम आगे दिखलाएँगे तथा गुणों को दोषों का विपर्यय मानने के
आधार पर दोषों की भी संख्या दस ही की है। निश्चित ही काव्य के क्षेत्र
में दोष पहिले उपस्थित थे क्योंकि काव्य भाषा के क्षेत्र की वस्तु मानी
जाती है तथा इसी कारण गुण ही दोषों के विपर्यय होंगे यह बात उपयुक्त
ही है। इन दोनों का क्रम इस प्रकार दिया गया है :—
( १ ) गूढ़ार्थ, ( २ ) अर्थान्तर, ( ३ ) अर्थहीन, ( ४ ) भिन्नार्थ,
(५) एकार्थ; ( ६ ) अभिप्लुतार्थ, ( ७ ) न्यायादपेत, ( ८ ) विषम,
( ६ ) विसन्धि तथा ( १० ) शब्द ( पद ) च्युत। क्रमशः इनका विवरण
इस प्रकार है।
गूढ़ार्थ—शब्दों के गूढ़ार्थ को पर्याय शब्द से बतलाना 'गूढ़ार्थ दोष' है।
नाट्य एवं काव्य के प्रयोग में गूढ़ार्थता अर्थबोध में बाधक होती है। जैसे
( टिप्पणी में भी ) 'दशरथ' पद के लिये 'अधिकनवविमान' का प्रयोग ।
यहाँ ऐसे यदृच्छा शब्द को पर्याय द्वारा संकेतित किया गया जो दुर्बोधताग्रस्त
है। मम्मट ने इसे ही 'निहतार्थ' दोष कहा है ।
अर्थान्तर—अवर्ण्य का वर्णन करना 'अर्थान्तर नामक दोष' है। इसी कारण
वर्ण्य वस्तु का औचित्य दब जाता है तथा प्रतिपाद्य विषय या रस की उपेक्षा
होने लगती है। इसे मम्मटादि ने अवाच्यवचन या अमतपरार्थता जैसे दोषों में
परिगणित कर व्यापक विचार किया ।