नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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बन कर उसकी आत्मा के भी उपकारक बन जाते हैं। वे केवल बहिरंग के
प्रसाधक मात्र नहीं रहते । भरतमुनि का यह संकेत मानवीय वृत्तियों एवं
संवेदनाओं की उद्भावक ऐसी ही काव्यरचनाओं को करता है जो रससम्पृक्त
हों । कालान्तर में अलङ्कार-पद्धति का विकास रस से स्वतन्त्र होकर
चमत्कार की उद्भावक एवं असाधारण उक्ति वैचित्र्य को प्रश्रय देने वाली
प्रवृत्तियों की बहुलता को लेकर हुआ, जिसने कविता को सर्वजनसंवेद्य एवं
सहजवेद्य ( तथा सरस ) रूप से हटाकर अनेक रत्नादि के हार तथा
विभूषणादि से मण्डित रमणी के सौन्दर्य को दिखलाने की प्रवृत्ति में अधिक
रुचि ली । यह शोभा के प्रसार की न्यूनाधिक मात्रा को अलङ्कारादि से
सम्पादित करने वाली विभेदकशक्ति थी जिसे इसी रुचि की पूर्ति में पूर्णतः
जुटा दिया गया था । अतः यहाँ अब हम क्रमशः नाट्यशास्त्र में चर्चित
अलङ्कारों का थोड़ा विवरण देते हैं ।
उपमा—गुण तथा आकृति की समानता के आधार पर दो भिन्न
वस्तुओं का उपमित होना 'उपमा' है । विषय की दृष्टि से नाट्यशास्त्र में
उपमा के प्रभेद भी पाँच रूप में दिखलाये गये हैं । प्रशंसा में प्रशंसोपमा,
निन्दा में निन्दितोपमा, कल्पना में कल्पितोपमा, सादृश्य में सादृश्योपमा तथा
किञ्चित् सादृश्य में किञ्चित् सदृशोपमा । यद्यपि उपमा के रूप प्राचीन वैदिक
मन्त्रों में प्राप्त थे तथा यास्क के निरुक्त में इसकी चर्चा भी है किन्तु इसकी
सर्वप्रथम शास्त्रीय परिभाषा देकर प्रभेद विनिश्चय प्रथमतः भरतमुनि ने ही
किया जिसके आधार पर बाद में आगे चलकर अनेक उपमामूलक नवीन
अलङ्कारों की उद्भावना हुई । भारतीय कविता की सौन्दर्यसृष्टि में उपमा
का योगदान महत्वपूर्ण तथा ऐतिहासिक भी है । अनन्वय, उपमेयोपमा,
प्रतिवस्तूपमा, अपह्नुति, सन्देह, भ्रान्तिमान्, अतिशयोक्ति जैसे सादृश्यमूलक
अलङ्कार उपमा के विस्तार,या विकास ही हैं। इसी कारण उत्तरभावी
अलङ्कार शास्त्र के प्रसिद्ध विद्वान् अप्पयदीक्षित ने उपमा को ऐसी नटी
निरूपित किया जो काव्य के रङ्गमञ्च पर विभिन्न भूमिकाओं में अवतरित
होकर सहृदयों के चित्त का अनुरञ्जन करती हो ।¹
दीपक—एक अर्थ के द्वारा अनेक अर्थों का दीपक की भाँति प्रकाशक
“दीपक” है। भरतमुनि ने उपमा की तरह दीपक के अनेक प्रभेद नहीं
किये । अभिनवगुप्तपाद ने भरत के लक्षण के आधार पर इसी के स्वरूप
१. “उपमैका शैलूषी सम्प्राप्ता चित्रभूमिकाभेदात् ।
रञ्जयति काव्यरङ्गे नृत्यन्ती तद्विदां चेतः ॥”—कुव०