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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 78, कुल 668 में से

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ने माना है। तीन गुणों को ही काव्य में मान्य करने वाले मम्मटादि ने भी
इसे एक गुण ही स्वीकृत किया है ।
समता—जिसमें न अधिक असमस्त पद तथा न व्यर्थाभिधायी या
दुर्बोध पद हों तो 'समता' गुण होता है। अन्य पाठ के अनुसार गुण तथा
अलङ्कारों का समुचित योग होना 'समता' है। आचार्य हेमचन्द्र ने अन्य पाठ
को मान्य कर बतलाया कि भिन्न अधिकरण में अवस्थित गुण तथा अलङ्कार
परस्पर विभूषित नहीं करते। सर्वेश्वर ने भी (अपने साहित्यसार ग्रन्थ में)
यही पाठ स्वीकार किया। वामन ने समता को वृत्ति में अन्तर्भुक्त किया
तथा अन्य कुछ आचार्य मार्ग की भिन्नता के कारण समता को दोष मानने
लगे थे ।
समाधि—इष्टार्थ की अभिव्यक्ति के लिये उपमा को ग्रहण करना या
कविप्रतिभा द्वारा प्रयुक्त पद या वाक्य से विशिष्ट अर्थान्तर की प्रतीति होना
'समाधि' है। आचार्य अभिनवगुप्तपाद ने इसे शब्द का गुण निरूपित कर
विस्तृत विवरण दिया है ।
माधुर्य—वाक्य की बार-बार आवृत्ति होने पर भी उद्वेग रहित मधुरता
का बना रहना 'माधुर्य' हैं। इस गुण को मम्मटादि ने त्रिगुण में मान्यता दी
है तथा अभिनवगुप्त इसे अर्थगुण बतलाते हैं ।
ओज—जिसमें समासबहुल रचना हो तथा जो अनेक विचित्र, उदार
तथा परस्पर अपेक्षित अर्थों से अनुमत रहे तो 'ओज' गुण होता है। अन्य
पाठ के अनुसार शब्दार्थ की समृद्धि से उदात्त अर्थ का प्रतिभासित होना
'ओज' है। आचार्य हेमचन्द्र ने ओज के इसी लक्षण को मान्य करते हुए
इसे प्रकृत कवि कर्म निरूपित किया । आचार्य अभिनवगुप्त पाद ने ओज को
अर्थगुण माना तथा मम्मटादि ने इसे त्रिगुण में एक गुण के रूप में मान्य
किया। डॉ० वी० राघवन्¹ ने इसके पाठ में 'सानुरागैः' के सानु शब्द के
स्थान पर काकुशब्द सुझाया तथा तदनुसार अर्थसङ्गति को बैठाने का आग्रह
किया। परन्तु ऐसे पाठ को मानने का आधार (किन्हीं नाट्यशास्त्र की
प्राचीन प्रति या हस्तलेखों में प्राप्त नहीं होने) स्पष्टतः प्राप्त नहीं होता ।
दूसरे अभिनवगुप्तपाद ने इसके दोनों पाठों की भी परम्परा के अनुगत व्याख्या
दी है तथा इसी कारण विषय के अनुगत स्वतन्त्र कल्पना को अधिक बढ़ावा
मिलने के सभी अवसर क्षीण हो गये हैं ।


१. द्रष्ट-डॉ० राघवन्-भोज का शृङ्गारप्रकाश-पृष्ठ २६८ ।