सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 73, कुल 668 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 73

( ६२ )
को—'एक अवान्तर से असंयुक्त रहकर जो क्रिया, गुण, जाति आदि की
आकाङ्क्षा की सम्यक् पूर्ति करता हो तो उसे दीपक की प्रकृति के कारण
‘दीपक’ समझना चाहिए’ कहकर विशेष स्पष्ट किया जिसकी भरतमुनि के
द्वारा दिये गये उदाहरण से पुष्टि होती है ।
रूपक—इस अलङ्कार में किञ्चित् सादृश्य तथा तुल्यावयवत्व की स्थिति
होती है । इसके भी मुनि ने प्रभेद नहीं किये किन्तु उनके विवरण से रूपक के
साङ्ग या एकदेशविवर्ति होने के संकेत अवश्य मिल जाते हैं । यहाँ पाठभेद में
रूपक का अन्य एक लक्षण भी मिलता है । ( जिसकी व्याख्या यथास्थान
देखनी चाहिए ) ।
यमक—भरतमुनि ने यमक अलङ्कार के लक्षण तथा उसके प्रभेदों के
सोदाहरण विवरण से शब्दालङ्कारों को आधार प्रदान किया यह स्पष्ट ही
प्रतीत होता है । यहाँ भरतमुनि ने वर्गीकरण के उद्देश्य से यमक के प्रभेद
नहीं किये केवल वर्णन ही उनका लक्ष्य था । इसी कारण उन्होंने शब्दाभ्यास
को ही यमक का लक्षण बतला कर उसके दस प्रभेद कर डाले थे । यहाँ
इस प्रकार किसी क्रम की स्थापना प्रतीत नहीं होती है । आगे चलकर ये
प्रभेद इस प्रकार बन जाते हैं—(१) पादान्त-यमक, (२) काञ्ची-यमक,
(३) समुद्ग-यमक, (४) विक्रान्त-यमक, (५) चक्रवात-यमक, (६) सन्दष्ट-
यमक, (७) पादादि-यमक, (८) आम्रेडित-यमक ( या पादान्ताम्रेडित-
यमक ), (६) चतुर्व्यवसित-यमक तथा (१०) माला-यमक ।
नाट्यशास्त्र में इन प्रभेदों के लक्षण तथा उदाहरण देकर विषय को
हृदयंगम करवाया गया है । इसमें मालायमक में एक व्यञ्जन की समस्त
पद्य में आवृत्ति रहने से इसे परवर्ती आचार्यों ने एक विशिष्ट अलङ्कार के
अनुप्रास नाम को देकर इसके प्रभेद दिखलाये । भरत प्रतिपादित इन प्रभेदों
ने आगे चल कर यमक के अनेक प्रभेदों को आधार प्रदान किया जिसे
अग्निपुराण, दण्डी के काव्यादर्श, भामह के काव्यालङ्कार तथा भट्टिकाव्य में
देखा जा सकता है । यहाँ हम विस्तारभय से तथा अप्रासङ्गिक रहने से
इसकी चर्चा नहीं करेंगे । क्योंकि यमकों के प्रभेद उस समय वर्गीकरण की
स्थिति में नहीं थे अतः इनके उदाहरणों की स्थिति से भी अन्वेषक विद्वानों
को अधिक सन्तोष नहीं हुआ१ । आचार्य अभिनवगुप्तपाद ने यमक के प्रभेदों
के उदाहरणों की यथाशक्य संगति बैठाने का अवश्य उद्योग किया था ।
१. विस्तार के लिए द्रष्टव्य—डॉ० रुद्रदेव त्रिपाठी—'संस्कृत साहित्य में
शब्दालङ्कार, पृष्ठ—११६-१२० का विवरण ।