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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 74, कुल 668 में से

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अलङ्कारशास्त्र को नाट्यशास्त्र का आधार—यद्यपि नाट्यशास्त्र में
शब्द तथा अर्थ के आधार पर शब्दालङ्कार तथा अर्थालंकारों की परिकल्पना
तथा चर्चा नहीं हुई और नहीं विभाजन ही हुआ किन्तु इन अलङ्कारों के
विवेचन में परवर्ती अलंकारों की शब्द तथा अर्थगत स्थिति के प्रभेदों की
सम्भावनाएँ विद्यमान थीं। भरतमुनि ने नाट्यलक्षणों के अतिरिक्त चार पृथक्
अलंकारों का विवरण दिया था जब कि अलङ्कारों की संख्या अप्पयदीक्षित के
समय ( १७ वीं शती ) तक एक सौ चौबीस हो चुकी थी ( और वह भी
केवल अर्थालङ्कारों की ) जिनमें अलंकारों के अवान्तर भेदों का पृथक् (ही)
विस्तार है। इस प्रसंग में एक स्वाभाविक प्रश्न उपस्थित होता है कि क्या
भरतमुनि को केवल चार अलङ्कारों का निरूपण ही अभीष्ट था तथा उन्होंने
अपने समय तक प्रचलित सभी साहित्यिक तथ्यों के सभी पक्षों पर समान रूप
में तथा न्यायपूर्ण चिन्तन किया था। अब इस प्रश्न के सन्दर्भ में साहित्य तथा
उसके ऐतिहासिक क्रम पर दृष्टि डाली जाए तो यह स्पष्ट हो जायगा कि
नाट्यशास्त्र को गम्भीरता से देखने पर उपर्युक्त आशंका के लिये स्थान ही
कम रह जायगा।
भरतमुनि ने लक्षणों एवं अलङ्कारों का निरूपण किया था तथा उनमें विभेद
भी दर्शाया था जैसा पिछले विवरण से स्पष्ट है। इसमें जहाँ लक्षणों की संख्या
छत्तीस है वहीं पाठान्तरगत लक्षणों के भेद से यह संख्या और भी अधिक हो
गयी है। अलङ्कारशास्त्र के उत्तरभावी आचार्यों ने अलङ्कार तथा लक्षणों के
इन प्रभेदों की ओर गम्भीरता से अवधान न देकर अनेक लक्षणों को अलङ्कार
प्रभेद के रूप में प्रतिपादित करने की प्रवृत्ति ही दर्शायी जो कुछ शाब्दिक
परिभाषाओं के एवं उदाहरणों के नवीनीकरण को लिये हुए रहा भी था।
अतएव अलङ्कारशास्त्र के आचार्यों ने अनेक नये ऐसे अलङ्कारों की उद्भावना कर
डाली जिनसे भरतमुनि अनभिज्ञ नहीं थे। परन्तु इतना सही है कि भरतमुनि
लक्षणों का आधार लेकर ही अपने अलङ्कार तथा उनके प्रभेदों के आविष्कार
या निर्माण में समर्थ हो पाए थे। इस कारण सभी उत्तरभावी आलङ्कारिक
आचार्य किसी प्रकार अपने उपजीव्य ग्रन्थ नाट्यशास्त्र के आभारी हैं ही।
भरतमुनि ने मूलभूत अलङ्कारों तथा लक्षण, गुण, दोष आदि के द्वारा जिस
काव्यमार्ग का आरम्भ किया था उसे ही उत्तरभावी भामह, दण्डी आदि
आचार्यों ने अपनी मौलिक प्रतिभा के योग से विकसित एवं व्यवस्थित किया
था यह स्पष्टतः प्रतीत होता है।
दोषविधान—वाचिक अभिनय के इस क्रम में काव्यदोषों का भी भरत-