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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 79, कुल 668 में से

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सौकुमार्य—सुखपूर्वक उच्चारण या प्रयोग के उपयुक्त तथा सुश्लिष्ट
सन्धि एवं कोमल अर्थ से अनुप्राणित रचना ‘सौकुमार्य’ कहलाती है। आचार्य
अभिनवगुप्तपाद ने इसे शब्द तथा अर्थ गुण मानकर बतलाया है कि ‘सुकुमारता’
दोनों में होती है। दण्डी तथा हेमचन्द्राचार्य ने इसे शब्दगुण माना है।
अर्थव्यक्ति—नाट्य या काव्य व्यापार में सुप्रसिद्ध तथा लोकप्रसिद्ध
पदार्थ या क्रिया का अभिधान होने से अर्थ का सुस्पष्ट अवबोध होना
‘अर्थव्यक्ति’ है। अन्य पाठ के अनुसार पात्र के द्वारा अपने मनोबल के योग
द्वारा प्रेक्षक के हृदय में अवस्थित भाव या वस्तु का अभिनय द्वारा प्रस्तुती-
करण ‘अर्थव्यक्ति’ होता है। आचार्य हेमचन्द्र ने इसी अन्य पाठ को लिया है।
आचार्य वामन इसे अर्थगुण तथा दण्डी एवं अन्य आचार्य इसे जाति या
स्वाभावोक्ति अलङ्कार के निकटवर्ती मानते हैं। विश्वनाथ कविराज तथा
मम्मट भट्ट आदि ने इसे प्रसाद गुण स्वीकार नहीं किया ।
उदारत्व ( उदात्तता, उदारता )—विविध दिव्यभावों से विभूषित
तथा शृङ्गार एवं अद्भुत रसों से समायोजित ‘उदारत्व’ गुण है। अन्य पाठ
के अनुसार अनेक विशिष्ट या सूक्ष्म अर्थों तथा सौष्ठव से पूर्ण रचना ‘उदात्त’
कहलाती है। इस अन्य पाठ को हेमचन्द्र, वामन तथा भोज ने लिया है।
उदारत्व काव्य का प्राणभूत तत्व माना जाता है। आचार्य वामन ने उदारता
को ग्राम्यत्व दोष का अभाव बतलाया तथा ओज में अन्तर्भाव माना क्योंकि
दोषाभाव स्वतन्त्र गुण नहीं हो सकता । श्री मम्मट तथा विश्वनाथ कविराज
आदि ने भी वामन का अनुसरण किया परन्तु आचार्य अभिनवगुप्त इसे
शब्द गुण मान कर व्याख्या करते हैं।
कान्ति—चन्द्र के समान मन तथा श्रोत्र को आह्लादित करने वाली,
लीला आदि चेष्टालङ्कारों से रमणीय शब्दबन्ध या रचना ‘कान्ति’ कहलाती
है। वामन ने इसे ‘दीप्तरस’ कहा तथा दण्डी इसमें लोकसीमा का अतिक्रमण
मानते हैं। आचार्य अभिनवगुप्तपाद इसे शब्दगुण मानते हैं, परन्तु कान्ति में
अर्थगुण का भी समन्वय दिखलाई पडता है।
गुण-स्वरूप तथा स्थिति-मीमांसा—नाट्यशास्त्र में निर्देशित गुण
निरूपण से स्पष्ट है कि ये शब्द तथा अर्थ दोनों को ही ध्यान में रखकर
भरतमुनि ने निरूपित किये थे तथा इनकी विभाजक रेखा भी इन गुणलक्षणों
में देखी जा सकती है, किन्तु यह तथ्य केवल परिभाषित स्वरूप के परिशीलन
से प्राप्त होता है। इस परिशीलन से बाद में दो मत प्रधानतः उभरते हैं
जिनमें प्रथम मत में भी दो वर्ग हैं। इनमें भरतमुनि, वामन तथा अभिनव-