नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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तथा जिसका तत्कालीन प्रजाजन में बोलचाल में व्यवहार होता था । यही
भाषा नाट्यशास्त्र में वर्णित 'अतिभाषा' थी जिसका देवताओं की ( या
पवित्र ) भाषा के रूप में विवरण दिया गया है । इसका स्वरूप कैसा था ?
यह प्रश्न कोई कठिन बात नहीं क्योंकि ऐसे स्थान पर हमें पाणिनि से थोड़ी
सहायता मिल जाती है । पुराकालीन वैयाकरणों ( तथा पाणिनि ) ने अपने
ग्रन्थों में छन्दों की ( वेदादि की ) भाषा के साथ-साथ अपने समय में प्रचलित
भाषा के रूप दिये हैं। इन सभी आचार्यों ने पूर्वशास्त्रकालीन संस्कृतभाषा
को छन्दों की भाषा मान्य की है। जो निश्चित रूप में प्राचीनभारतीय-आर्य
भाषा या वैदिक-संस्कृतभाषा थी तथा जिसका ब्राह्मणों के द्वारा यज्ञविधियों
आदि में प्रयोग होता था। इसी का महर्षि पाणिनि ने छन्दोभाषा के रूप में
निरूपण किया था तथा दिव्यपात्रों में इसी भाषा का अतिभाषा के रूप में
भरतमुनि ने विधान दिया है। आचार्य अभिनवगुप्त का मत है कि वैदिक-
शब्दों के बहुल प्रयोग तथा स्वरभेद आदि संस्कार से पूर्ण मण्डित भाषा की
स्थिति को 'अतिभाषा' में देखा जा सकता है।
आर्यभाषा—अतिभाषा की परवर्ती भाषा आर्यभाषा थी, जिसका
व्यवहार ( नाटकादि ) रूपक में राजा जैसे उदात्त पात्र करते थे। आर्यभाषा
का स्वरूप हम मोटे रूप में शास्त्रीय-संस्कृत या लौकिकसंस्कृत मान सकते
हैं। जिसका समाज के उच्चस्तरीय वर्ग में व्यवहार होता था। इसका
आर्यभाषा नामकरण तथा नाट्यशास्त्र में स्थित विवरण यह संकेत करने
के लिये पर्याप्त है कि यह समग्र आर्यावर्त से सम्बद्ध भाषा थी। आचार्य
अभिनवगुप्त का मत है कि पूर्ण संस्कार सम्पन्न संस्कृतभाषा को ही आर्य-
भाषा समझना चाहिए ।१
जातिभाषा—आर्यभारतीय प्रजा की आवासीय या प्रादेशिक भाषाएँ
ही 'जातिभाषा' है। ये संस्कृत तथा प्राकृतभाषा के अन्तर्वर्ती विस्तीर्ण
प्रभेद रखती थीं। अब यहाँ प्रश्न यह होगा कि क्या यह भाषा सामान्य-
भारतीय प्रजा की आवासीय या क्षेत्रीय भाषा रही थी ? इसका उत्तर बहुत
साफ है। यद्यपि हमारे पास तत्कालीन समाज के स्पष्ट नृवंशीयतत्व से
सम्बद्ध चित्र विद्यमान नहीं है परन्तु प्राप्य तथ्यों के तथा सुदृढ़ परिकल्पना के
आधार पर यह माना जा सकता है कि उस समय नाट्यप्रदर्शन देखने वाली
प्रजा विशुद्ध आर्यजातीय तथा मिश्र आर्यजातीय अवश्य रही थी तथा सामान्य
१. द्रष्टव्य-अभि० भार० Vol II पृ० ३७२ ( बडौदा सं० ) ।