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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 80, कुल 668 में से

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गुप्तपाद के अनुसार ये गुण शब्द तथा अर्थ दोनों से सम्बद्ध हैं। द्वितीय
वर्ग के आचार्य दण्डी का मत है कि श्लेष जैसे कुछ गुण शब्दों से, प्रसाद
जैसे कुछ गुण अर्थों से तथा सौकुमार्य जैसे कुछ गुण दोनों से सम्बद्ध हैं।
आचार्य वामन के मत में भरत निरूपित दस गुण शब्दों के तथा दस
अर्थगुण होते हैं। इस प्रकार कुल मिलाकर गुण बीस हैं। भोजराज
ने वामन का अनुसरण करते हुए चौबीस गुणों का प्रतिपादन किया। इनके
मत में गुणयोग नित्य हैं तथा अलंकृत होने पर भी गुण-रहित काव्य प्रीतिकर
नहीं होता। काव्य में गुण-आदान नियमतः या नित्य होता है तथा अलङ्कार
का विधान कामचार है। उद्भट के काव्यालङ्कारसूत्र के व्याख्याकार
प्रतीहारेन्दुराज के अनुसार गुण काव्य का नित्य धर्म होता है। जयदेव ने
चन्द्रालोक में वामन के अनुसार ही गुणों का विवरण दिया है।
इन गुणों की संख्या के विषय में भी दो भिन्न-भिन्न मत साहित्य में
विकसित हुए। सर्वप्राचीन आचार्य तथा गुणों के प्रवर्तक भरतमुनि के मत में
गुणों की संख्या दस है। इस मत का अनुसरण वामन, दण्डी तथा अभिनव-
गुप्तपादाचार्य करते हैं। द्वितीयमत के अनुसार गुणों की संख्या मात्र तीन हैं।
इस मत के प्रवर्तक आचार्य भामह हैं जो काव्य के लिये तीन गुणों—माधुर्य,
ओज तथा प्रसाद—का ही उल्लेख करते हैं। भामह का आधार भरत तथा
दण्डी से भिन्न है तथा वे दस गुणों की प्रामाणिकता स्वीकार नहीं करते।
आगे इस मत का अनुसरण किया आनन्दवर्धनाचार्य तथा उनके अनुयायी
मम्मटादि ने भी गुणों की संख्या तीन मान कर। ये भी कुछ गुणों को
स्वतन्त्रगुण न मान कर उन्हें दोषाभाव तथा कुछ गुणों को अलङ्कारों के
अन्तर्गत स्वीकार करते हैं।
इस प्रकार काव्यगुणों के विषय में दो परस्पर स्वतन्त्र या निरपेक्ष मत
विकसित हुए थे। इनमें एक का भरतमुनि ने तथा अन्य का प्रवर्तन आचार्य
भामह ने किया था। यह भी इस सन्दर्भ में ध्यातव्य है कि जहाँ आचार्य
भरत नाट्यविद्या के सम्प्रदाय के प्रमुख थे वहीं आचार्य भामह काव्यशास्त्र के
प्रमुख रहे। दोनों में इस विषय में भिन्नता है कि काव्यरचना के साधनवर्ग
में कौन अधिक अपेक्षित है। इस क्रम में भरतमुनि के मत में नाट्यरचना के
लिये गुणों की अधिक आवश्यकता होगी, अलङ्कारों की नहीं। इसी कारण
काव्यरचना के साधनों में नाट्यशास्त्रीय आचार्य भरत ने अपने साधनों की
सूची में काव्यगुणों तथा लक्षणों की संख्या अधिक रखी तथा अलङ्कारों की