नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
( ४ )
कर्म होते हैं यथा—समा, नता, उन्नता, व्यस्ता, रेचिता, कुञ्चिता, अञ्चिता,
वलिता तथा विकृता ।
मुखराग—अभिनय में मुखराग का विशिष्ट योग रहने से इसका अतिशय
महत्त्व है । कपोल तथा नयनों में जो एक विशेष राग चित्तवृत्तियों के आवेग
प्रवाह में परिलक्षित होता है उसका प्रदर्शन कार्य सूक्ष्ममतिजन से ही संवेद्य
माना जाता है। भाव तथा रस के सन्दर्भ में मुखराग का प्रस्तुतीकरण
अभिनेता के लिये महत्त्वपूर्ण तथा आवश्यक माना जाता है। इसके महत्त्व
को मुनि ने स्वयं ही—"शाखा, अंग तथा उपांग से युक्त अभिनय के मुखराग
से हीन होने पर शोभा नहीं" कहकर बतलाया है। मुखराग आङ्गिक अभिनय
की अभिव्यक्ति का प्रवेश द्वार है जिससे दर्शक को तुरन्त आन्तरिक सुख-
दुःखमयी दशा का प्रत्यक्ष हो जाता है।
मुखराग के चार प्रभेद हैं—स्वाभाविक, प्रसन्न, रक्त तथा श्याम । तटस्थ
स्थिति एवं सहज दशा में 'स्वाभाविक' की, शृङ्गार-हास्य तथा अद्भुतरस
में 'प्रसन्न' की, वीर, रौद्र तथा करुण रस एवं मत्त तथा रुग्ण दशा में 'रक्त'
की तथा भयानक और वीभत्सरस में 'श्याम' की योजना की जाती है। इस
प्रकार यह स्पष्ट है कि रसात्मकबोध में मुखराग का अतिशय योगदान
रहता है। वेमभूपाल ने मुखराग के इन प्रभेदों के अतिरिक्त विकस्वर,
अरुण, मलिन तथा पाण्डु नामक चार अतिरिक्त प्रभेद भी माने हैं। नेत्रों के
अभिनय के साथ-साथ मुखराग का संयोजन नाट्यप्रयोग की सिद्धि के मूल
में अवश्य विद्यमान रहता है। अंग तथा उपाङ्ग का यही विवरण लक्षणादि
सहित नाट्यशास्त्र के अष्टम अध्याय में दिया गया है ।
हस्ताभिनय—नवम अध्याय में हस्ताभिनय को दिखलाया है, जिसका
आङ्गिक अभिनय में अतिशय महत्त्व ( माना जाता ) है। मानव चेष्टाओं
से उसके अंग उपांगों की दशाओं को जो तत्व आलोक सम्पन्न रूपवान् तथा
अभिव्यक्ति सम्पन्न बनाता है। यह एक ऐसा माध्यम है जो आन्तर-भावों को
स्वरूप देकर रसभूमि पर ले जाता है। हस्ताभिनय द्वारा ही नाट्यार्थ को
रूप प्रदान किया जाता है तथा वे भावद्वन्द्वों को बोधगम्य बनाते हैं।
प्रत्येक हस्तमुद्रा अपने मूल में भाव एवं रस की आन्तरिक प्रेरणा रखती
है। भरतमुनि ने इसी कारण हस्ताभिनय का विशिष्टता से विवरण देते
हुए इनके स्वरूप को प्रस्तुत करते समय देश, काल, कर्म, स्थान तथा
प्रचार के अतिरिक्त करणों तथा अर्थयुक्ति को ध्यान में रखने का स्पष्ट
निर्देश ( भी ) दिया है। हस्तमुद्रा से प्रयोगगत सुकुमार तथा उद्धत स्थिति
( ५ )
का अन्तर तुरन्त प्रकट हो जाता है । इसी कारण यहाँ अर्थयुक्ति का महत्त्व
सर्वोपरि होता है तथा वाचिक अभिनय में भी हस्तस्थिति का संयोग अपेक्षित
रस में रखा ही जाता है ।
पात्रानुसारी हस्ताभिनय
हस्ताभिनय में पात्रों की श्रेणी या स्तर के अनुरूप स्थान की भी योजना
रखी जाती है । अभिनय की दशा में उत्तमपात्र ललाट आदि उन्नत ( उत्तम )
स्थानों पर अपने हस्तों को ले जाते हैं, मध्यमपात्र उन्हें वक्षःस्थल के बराबर
रखते हैं तथा अधमपात्र कटि या उससे निचले शरीर के प्रदेश पर स्पर्श
करते हुए हाथों को रखते हैं । स्थानविभाजन की इसी प्रणाली का अभिनव-
गुप्तपाद के उपाध्याय श्रीभट्टतौत ने समर्थन करते हुए बतलाया कि यही
स्थानविधान पात्रों की ( उत्तमादि ) स्थिति तथा मानसीदशा का आधार बन
इनका वर्गीकरण करता है । हम भी देखते हैं कि उत्तमपात्र के हृदय में स्थित
बात रहने पर उनका हस्त उत्तम अंगों का ( ही ) स्पर्श करता है, जब कि
हीनभावों के समय निम्न अंगों का । इस प्रकार पात्रों की उत्तम, मध्यम तथा
अधमस्थिति के आधार पर हस्तप्रचार ( या गति ) की अल्पता या आधिक्य
रखा जाता है । नाटकादि में उत्तमपात्रों के हस्तप्रचार अल्पतायुक्त,
मध्यम तथा अधमश्रेणी के नाट्यप्रयोगों में पात्रों के हस्तप्रचार मध्यम तथा
नृत्तादि प्रयोगों में हस्तप्रचार की बहुलता या आधिक्य रखा जाता है,
क्योंकि यहाँ हस्तप्रचार भावाभिव्यक्ति का साधन होता है । इसके अतिरिक्त
बाह्यशोभा तथा आकर्षण भी हस्तप्रचार से दिखलाया जाता है तथा नाटकीय
पात्रों का श्रेणी स्तर भी हस्तमुद्राओं से ही जाना जाता है ।
शास्त्रानुमोदिता
हस्तमुद्राओं के द्वारा अभिनय को व्यापक एवं लोकानुमोदित भावभूमि
के परिवेश में विवेचित कर भरतमुनि ने स्पष्टतः यही बतलाया कि नाट्यार्थ
के अनुरूप लोकव्यवहार एवं लोकस्वभाव को ध्यान में रख कर हस्तमुद्राओं
का प्रस्तुतीकरण होना चाहिए । क्योंकि इस प्रकार किये गये अभिनय से
उस 'सौष्ठव' को साधा जाता है जहाँ अंगों में सौन्दर्य तथा प्रसार हो ।
अतः अभीष्ट सौष्ठव का हस्ताभिनय से गहरा सम्बन्ध है तथा सौष्ठवविहीन
हस्ताभिनय का इसी कारण निषेध भी किया गया है । इसलिये उत्तम तथा
मध्यम श्रेणी के पात्र शास्त्रानुमोदित हस्तमुद्राओं के साथ ही अपना
अभिनय प्रस्तुत करते हैं ।
( ६ )
कालानुकूलता एवं अनुगमन
इसी प्रकार हस्ताभिनय का कालानुसारी होना भी आवश्यक है, जिससे
'सौष्ठव' बराबर बना रहे । भरतमुनि ने प्रयोग की दृष्टि से कभी या किसी
समय विहस्त - ( हस्त चेष्टाओं से रहित ) स्थिति तथा कभी हस्तमुद्राओं के
अल्पप्रयोग का भी जहाँ निर्देश किया है वहाँ शास्त्रानुमोदित हस्त वाञ्छित
नहीं होता । उदाहरण के लिये—प्रमत्त, रोगग्रस्त तथा भयार्त्त व्यक्ति की
स्थिति में विहस्त ( हस्तमुद्राओं का प्रयोग न रहना ) ही उचित होता है ।
इसके अतिरिक्त मूर्च्छा, जुगुप्सा, हिम या आतप की पीड़ा जैसी अवस्था हो
तो वहाँ हस्ताभिनय नहीं होता, प्रत्युत भाव की अभिव्यक्ति में अक्षमता
लाना होता है क्योंकि ऐसे प्रसंग में हस्ताभिनय के न रखने में ही सौष्ठव
है । इसी कारण ऐसे अवसर पर मुनि ने सात्विकअभिनय के द्वारा सौष्ठव
की व्यञ्जना का निर्देश किया भी है । इसी विषय पर आचार्य अभिनव-
गुप्तपाद ने बतलाया कि¹ अभिनय के समय आन्तरिक चित्तवृत्तियों के
प्रकाशन में सक्षम हस्तमुद्राओं का ही प्रयोग उचित रहता है । जैसे भय
की दशा में कपोत हस्तों का, तन्द्रा तथा आलस्य में कर्कट हस्त का
शोकसन्तप्त स्थिति में दोलाहस्त का प्रयोग तथा ईर्ष्या आदि भावों के
अनुभावन में सात्त्विकअभिनय ही प्रस्तुत किया जाता है । परन्तु ऐसे समय
जो बाह्यगुण या द्रव्य के प्रकाशन हो उनका प्रयोग नहीं करना चाहिए ।
इसी प्रकार पात्र की व्यग्र या व्यस्त स्थिति में भी हस्ताभिनय प्रस्तुत नहीं
किया जाता है, किन्तु यहाँ मुखराग या अर्थ प्रकाशक तथा विराम आदि से
युक्त वाचिकाभिनय की योजना रखी जाती है ।
मुखराग से अङ्गाभिनय की अनुगतता
यह कहा जा चुका है कि हस्ताभिनय द्वारा भावों का प्रकाशन किया
जाता है, परन्तु इसी के साथ-साथ मुख, नेत्र, भ्रू, कपोल आदि के यथोचित
सन्निवेश के साथ मुखराग की योजना भी होना आवश्यक है, अन्यथा
केवल हस्त प्रचार मात्र से नाट्यार्थ की अभिव्यक्ति नहीं होगी । इसी कारण
मुनि ने मुखराग को अभिनय का प्राणतत्त्व प्रतिपादित किया, क्योंकि इसके
बिना आन्तर चित्तवृत्तियों तथा रागात्मक अनुभूतियों का प्रकाशन सम्भव
नहीं है । अतः स्पष्ट है कि नेत्र, भ्रू एवं अङ्गों की तथा मुखराग की
पारस्परिक अनुगत वृत्ति के द्वारा ही हस्तप्रचारों की अभिव्यञ्जना सौष्ठव-
शालिनी हो सकती है । इसलिए जिन जिन हस्तमुद्राओं के द्वारा आन्तर-
१. द्रष्ट० अभि० भा० पृ० ६८, ६६. बड़ौदा संस्करण ।
वृत्तियों की अभिव्यक्ति हो उनका अवश्य प्रयोग किया जाए। इन
हस्तमुद्राओं का नृत्य या नृत्त में प्रचुर प्रयोग रखा जाता है, परन्तु सात्त्विक
भावादि के अभिनय में अल्प प्रयोग होता है ।
हस्ताभिनय के विभेद
हस्ताभिनय के प्रभेदों की परिकल्पना विविध मुद्राओं के आधार पर
मुनि ने की तथा इनके तीन वर्ग बनाए। ये वर्ग हैं—(१) असंयुतहस्त,
(२) संयुतहस्त तथा (३) नृत्तहस्त । इनमें संयुतहस्त तेरह, असंयुतहस्त
चौबीस तथा नृत्तहस्त के तीस प्रभेद किये । मुद्राओं को भी मूल या
आधारमुद्रा तथा नृत्तहस्त में विभाजित किया जा सकता है। इनमें
मूलमुद्रा के अन्तर्गत संयुक्त तथा असंयुत हस्तों को रखा जाता है। मूलमुद्रायें
नृत्य की भाषा के मूलाक्षर समझी जाती है। अतः जैसे किसी एक वर्ण या
अक्षर का अलग या स्वतन्त्ररूप में भी अर्थ रहता है तथा मिल कर वही वर्ण
दूसरे अनेक शब्दों का निर्माण करते हुए अन्य अर्थाभिव्यक्तियाँ करता है, यही
स्थिति इन मुद्राओं की भी है। ये अलग-अलग भी अपना अर्थ रखती हैं तथा
सम्मिलित होकर भी। इसके अतिरिक्त कालान्तर में विभिन्न नृत्य परम्पराओं
तथा पद्धतियों के उद्भव के साथ-साथ अपनी परम्परागत हस्तमुद्राओं का
भी प्रचार देखने में आता है, किन्तु इन सभी का मूल एवं आधार ग्रन्थ
यही नाट्यशास्त्र है तथा इसी का विवरण इन सभी की अपेक्षा मुख्यता लिये
हुए है भी ।
असंयुतमुद्राएँ—एक हाथ से दर्शायी या की जाने वाली हस्तमुद्रा
या हस्त को 'असंयुतहस्त' कहा जाता है, जिनकी भरतमुनि ने चौबीस
स्थितियाँ या भेद दिखलाते हैं। इनके नाम हैं—(१) पताक, (२) त्रिपताक,
(३) कर्तरीमुख, (४) अर्धचन्द्र, (५) अराल, (६) शुकतुण्ड, (७) मुष्टि,
(८) शिखर, (६) कपित्थ, (१०) कटकामुख, (११) सूचीमुख, (१२) पद्म-
कोश, (१३) सर्पशीर्ष, (१४) मृगशीर्ष, (१५) कंगुल, (१६) अलपद्म,
(१७) चतुर, (१८) भ्रमर, (१६) हंसास्य, (२०) हंसपक्ष, (२१) सन्दंश,
(२२) मुकुल, (२३) ऊर्णनाभ तथा (२४) ताम्रचूड़ ।
अभिनयदर्पण के अनुसार असंयुतमुद्राओं की संख्या अट्ठाईस है तथा
चार पूरक मुद्राओं के साथ इनकी संख्या बत्तीस हो जाती है। इन अतिरिक्त
मुद्राओं के नाम हैं—अर्धपताक, मयूर, चन्द्रकला, सिंहमुख, त्रिशूल, व्याघ्र,
अर्धसूची, कटक तथा पल्ली । इनमें ( भरतोक्त ) ऊर्णनाभ को छोड़ कर
शेष सभी हस्तमुद्राओं के नाम नाट्यशास्त्र के अनुसार ही है । इनमें सोलह
मुद्राओं का स्वरूप भी नाट्यशास्त्र के अनुसार ही है । किन्तु नाट्यशास्त्र गत
नाम रहने पर भी स्वरूप भिन्न है । इनके नाम हैं :— कर्तरीमुख, कटकामुख,
सूचीमुख, मृगशीर्ष, हंसास्य, संदंश तथा ताम्रचूड । ये हस्तमुद्राएँ
हस्ताङ्गुलियों की विविध रचनाओं के द्वारा निर्मित की जाती हैं। इनके
स्वरूप तथा योजना का विवरण नाट्यशास्त्र में विस्तार से मिलता है ।
असंयुतहस्त की सारी क्रियायें एक हाथ से सम्पन्न होती हैं तथा ये ही
संयुतहस्त तथा नृत्तहस्तों के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करते हैं ।
संयुतहस्तमुद्राएँ—दोनों हाथों के परस्पर संश्लेष या योग से निर्मित
हस्तमुद्रा को 'संयुतहस्त' कहते हैं । जैसे असंयुतहस्तमुद्रा को वर्णमाला
का एक अक्षर माना जाता है तो संयुतहस्त को संयुक्ताक्षर समझा जाता है ।
नाट्यशास्त्र में संयुतहस्त के तेरह भेद कहे गये हैं। ये हैं :—( १ ) अञ्जलि,
( २ ) कपोत, ( ३ ) कर्कट, ( ४ ) स्वस्तिक, ( ५ ) कटकावर्धमान,
( ६ ) उत्सङ्ग, ( ७ ) निषध, ( ८ ) दोला, ( ६ ) पुष्पपुट, ( १० ) मकर,
( ११ ) गजदन्त, ( १२ ) अवहित्थ तथा ( १४ ) वर्धमान ।
अभिनयदर्पण में संयुतहस्तों की संख्या तेईस मिलती है, जिनमें नाट्य-
शास्त्र के अञ्जलि, कपोत, कर्कट, स्वस्तिक, कटकावर्धमान, उत्सङ्ग दोला
तथा पुष्पपुट के अतिरिक्त शिवलिङ्ग, कर्तरीस्वस्तिक, शकट, शङ्ख, चक्र,
सम्पुट, पाश, कीलक, मत्स्य, कूर्म, वराह, गरुड़, नागबन्ध, खट्वा तथा
भेरुण्ड हैं । नाट्यशास्त्र का मकरहस्त अभिनयदर्पण में मत्स्य है। इस प्रसंग में
आचार्य अभिनवगुप्त¹ ने भी बतलाया कि भरतमुनि के द्वारा निर्दिष्ट हस्तमुद्राओं
के अतिरिक्त भी हस्तमुद्राओं की परिकल्पना की जा सकती है तथा इसी
कारण कोहल आदि अन्य नाट्याचार्यों ( नन्दिकेश्वर ) ने भी हस्तमुद्राओं के
इनके अतिरिक्त अन्यप्रभेद भी दिखलाये हैं । इन मुद्राओं के द्वारा जिन-जिन
अर्थों को संकेतित किया गया उनके अतिरिक्त भावों के अभिनय भी प्रस्तुत
किये जा सकते हैं, यदि वे लोकप्रचलित स्थिति या भावगम्यता को लिये हों
तो । उदाहरणार्थ एक ही केशाकर्षण के व्यापार का अभिनय पात्रों के द्वारा
विभिन्न हस्तमुद्राओं के द्वारा हो सकता है । जैसे विदूषक द्वारा केशाकर्षण
'कटकामुख' हस्तों से तथा ( नायक द्वारा ) प्रिया का केशाकर्षण अरालहस्त'
से तथा रतिक्रीड़ा का केशाकर्षण 'मुष्टि' हस्त के द्वारा किया जाता है । इसी
१. द्रष्ट ना० शा० अभिनवभारती खण्ड-२ GOS पृष्ठ ५७ ।
( ६ )
प्रकार एक ही केशाकर्षण क्रिया की स्थिति को मनोभावों तथा पात्रों की
भिन्नता रहने पर भिन्न-भिन्न स्वरूप की रचना करते हुए रखना तथा
सम्पन्न करना उचित माना गया । कथकलि के परम्परागत आधार ग्रन्थ
'हस्तलक्षण-दीपिका' में इन हस्तों के स्वरूप तथा योजना का विवरण
है परन्तु इस ग्रन्थ में असंयुक्त हस्तों का विवरण मात्र है, संयुक्तहस्तों का
नहीं । इसका कारण यही प्रतीत होता है कि हस्तमुद्राओं में असंयुक्तहस्तों
का ही अधिक महत्त्व है, क्योंकि इन्हीं को मिला कर संयुक्तहस्तों का निर्माण
किया जा सकता है । इससे यह भी संकेतित हो सकता है कि असंयुक्तहस्तों
में संयुक्तहस्तों की मुद्राएँ समाविष्ट हो सकती हैं तथा जो अर्थ दोनों हाथों
को मिला कर दर्शाया जाता है उसे अलग रहने वाले असंयुक्तहस्त से अधिक
भिन्न नहीं किया जा सकता है । उदाहरणार्थ अञ्जलि नामक संयुक्त हस्त
के द्वारा जो नमस्कार करने का अर्थ ( भाव ) दिखलाया जाता है वही दो
पताक हस्तों को मिलाने के सीधे उल्लेख से भी संभव है । इतना होने पर
भी जब प्रयोगदशा में दोनों हाथों का मिलाना ही अभीष्ट हो तो संयुक्त
हस्तमुद्राओं का प्रतिषेध सम्भव भी नहीं है तथा न ही उचित भी । इसी
कारण संयुत हस्तमुद्राओं का स्वरूप तथा उनसे दिखलाये जाने वाले भावों
का विवरण भरतमुनि ने अपने ग्रन्थ में विशेष मनोयोग से दिया भी है क्योंकि
संयुक्तमुद्राओं का नाट्यादि में प्रयोग असंयुक्त मुद्राओं की अपेक्षा भिन्न रूप में
अपेक्षित है ।
मुद्राओं के अतिरिक्त भी हस्त के अनेक कार्य होते हैं जिनका मुनि ने निर्देश
किया । उदाहरणार्थ हाथ से विकर्षण, उत्कर्ष, व्याकर्षण, परिग्रह, निग्रह,
आह्वान, ताडन, छेदन, भेदन, संश्लेष, विश्लेष, रक्षण, मोक्षण, विक्षेप तथा
तर्जन आदि अनेक कार्य सम्पन्न किये जाते हैं जिनका विवरण नाट्यशास्त्र
में विद्यमान है भी तथा जो अपने हस्तरूपों से अभिनव भावों की सृष्टि कर
प्रयोग को उज्ज्वलता देता है । इन हस्तों का स्वरूप मानव की भावसम्पदा के
प्रकाशन में महत्त्व का होकर सदा शास्त्रीय अध्ययन का विषय बन कर अपने
विषय का महत्त्व दिखलाता रहेगा यह निर्विवाद है ।
नृत्तहस्त— भरतमुनि ने इन हस्तों के अतिरिक्त तीस नृत्तहस्तों का
भी विवरण दिया है । हस्ताभिनय के आकर्षक विविध रूपों से शोभा लाने
के लिये जिन हस्त स्थितियों की रचना विभिन्न अवस्थाओं में की जाती
( १० )
है वे 'नृत्तहस्त' हैं। यद्यपि ये हाथों की विभिन्न स्थितियाँ या रचना
मात्र होती हैं किन्तु इनके द्वारा अर्थ या भाव का प्रदर्शन नहीं होता, ये
केवल अङ्गभङ्ग या लावण्य दर्शने के लिये ( ही ) प्रयोग में रखे जाते हैं।
इनकी रचना भी वास्तव में ध्यान से देखें तो वह समुतुलन ( balance ) के
आधार पर की गई प्रतीत होती है। ये नृत्तहस्त हाथ, पैर तथा शरीर के
सामञ्जस्यपूर्ण सन्तुलन के द्वारा अलौकिक आभा के सर्जन से लावण्य को
साधते हैं। इसी कारण नाट्यचार्य इन्हें शोभाधायिता के कारण नाट्य
प्रयोग अलंकरण मानते हैं।
नृत्तहस्तों की भी रचना यद्यपि संयुत तथा असंयुत हस्तों के द्वारा ही होती
है तथा कहीं कभी मिश्र भी; फिर भी ये उन हस्तमुद्राओं से भिन्न ही माने
जाते हैं। अभिनयदर्पण में कुछेक नृत्तहस्तों की वही नामावलि है जो भरत
के नाट्यशास्त्र में है तथा इनकी रचना के विवरण भी प्रायः समान है किन्तु
इनकी योजना तथा संख्या के विवरण भिन्न है। अभिनयदर्पण में नृत्तहस्तों की
संख्या तेरह ही रखी है जब कि नाट्यशास्त्र में नृत्तहस्तों की संख्या तीस हैं।
नाट्यशास्त्र में निर्देशित नृत्तहस्तों का क्रमिक विवरण इस प्रकार है:—
(१) चतुरस्र, (२) उद्वृत्त या तालवृत्त, (३) ततमुख, (४) स्वस्तिक,
(५) विप्रकीर्ण, (६) अरालकटकामुख, (७) आविद्धवक्त्र, (८) सूचीमुख,
(६) रेचित, (१०) अर्धरेचित, (११) उत्तानवञ्चित, (१२) पल्लव,
(१३) नितम्ब, (१४) केशबन्ध, (१५) लता, (१६) करिहस्त,
(१७) पक्षवञ्चित, (१८) पक्षप्रद्योतक, (१६) गरुडपक्ष, (२०) हंसपक्ष,
(२१) ऊर्ध्वमण्डल, (२२) पार्श्वमण्डल, (२३) उरोमंडल, (२४) पार्श्वार्वितं
या पार्श्वार्धमण्डल, (२५) मुष्टिक स्वस्तिक, (२६) नलिनी पद्मकोष,
(२७) अलपल्लव, (२८) उल्बण, (२६) ललित तथा (३०) वलित ।
अभिनय-दर्पण में नृत्तहस्तों की संख्या तेरह ही है। जिनके नाम इस प्रकार
हैं :—(१) स्वस्तिक, (२) दोला, (३) अंजलि, (४) कटकावर्धमानक,
(५) शकट, (६) पाश, (७) कीलक, (८) पाश, (६) शिखर, (१०) कूर्म,
(११) हंसास्य, (१२) अलपल्लव तथा (१३) पताक । इनमें पताक,
त्रिपताक, शिखर, कपित्थ, अलपद्म तथा हंसास्य ये असंयुत हस्तमुद्रायें हैं
तथा अंजलि, स्वस्तिक, दोला, कटकांवर्धमानक आदि शेष संयुतहस्त हैं तथा
ये विशिष्ट या भिन्नरूप में केवल शोभा के लिये बिना भाव प्रदर्शन के रखने
पर 'नृत्तहस्त' हो जाते हैं।
( ११ )
नाट्यशास्त्र में नृत्तहस्तों के जो लक्षण दिये गये हैं उनसे भी नृत्य के
अर्थों की सूचना मात्र दर्शाना ही संभव है। इसी कारण पूर्ण विवरण से
इनकी रचना दिखलाने पर भी इनकी स्थिति का स्थिरीकरण संभव नहीं
है तथा इसी कारण इनका जितना वर्णन शब्दों से संभव था वह किया
गया परन्तु ये हैं हाथों की चलितस्थितियाँ। इसीलिये यह भी हमें दिखलाई
देता है कि पताक जैसे अभिनयहस्तों के योग के साथ अभिनय तथा
नृत्तहस्तों का मिश्रण होगा तथा ऐसे स्थानों पर नाट्य की प्रधान स्थिति
रहने पर ऐसे हस्त को अभिनयहस्त तथा नृत्त की प्रमुखता रहने पर 'नृत्तहस्त'
समझना पड़ेगा । जैसे उदाहरण के लिये नृत्ताभिनय की स्थिति में लताहस्त का
प्रयोग या नृत्य की स्थिति में 'करिहस्त' का प्रयोग करना । इसी प्रकार
चतुरस्र हस्तादि का प्रयोग भी। नाट्यगत विशुद्ध हस्तमुद्राओं के या
नृत्तहस्तों के सम्पादन में करणों का योग तथा उनका प्रयोग नितान्त
वाञ्छनीय है । हस्तकरण के द्वारा हाथ की मुद्राएँ अपना स्वरूप लेती हैं ।
ये करण भी चार प्रकार का होता है :—(१) आवेष्टित, (२) उद्वेष्टित,
(३) व्यावर्तित, तथा (४) परावर्तित । करणों का प्रयोग विशुद्ध नाट्य तथा
नृत्त दोनों ही दशाओं में किया जाता है। इन करणों का प्रयोग भी मुख, नेत्र,
भ्रू तथा मुखराग आदि के अनुगत या साथ रखते हुए किया जाता है जिससे
अपेक्षित भावाभिव्यक्ति हो सके । क्योंकि ये नृत्तहस्त उपाङ्ग के अभिनय के
साथ जब प्रस्तुत होंगे तथा भाव एवं रस के आश्रित होकर संचालित होंगे
तो उससे प्रयोग या नाट्यार्थ की पूर्ति या सफलता होती है ।
नृत्तहस्तों की एक ( मुख्य ) विधि यह है कि इनका संचलन शरीर की
क्रिया तथा पैर को उठाने और रखने के साथ रखा जाता है। अतः यह
संचलन की स्थिति पाँच प्रकार से होती है। ये हैं, ऊपर, नीचे, दाहिने,
बायें तथा सामने की ओर संचलन होना ।
आधुनिक प्रचलित नृत्यों में नृत्तप्रधान शैली में परिगणनीय भरतनाट्य
में नृत्यहस्तों की विविधता देखने में आती है जब कि दक्षिणभारत के
मलावार में लोकप्रिय एवं परम्परागत 'कथकलि' ( नृत्य ) में नृत्तहस्तों
का प्रयोग अल्प रखा जाता है, क्योंकि यह अभिनयप्रधान नृत्य होता है तथा
इसी कारण इसमें अर्थदर्शक हस्तमुद्राओं का ही प्रयोग इष्ट होता है। यदि
प्रयोग के उपयोग को देखते हुए विचार करें तो नृत्तहस्तों में भी पताक,
त्रिपताक, मुद्रा तथा अर्धचन्द्र जैसे नृत्तहस्तों का प्रचुर प्रयोग दृष्टिगत हो
जाता है । कथकली की परम्परा में नृत्तहस्तों को ऐसे भिन्नतायुक्त नामकरण
( १२ )
से नहीं जाना जाता है फिर भी वहाँ मुद्रा ( नाट्यशास्त्र का सन्दंश ) तथा
अर्धचन्द्र जैसे हस्तों की विविध भङ्गिमाओं वाले रूपों में योजना रख कर
प्रयोग को सौष्ठव युक्त रखा जाता है ।
हस्ताङ्गुलियों तथा बाहुओं का सञ्चलन प्रकार
नाट्यशास्त्र में हस्तकरण के प्रसंग में चार प्रकार से हस्तसंचलन
दिखलाया गया है यह हम पूर्व में दिखला आये हैं । यहाँ पर हस्तकरण हस्त
की अंगुलियों की विभिन्न क्रियाओं की स्थितियाँ होती हैं तथा इन्हीं का
विभिन्न नृत्यों में प्रयोग किया जाता है । इनके लक्षण भी नाट्यशास्त्र में
( ९।२१५-२१८ ) दिये गये हैं ।
इसी प्रकार नाट्यशास्त्र में बाहुओं की विविध दशाओं में रहनेवाली
संचलन क्रियाओं ( वाले हस्तों ) का वर्णन है जिन्हें बाहुप्रचार कहा गया है ।
यद्यपि हस्त के भेदों का करणों के अन्तर्गत सञ्चलन दिखलाया गया था किन्तु
बाहुप्रचार भी नाम देकर पृथक् से उन्हें फिर दिखलाया गया है । यहाँ
बाहुओं के संचलन के नाममात्र मिलते हैं उनके लक्षण नहीं परन्तु आचार्य
अभिनवगुप्तपाद ने इनके स्वरूप की थोड़ी व्याख्या दे दी है । तदनुसार इनका
विवरण इस प्रकार है :—
( १ ) तिर्यक् या तिर्यग्गत—दोनों बाजुओं में तिरछे रखे गये हाथ ।
( २ ) ऊर्ध्वसंस्थ—मस्तक पर ऊँचे कर रखे गये या उठाये हुए हाथ ।
( ३ ) अधोमुख—नीचे रखा गया या पृथिवी को छूने वाला हाथ ।
( ४ ) अञ्चित—हाथ को वक्षःस्थल के पास से मस्तक तक ले जाकर
पुनः उसी प्रकार अपने मूल स्थान पर वापस लाना ।
( ४ ) अपविद्ध—हाथ को वक्षःस्थल के पास से घुमाते हुए चक्राकार
गति में सभी ओर बढ़ाते हुए आगे ले जाना ।
( ६ ) मण्डलगति—हाथ को शरीर के चारो ओर फिराना या
घुमाव देना ।
( ७ ) स्वस्तिक—बायें हाथ से दाहिने हाथ की और दाहिने हाथ से
बाँये हाथ की भुजा को पकड़ना या छूना ।
( ८ ) पृष्ठानुसारी—पीछे रखा या ले जाया गया हाथ ।
( ९ ) उद्वेष्टित—हाथ को कलाई का सहारा लेकर निकालते या
फैलाते हुए दोनों को छूते हुए रखना और फिर एक को दूसरे का अनुगत
करना ।
( १३ )
( १०) प्रसारित—हाथ को आगे की ओर लम्बा करते हुए फैलाना ।
आचार्य अभिनवगुप्तपाद ने इन बाहुप्रकारों की संचलनक्रियागत योजना
को द्रुत, मध्य या विलम्बित गति में रख कर विचित्रता उत्पन्न करने का
भी निर्देश दिया । इनके मत में इसके अतिरिक्त अन्य हस्त प्रचारों की
आवश्यकता नहीं है जो अन्य आचार्यों ने दिखलाये हैं। क्योंकि ऐसे अतिरिक्त
प्रकारों का अन्तर्भाव इन्हीं दस प्रभेदों में सरलता से किया जा सकता है।
परन्तु नाट्यशास्त्रसंग्रह तथा सङ्गीतरत्नाकर ग्रन्थों में बाहुओं के सोलह
प्रभेद दिये गये हैं। इनमें नाट्यशास्त्र के उपर्युक्त दस प्रभेदों के अतिरिक्त छः
अन्य प्रभेद भी मिलते हैं। इनके नाम तथा स्वरूप इस प्रकार हैं :—( १ )
आविद्ध, ( २ ) कुञ्चित, ( ३ ) नम्र, ( ४ ) सरल, ( ५ ) आन्दोलित तथा
( ६ ) उत्सारित ।
इनके क्रमशः लक्षण इस प्रकार हैं:—
( १ ) आविद्ध—बाहर से अपनी ओर खींचा गया हाथ ।
( २ ) कुञ्चित—कोहनी को सिकुड़ा कर हाथ को मोड़ना ।
( ३ ) नम्र—सहज भाव से थोड़ा तिरछा रखा या झुकाया हुआ हाथ ।
( ४ ) सरल—दोनों बाजुओं की ओर सौष्ठवपूर्ण रीति में सरलता से
या सीधा रखा हुआ हाथ ।
( ५ ) आन्दोलित—हाथों को झूलते हुए रखना ।
( ६ ) उत्सारण—विरुद्ध दिशा में रखे हुए हाथ को अपनी बाजू से
दूसरी ओर चलता हुआ रखना ।
अङ्गों के अन्य अभिनय—नाट्यशास्त्र के दशम-अध्याय में अभिनय-
विधि के प्रसंग में हृदय, उदर, पार्श्व, कटि, ऊरु, जङ्घा तथा पाद के द्वारा
होने वाले अभिनय का विवेचन है। इनमें हृदय या वक्षःस्थल की पांच
अवस्थाएँ या प्रकार होते हैं। ये हैं :—आभुग्न, निर्भुग्न, प्रकम्पित, उद्वाहित
तथा सम । इनके स्वरूप तथा अभिनययोजना का विशद विवरण है।
उदर के तीन रूप या प्रभेद होते हैं । ये हैं—क्षाम, खल्व तथा पूर्ण । दुबला
या पिचका हुआ उदर 'क्षाम', फूला हुआ 'पूर्ण' तथा अतिशय झुका हुआ या
गड्ढे वाला नत उदर 'खल्व' कहलाता है। इनमें हास्य, रुदन आदि में 'क्षाम'
की, व्याधि, तपस्या आदि में 'खल्व' की तथा तन्द्रा, स्थूलता या अतिभोजन
की स्थिति में 'पूर्ण' की योजना की जाती है। पार्श्व के ( बाजू ) भी
नत, समुन्नत, प्रसारित, विवर्तित तथा प्रसृत नामक पाँच प्रभेद होते हैं।
जिनसे क्रमशः प्रसर्पण, अपसर्पण, आनन्द प्राप्ति, चक्राकार भ्रमण तथा सीधे
पीछे हटने के भावों का अभिनय किया जाता है ।
इसी प्रकार कटिके भी पाँच प्रभेद होते हैं । यथा—( १ ) छिन्ना,
( २ ) निवृत्ता, ( ३ ) रेचिता, ( ४ ) कम्पिता तथा ( ५ ) उद्वाहिता ।
इनका स्वरूप तथा योजना को यथास्थान दिखलाया गया है । ऊरु, जंघा
तथा पाद के भी कर्म या क्रिया के कारण पाँच-पाँच प्रभेद हो जाते हैं। इनमें
ऊरु के पाँच कर्म हैं—( १ ) कंपन, ( २ ) वलन, ( ३ ) स्तम्भन, ( ४ )
उद्वर्तन, ( ५ ) निवर्तन । इनकी विभिन्न स्वभाव एवं स्थितियों में योजना
रखी जाती है । इसी प्रकार जङ्घा के भी पाँच कर्म माने जाते हैं—( १ )
आवर्तित, ( २ ) नत, ( ३ ) क्षिप्त, ( ४ ) उद्वाहित तथा ( ५ ) परिवृत्त ।
इनकी योजना भी पात्रों के स्वभाव, स्थिति, गति तथा नृत्य आदि में की
जाती है । इसी प्रकार पाद के भी पाँच प्रभेद माने गये हैं। यथा—( १ )
उद्घट्टित, ( २ ) सम, ( ३ ) अग्रतलसञ्चर ( ४ ) अञ्चित तथा ( ५ )
कुञ्चित । इनके स्वरूप तथा योजना का विवरण भरत मुनि ने विस्तार से
दिया है। इसके अतिरिक्त प्राप्य अन्य पाठ को भी लिया जाए तो पाद के
'त्र्यस्र' तथा 'सूची' नामक और दो प्रभेद होते हैं जिनका लक्षण तथा योजना
भी मिलती हैं ।
ये पाद, जंघा तथा ऊरु के कार्य या व्यापार परस्पर सम्बद्ध होते हैं तथा
भाव एवं रस की स्थिति के अनुसार इनको एक साथ रखते हुए संचालित
किया जाता है और इनके समन्वित कार्य या व्यापार से अभिनय प्रयोग
पूर्ण तथा प्रभावकारी बन जाता है । इनमें भी सर्वाधिक महत्त्व पाद का
माना गया है । क्योंकि उसी के आधार या आश्रय पर ऊरु तथा जंघा के
कार्य निर्भर करते हैं तथा इन्हीं तीनों के कार्यों के समीकरण या एकीभाव
से 'चारी' का निर्माण होता है। इसी कारण 'पैरों' का नृत्य तथा अभिनय
दोनों के ही लिये समान महत्त्व है ।
चारीविधान—नाट्यशास्त्र का एकादशअध्याय 'चारीविधान' है ।
हम बतला आये हैं कि कटि, पार्श्व, ऊरू- ( तथा ) जंघा और पाद के द्वारा
होने वाले कार्य या व्यापार का एक साथ होना 'चारी' है, जिनमें चेष्टाएँ
व्याप्त रहती हैं । इनका अभिनय में बड़ा महत्त्व माना गया है, क्योंकि चारी
के द्वारा ही नृत्त तथा अङ्गहारों की रचना तथा शस्त्रों का चलाना भी सम्पन्न
होता है । नाट्य में चारी की स्थिति को बतलाते हुए भरतमुनि ने बतलाया
कि बिना चारी के मस्तक, हस्त आदि अंगों का संचालन नहीं हो सकता
( १५ )
अतः आङ्गिक अभिनय की आधारभूत रहने से चारी का अभिनय के क्षेत्र
में असाधारण महत्त्व माना गया है। इसके अतिरिक्त नृत्य के कारण, खण्ड
तथा मण्डल का भी चारी ही आधार होती है, जिसकी विशेषरूप से 'नृत्त' में
संयोजना की जाती है तथा युद्ध एवं शस्त्रप्रहार के अभिनय प्रसंगों में प्रयोग
रखे जाते हैं।
एक पाद के प्रचार या आगे बढ़ने के व्यापार से चारी की, दो बार पाद
प्रचार के द्वारा 'करण' की तथा करणों के एकीभाव या समयोग से 'खण्ड'
की तथा दो या तीन खण्डों के योग से 'मण्डल' का निर्माण होता है। चारी के
अभिनयव्यापार को सर्व प्रथम दो भागों में विभक्त किया जाता है। एक
भौमी तथा दूसरी आकाशीकी चारी। इनमें प्रत्येक चारी के सोलह-सोलह
भेद रखे गये हैं जो कुल भेद बत्तीस हो जाते हैं। अभिनयदर्पण में चारी के
आठ प्रभेद ही दिखलाये गए तथा यहाँ भौमी एवं आकाशीकी के रूप में उनका
विभाग भी नहीं मिलता। 'संगीतरत्नाकर' में देशी चारी के अतिरिक्त प्रभेद
भी दिखलाये गये हैं जो कोहल आदि नृत्याचार्यों ने अपने ग्रन्थों में दिये थे।
तदनुसार ३५ भौमी चारियाँ तथा २७ आकाशीकी चारियाँ मानी गयी हैं।
कोहल ने ३५ मधुप्राचारी को भी बतलाया या जिनका विवरण 'संगीत-
रत्नाकर' की चतुरकल्लिनाथ की व्याख्या में मिलता है। आचार्य कोहल ने
नृत्याचार्य की अपेक्षा से चारी में संवर्द्धन या संशोधन को भी सहमति दी हुई
थी। इस प्रकार चारी के भेदों के विषय में प्राचीन तथा उत्तरवर्ती आचार्यों में
पर्याप्त मतभेद है जो इसके प्रयोग के महत्त्व को दर्शाता है। चारी को वर्तमान
कलाविद् 'चाल' शब्द से (भी) दिखलाते हैं। इन चारियों के मेल या समूह
से 'मण्डल' का निर्माण होता है। ये भी अपनी आधारभूत चारियों के भेद के
कारण आरम्भ में भौम तथा आकाशिक भेद से दो प्रकार के हो जाते हैं।
इन मण्डलों के भी भौम प्रभेद दस तथा आकाशिक प्रभेद दस होकर कुल
संख्या बीस हो जाती है।
भौमी चारी—मूलतः एवं मुख्य रूप से चारियों का प्रयोग भूमि पर
होने के कारण अपनी संज्ञा के अनुरूप ही इनका 'भौमी' अन्वर्थ नामकरण
है। इनके सोलह प्रभेद हैं। जो इस प्रकार हैं—(१) समपादा, (२)
स्थितावर्ता, (३) शकटास्या, (४) अध्यर्धिका, (५) चाषगति, (६)
विच्युता, (७) एलकाक्रीडिता, (८) बद्धा, (६) ऊरुद्वृत्ता, (१०)
अड्ढिता, (११) उत्स्पन्दिता, (उत्स्यन्दिता) (१२) जनिता, (१३)
स्पन्दिता, ( १४ ) अपस्पन्दिता, ( १५ ) समोत्सारित मत्तल्ली तथा ( १६ )
मत्तल्ली । इनके लक्षण तथा योजनादि विवरण नाट्यशास्त्र में विद्यमान है ।
आकाशीकी चारी—आकाशीकी चारी के अन्तर्गत आकाश की ओर
अर्थात् ऊपर होने वाले पाद प्रयोग या अभिनय व्यापारों का समावेश रहता
है तथा इसी कारण इसका भी अन्वर्थ नामकरण है। इनके पारस्परिक अन्तर
की स्थिति बतलाते हुए भरतमुनि ने एक प्रयोगगत विशिष्ट तथ्य भी
संकेतित किया कि भौमीचारी का प्रयोग मुख्यरूप से करणाश्रित नृत्य तथा
द्वन्द्वयुद्ध में होता है तथा प्रासंगिक रूप में 'नाट्य' में रखा जाता है जब कि
आकाशीकी चारी का प्रयोग ललित अंग से युक्त क्रियाओं के प्रसंग में तथा
धनुष, वज्र, असि आदि शस्त्रों के चलाने के ( युद्धगत ) व्यापार में किया
जाता है। आकाशीकी चारी के भी सोलह प्रभेद होते हैं। ये हैं—
( १ ) अतिक्रान्ता, ( २ ) अपक्रान्ता, ( ३ ) पार्श्वक्रान्ता, ( ४ ) ऊर्ध्वजानु
( ५ ) सूची, ( ६ ) नूपुरपादिका, ( ७ ) दोलपादा, ( ८ ) आक्षिप्ता,
( ६ ) आविद्धा, ( १० ) उद्वृत्ता, ( ११ ) विद्युद्भ्रान्ता, ( १२ ) अलाता
( १३ ) भुजङ्गत्रासिता, ( १४ ) हरिणीप्लुता, ( १५ ) दण्डा ( दण्डपादा )
तथा ( १६ ) भ्रमरी। इनके लक्षण तथा प्रयोगादि योजना का विवरण
नाट्यशास्त्र में है।
इस प्रकार यद्यपि नाट्यशास्त्र ( आदि ग्रन्थों ) में इन चारियों के लक्षण
तथा योजना की रीति निदर्शित की गयी किन्तु यह सभी शास्त्रीयपदावलि
तथा सांकेतिक पद्धति में रखी जाने के कारण केवल नाट्यशास्त्र के अध्येता
या अभ्यासकों के द्वारा ही वेद्य होती हैं। भारत की विभिन्न नृत्य या नाट्य
प्रणालियों में अभी भी इन चारियों में से अधिकांश का प्रयोग चल रहा है
यह ठीक है किन्तु इतने से भी इसकी व्यवस्थित स्थिति का स्पष्ट परिभान
नहीं होता। इसे यदि सरल शब्दों में संक्षेप में समझना चाहें तो यही कि
पाद की गति को तीन प्रकारों में बाँटा गया है। इनमें प्रथम को गति,
द्वितीय को चारी तथा तृतीय को 'मॅडल' कह सकते हैं ।
इन चारियों के प्रदर्शन के अवसर पर नाट्य या नृत्य प्रयोग के प्रसंग में
हस्त एवं पाद प्रचार का पारस्परिक अनुगत सम्बन्ध या क्रियाक्रम रखा
जाता है। नाट्य, नृत्य ( तथा नृत्त के ) प्रयोग में कभी हस्तप्रचार की
कभी पादप्रचार की तथा कभी दोनों की समान रूप में प्रमुखता होती है।
अतएव हस्तप्रचार की प्रधानता में पादप्रचार ( उसी का ) अनुगत रहता
१. अध्याय २८-३०: गान्धर्व विधि, जात्यंश, वाद्य-विधान (तत, अवनद्ध, सुषिर व घन वाद्य)
( १७ )
है तथा पादप्रचार की प्रमुखता में हस्तप्रचार भी उसी प्रकार अनुगत हो
जाता है । यदि दोनों की प्रमुखता रखना हो तो फिर दोनों का प्रत्येक का
एककालिक विनियोजन हो जाता है । इस प्रसंग में भरतमुनि का यह सिद्धान्त
बड़ा ही न्यायसम्मत तथा ध्यान देने योग्य है जो नाट्यप्रयोग के सुदीर्घ
अनुभव को दिखलाते हुए इस सम्बन्ध में दिखलाया गया है ।
स्थान—विविध अभिनय प्रदर्शन के अवसर पर चारी तथा हस्तादि के
प्रदर्शन को करते समय शरीर को एक विशिष्ट एवं नियतस्थिति में रखना
अपेक्षित होता है । इस स्थिति को 'स्थान' कहा जाता है जिसे आचार्य
अभिनवगुप्तपाद ने कायसन्निवेश या शरीर की विशिष्ट स्थिति कहा है ।
स्थान के विषय में नाट्य-नृत्य के आचार्यों में मतैक्य नहीं है । नाट्यशास्त्र के
अनुसार इनकी संख्या छः मानी गयी है । यथा—( १ ) वैष्णव,
( २ ) समपाद, ( ३ ) वैशाख, ( ४ ) मण्डल, ( ५ ) आलीढ़ तथा
( ६ ) प्रत्यालीढ़ । इन स्थानों के अधिष्ठाता देवता तथा इनकी योजना आदि
का शास्त्र में विवरण दिया गया है जिसका संक्षेप इस प्रकार है :—
वैष्णवस्थान—इसके अधिष्ठाता देव श्रीविष्णु हैं । इसमें दोनों पैर
अढ़ाई ताल के अन्तर से, एक पैर खड़ा हुआ और दूसरा टेढ़ा, जंघा ऊँची
तथा झुकी हुई और अंग सौष्ठव-सम्पन्न रखा जाता है ।
समपाद-स्थान :—इसके अधिष्ठाता देव श्री ब्रह्मा हैं । इसमें दोनों पैर
का अन्तर एक ताल का और दोनों ( ही ) पैर सहज सौष्ठव से युक्त
होते हैं ।
वैशाख-स्थान—इसके अधिष्ठाता देव श्री स्कन्द ( कार्तिकेय ) है ।
इसमें दोनों पैर तीन ताल के अन्तर से तिरछे, स्तब्ध तथा एक दूसरे के
सम्मुख बाजू को बतलाते हुए ।
मण्डल-स्थान—इसके अधिष्ठाता देव श्रीइन्द्र हैं । इसमें दोनों पैरों
का अन्तर चार ताल, दोनों एक दूसरे के सम्मुख तिरछे तथा घुटने और कटि
सहज भाव में रखकर खड़े होना ।
आलीढ़ तथा प्रत्यालीढ़-स्थान—इन दोनों स्थानों के अधिष्ठातृ देव
श्रीरुद्र हैं । इसमें मण्डल स्थान की स्थिति में दाहिना पैर पाँच ताल के अन्तर
पर आगे रखने पर 'आलीढ़' तथा इसके विपरीत बायाँ पैर इसी प्रकार
आगे रखना या दाहिना पैर सिकोड़ कर वायाँ पैर आगे रखने पर
प्रत्यालीढ़ 'स्थान' ।
नाट्यशास्त्र में इन स्थानों के स्वरूप तथा उनकी अभिनय योजना दी
२ ना० भू० द्वि०
( १८ )
गयी है। इन स्थानों के अतिरिक्त अन्य शास्त्रीय ग्रन्थों में भी स्थानकों का वर्णन
मिलता है। इनमें सङ्गीतरत्नाकर में आसन तथा स्थान का विवरण अधिक
स्पष्ट तथा व्यवस्थित रूप में मिलता है। ये स्थान इस प्रकार हैं :—
( १ ) स्वस्तिक, ( २ ) वर्धमान, ( ३ ) नन्द्यावर्त, ( ४ ) संहत,
( ५ ) समपाद, ( ६ ) एकपाद, ( ७ ) पृष्ठोत्तानतल, ( ८ ) चतुरस्र,
( ६ ) पाष्णिविद्ध, ( १० ) पाष्णिपार्श्वगत, ( ११ ) एकपार्श्वगत,
( १२ ) एकजानुगत, ( १३ ) परावृत्त, ( १४ ) समसूची, ( १५ ) विषम-
सूची, ( १६ ) खण्डसूची, ( १७ ) ब्राह्म, ( १८ ) वैष्णव, ( १६ ) शैव,
( २० ) गरुड, ( २१ ) कूर्मासन, ( २२ ) नागबन्ध तथा ( २३ ) वृष-
भासन। इनमें समसूची, विषमसूची, खण्डसूची, गरुड, कूर्मासन, नागबन्ध
तथा वृषभासन ये सभी आसन ( स्थान ) है तथा शेष स्थान है। नृत्याचार्यों
के मत में ( इन्हीं में से ) पाष्णिविद्ध, पाष्णिपार्श्वगत तथा एकपार्श्वगत
जैसे स्थानों के स्पष्ट लक्षण ज्ञात नहीं हैं ।
अशोकमल्ल आदि उत्तरवर्ती नृत्य नाट्य के आचार्यों के मत के अनुसार
वैष्णव, समपाद आदि छः पुरुष स्थानक कहलाते हैं, जिनका नाट्यशास्त्र में
विवरण दिया गया है। इसके अतिरिक्त आठ स्त्री स्थानक भी होते हैं। इनके
नाम है :— आयत, अवहित्थ, अश्वक्रान्त, गतागत, वलित, मोटित, विनिवर्तित,
तथा प्रोन्नत । इसके अतिरिक्त पूर्वकथित तेईस देशी स्थानक भी होते हैं तथा
छः शयन या सुप्त-स्थानक होते हैं। यथा—सम, नत, आकुञ्चित, विवर्तित तथा
उद्वाहित । सङ्गीतरत्नाकर में भी छ पुरुष स्थानक तथा उपर्युक्त आठ स्त्री
स्थानक के अतिरिक्त ये ही छः सुप्त स्थानक बतलाये गये हैं तथा साथ ही नौ
उपविष्ट स्थान भी बतलाये गये हैं। ये नौ उपविष्ट स्थान इस प्रकार हैं,
( १ ) स्वस्थ, ( २ ) मदालस, ( ३ ) क्रान्त, ( ४ ) विष्कम्भित, ( ५ ) उत्कट,
( ६ ) स्रस्तालस, ( ७ ) जानुगत, ( ८ ) मुक्तजानु तथा ( ६ ) विमुक्त। विस्तार
भय से इनके लक्षणादि विवरण को यहाँ नहीं दे रहे हैं।
न्याय—अभिनय में शस्त्रमोक्षण की चार विधियाँ प्रयुक्त की जाती हैं
जिनकी शास्त्रीय संज्ञा 'न्याय' कहलाती है। क्योंकि इन्ही न्याय के आश्रित
अङ्गहार तथा 'न्याय' से ही उपस्थित युद्ध को रंगमञ्च पर लाते हैं। ये न्याय
चार हैं :— ( १ ) भारत, ( २ ) सात्वत, ( ३ ) वार्षगण्य तथा
( ४ ) कैशिक । भारत के अनुसार कटि प्रदेश पर, सात्वत के अनुसार पैर
पर, वार्षगण्य के अनुसार वक्षःस्थल पर तथा कैशिक के अनुसार मस्तक से
शस्त्र प्रहार का विधान होता है ।
आसनस्थान क्रमशः
( ना० शा० पृष्ठ १८ प्रस्तावना )
१. गारुडम् आसन
२. विषमसूची आसन
३. वृषभ आसनं
४. कूर्म आसन
आसन स्थान
५. नागबन्ध आसन
( ना० शा० पृष्ठ १८ प्रस्तावना )
(७) स्वस्तिक स्थान (८) वर्धमानक स्थान (९) नद्यावर्त्त स्थान
(१०) संहत स्थान (११) परावृत्त स्थान (१२) ब्राह्म स्थान
( १६ )
भारतन्याय के अनुसार पात्र प्रवेश करते हुए बायें हाथ में खेटक तथा
दाहिने हाथ में शस्त्र लेकर रंगमञ्च पर परिक्रमा करता है। इसी प्रकार अन्य
न्यायों में भी थोड़े परिवर्तन के साथ शस्त्रों को लेकर ( नाट्य-प्रदर्शन में )
परिक्रमा की जाती है। भरतमुनि ने शस्त्रमोक्षण के इन अभिनयों ( के
सम्बन्ध ) में प्रयुक्त ( इन ) न्यायों के विषय में कुछ निषेध भी बतलाये हैं।
तदनुसार धनुष या वज्रादि के प्रहार या प्रयोग की स्थिति में वह संकेतमात्र
से छोड़ा जाए न कि उससे वास्तविक रक्तस्राव कराने वाला प्रहार हो
परन्तु यदि ऐसा आवश्यक ही हो तो फिर आहार्यविधि के अभिनय-विधान
का आवश्यकता के अनुसार अनुगमन किया जाए।
सौष्ठव—इस प्रकार जो नाट्य प्रयोग में चारी की योजना का
विधिवत् विधान दिखलाया गया परन्तु चारी के प्रयोग में 'अङ्ग सौष्ठव'
आवश्यक होता है, क्योंकि अङ्गसौष्ठव से ही नाट्य या नृत्य में शोभा का
संचार ( सम्भव ) होता है। जब कटि, कर्ण, स्कन्ध तथा मस्तक सम स्थिति
में और वक्षःस्थल उन्नत या उठा हुआ रखते हुए शरीर को व्यवस्थित करते
हैं तो यही 'सौष्ठव' कहलाता है। इसमें शरीर को लक्षणानुसारी क्रम में रखा
जाता है क्योंकि अङ्ग-सौष्ठव ही पात्रों के अभिनय को प्रभाव एवं समृद्धिशाली
बनाते हैं।
इस प्रकार स्पष्ट है कि नाट्यप्रयोग में चारी विधान का अतिशय
महत्व होता है, जिसके मूल में भरतमुनि की शास्त्रीय दृष्टि तो है ही साथ
में लौकिकता की धारा भी संयुक्त होकर चल रही है। इनमें सर्वत्र ही—
चाहे हस्तसञ्चार हो या शस्त्रप्रक्षेप या पाद ( प्रक्षेप या ) प्रचार एक
अनुगतता अवश्य विद्यमान रहती है। इसके अतिरिक्त रङ्गमञ्च पर किये गये
छेदन आदि के निषेध, अङ्गों के सौष्ठव पूर्ण विधान तथा व्यायामकर्म आदि
सभी नाट्यविधानों की प्रयोग में महत्त्वपूर्ण शृङ्खला रहती है जो भरतमुनि
की प्रयोगगत सूक्ष्म एवं व्यावहारिक दृष्टि की अभिव्यक्ति करती है।
मण्डलप्रचार—नाट्यशास्त्र का द्वादश-अध्याय 'मण्डलविधान' नामक
अध्याय है। यह बतलाया जा चुका है कि चारी द्वारा आङ्गिक अभिनय
सम्पन्न किया जाता है जो करण, खण्ड तथा मण्डल का आधार होता है।
इनमें एकपाद के प्रचार से 'चारी' दोनों पादों के प्रचार के द्वारा 'करण'
तथा करणों के योग मेल से 'खण्ड' तथा खण्डों के योग सें 'मण्डल' का निर्माण
होता है। चारियों के समूह से यह मण्डल निर्मित होता है। चारियों के
समान मण्डल को भी भौमिक तथा आकाशित वर्ग में विभाजित किया गया
( २० )
है। इनमें भौमिक तथा आकाशिक मण्डल के दस दस प्रभेद किये गये हैं
जो सब मिल कर मण्डलों के बीस प्रभेद बनाते हैं। इनका नामादि विवरण
इस प्रकार है—
भौमिकमण्डल— ( १ ) भ्रमर, ( २ ) आस्कन्दित, ( ३ ) आवर्त,
( ४ ) समोत्सारित, ( ५ ) एलकाक्रीडित, ( ६ ) अड्डित, ( ७ ) शकटास्य,
( ८ ) अध्यर्धक, ( ६ ) पिष्टकुट्ट तथा ( १० ) चाषगत ।
आकाशिक मण्डल— ( १ ) अतिक्रान्त, ( २ ) विचित्र, ( ३ ) ललित-
सञ्चर, ( ४ ) सूचीविद्ध, ( ५ ) दण्डपाद, ( ६ ) विहृत, ( ७ ) अलातक,
( ८ ) वामविद्ध, ( ६ ) ललित तथा ( १० ) क्रान्त ।
नाट्यशास्त्र में इनके स्वरूपादि का विवरण है। इन मण्डलों का युद्ध,
सञ्चरण तथा बाहुयुद्ध आदि में लीलापूर्ण अङ्ग सञ्चालन के साथ वाद्यों के
वादन के अनुगत प्रदर्शन रंगमञ्च पर प्रस्तुत किया जाता है ।
गतिप्रचार—नाट्यशास्त्र का तेरहवाँ अध्याय 'गतिप्रचार' अध्याय
है। आङ्गिक अभिनय के क्रम में पात्रों द्वारा प्रयोज्य विभिन्न अवस्था, भाव,
स्थान, आसन आदि के समय उनकी जो चाल या गति होती है वह भी
विभिन्नता लिये हुए रहती है तथा इसी विभिन्नता सम्पन्न गति से इन
पात्रों के स्थान, भाव, प्रचार आदि का विधान निश्चय किया जाता
है। यही विधान 'गति प्रचार' कहलाता है जिसमें पात्रों की अवस्था, काल,
स्थान आदि विविध सन्दर्भों में स्वरूपानुसार उनकी चाल या गति को
दिखलाया जाता है। इसका कारण यह है कि नाट्य प्रयोग में विविध पात्रों
की चाल उनकी प्रकृति तथा कार्य के अनुरूप बदलती हुई रखना आवश्यक
होता है तथा पात्र की अपनी चाल में भी कभी-कभी समय, अवस्था या
कारणवश ( संयोगवश भी ) भिन्नता आ जाती है। जिसका प्रभाव शरीर के
अङ्ग तथा उपाङ्गों पर ( विभिन्न रूप में ) पड़ता है तथा इनसे उनके पाद-
प्रचार या गति प्रभावित ( या परिचालित ) रहती है। अतएव गतिविधान
नाट्यप्रयोग की सिद्धि में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। इसके अन्तर्गत पात्र
जब रङ्गमञ्च पर प्रवेश करे तभी से लेकर उसके निष्क्रमण तक की
प्रत्येक गति का विधान विभिन्न भूमिकाओं के प्रस्तुतीकरण की स्थिति में
अपना अतिशय ( महत्व एवं ) मूल्य रखती है ।
पात्रप्रवेश—नाट्यप्रयोग के आरम्भ में रङ्गमञ्च पर पात्र का प्रवेश
होता है। यह प्रवेश इस प्रकार होना चाहिए कि उससे प्रतिपाद्य
( २१ )
या साध्य रस के उदय का आरम्भ सामाजिकों में होने लगे। इसलिये ऐसे
समय भाण्डवाद्य के वादन के साथ-साथ मार्ग एवं रस से युक्त ध्रुवागान को
(पात्र प्रवेश-काल में) रखा जाता है। आचार्य अभिनवगुप्तपाद¹ ने कोहल
आचार्य का इस सन्दर्भ में मत दिखलाते हुए बतलाया कि प्रवेशकाल के समय
नाट्यप्रयोग के अनुसार ध्रुवा या शुष्काक्षर गान करवाया जाए तथा पात्र को
उचित स्थान, दृष्टि, मुखराग आदि से संयुक्त रखते हुए रखा जाए, जिससे
सामाजिकों के अन्तःकरण में शीघ्र प्रतिपाद्य (मुख्य) रस के उदय का
आरम्भ होने लगे। इसमें उत्तम तथा मध्यम पात्रों का प्रवेश वैष्णवस्थान
द्वारा किया जाता है। उस समय उनका वक्षः, बाहु तथा मस्तक सम, उन्नत
तथा एक समान रखा जाता है, ग्रीवा मयूर सी उन्नत, सुन्दर तथा प्रसन्न,
दाहिना तथा बायाँ हाथ क्रमशः नाभि तथा कटि के पास अवस्थित रखते
हुए भूमिकानुसार उन्हें अन्तर (तथा समय) लेते हुए अपने डगों को रखना
चाहिए। इस प्रकार रङ्गमञ्च पर प्रविष्ट पात्र के चरण अपनी प्रकृति और
मानसी दशा के अनुरूप निश्चित दूरी पर समय के अनुसार रखे जाएँगे।
इसका कारण पात्रों की अपनी प्रकृति रहती हैं। उत्तमपात्रों की प्रकृति
गम्भीर होती है तथा अधम की चंचल या असंयत।
देवता तथा राजा जैसे उत्तमपात्रों के पादक्षेप का अन्तर चार ताल,
मध्यमपात्रों का दो ताल तथा स्त्री एवं नीच पात्रों का अन्तर एक ताल की
दूरी पर होता है। इसी प्रकार इनका समय भी दिखलाया गया है। यथा—
उत्तम पात्र के पाद क्षेप में चार कला, मध्यम में दो कला तथा अधम में
एक कला का समय लगना चाहिए। इसके अतिरिक्त इसे लय के अनुगत
भी रखा जाता हैं अतः उत्तमपात्रों का गति क्रम स्थित या विलम्बित लय
में, मध्यमपात्र का मध्यम लय में तथा अधम पात्रों का द्रुत लय में रखा
जाता है।
इस विवरण से स्पष्ट परिलक्षित होता है कि जब गति का निर्धारण
ताल, लय तथा समय का आश्रय लेकर नियमानुसार रखा जाता है तो उसे
सत्व या मनोदशा के सन्दर्भ में भी रहना चाहिए। क्योंकि मनःस्थिति जब
असाधारण हो तो पात्रों की उपर्युक्त गति में प्रकृतिभेद से उसे रखा जाएगा
क्योंकि सत्व प्रकृति की अपेक्षा से आवश्यक रहता है। चरणों के अन्तर में
रखे गये काल, लय और गति के क्रम में प्रकृति की अपेक्षा से चित्तवृत्तियों की
१. द्रष्ट० अभि० भार० vol II पृ० १३७.