नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 17, कुल 668 में से
संदर्भ में पढ़ेंशेष सभी हस्तमुद्राओं के नाम नाट्यशास्त्र के अनुसार ही है । इनमें सोलह
मुद्राओं का स्वरूप भी नाट्यशास्त्र के अनुसार ही है । किन्तु नाट्यशास्त्र गत
नाम रहने पर भी स्वरूप भिन्न है । इनके नाम हैं :— कर्तरीमुख, कटकामुख,
सूचीमुख, मृगशीर्ष, हंसास्य, संदंश तथा ताम्रचूड । ये हस्तमुद्राएँ
हस्ताङ्गुलियों की विविध रचनाओं के द्वारा निर्मित की जाती हैं। इनके
स्वरूप तथा योजना का विवरण नाट्यशास्त्र में विस्तार से मिलता है ।
असंयुतहस्त की सारी क्रियायें एक हाथ से सम्पन्न होती हैं तथा ये ही
संयुतहस्त तथा नृत्तहस्तों के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करते हैं ।
संयुतहस्तमुद्राएँ—दोनों हाथों के परस्पर संश्लेष या योग से निर्मित
हस्तमुद्रा को 'संयुतहस्त' कहते हैं । जैसे असंयुतहस्तमुद्रा को वर्णमाला
का एक अक्षर माना जाता है तो संयुतहस्त को संयुक्ताक्षर समझा जाता है ।
नाट्यशास्त्र में संयुतहस्त के तेरह भेद कहे गये हैं। ये हैं :—( १ ) अञ्जलि,
( २ ) कपोत, ( ३ ) कर्कट, ( ४ ) स्वस्तिक, ( ५ ) कटकावर्धमान,
( ६ ) उत्सङ्ग, ( ७ ) निषध, ( ८ ) दोला, ( ६ ) पुष्पपुट, ( १० ) मकर,
( ११ ) गजदन्त, ( १२ ) अवहित्थ तथा ( १४ ) वर्धमान ।
अभिनयदर्पण में संयुतहस्तों की संख्या तेईस मिलती है, जिनमें नाट्य-
शास्त्र के अञ्जलि, कपोत, कर्कट, स्वस्तिक, कटकावर्धमान, उत्सङ्ग दोला
तथा पुष्पपुट के अतिरिक्त शिवलिङ्ग, कर्तरीस्वस्तिक, शकट, शङ्ख, चक्र,
सम्पुट, पाश, कीलक, मत्स्य, कूर्म, वराह, गरुड़, नागबन्ध, खट्वा तथा
भेरुण्ड हैं । नाट्यशास्त्र का मकरहस्त अभिनयदर्पण में मत्स्य है। इस प्रसंग में
आचार्य अभिनवगुप्त¹ ने भी बतलाया कि भरतमुनि के द्वारा निर्दिष्ट हस्तमुद्राओं
के अतिरिक्त भी हस्तमुद्राओं की परिकल्पना की जा सकती है तथा इसी
कारण कोहल आदि अन्य नाट्याचार्यों ( नन्दिकेश्वर ) ने भी हस्तमुद्राओं के
इनके अतिरिक्त अन्यप्रभेद भी दिखलाये हैं । इन मुद्राओं के द्वारा जिन-जिन
अर्थों को संकेतित किया गया उनके अतिरिक्त भावों के अभिनय भी प्रस्तुत
किये जा सकते हैं, यदि वे लोकप्रचलित स्थिति या भावगम्यता को लिये हों
तो । उदाहरणार्थ एक ही केशाकर्षण के व्यापार का अभिनय पात्रों के द्वारा
विभिन्न हस्तमुद्राओं के द्वारा हो सकता है । जैसे विदूषक द्वारा केशाकर्षण
'कटकामुख' हस्तों से तथा ( नायक द्वारा ) प्रिया का केशाकर्षण अरालहस्त'
से तथा रतिक्रीड़ा का केशाकर्षण 'मुष्टि' हस्त के द्वारा किया जाता है । इसी
१. द्रष्ट ना० शा० अभिनवभारती खण्ड-२ GOS पृष्ठ ५७ ।