नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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गयी है। इन स्थानों के अतिरिक्त अन्य शास्त्रीय ग्रन्थों में भी स्थानकों का वर्णन
मिलता है। इनमें सङ्गीतरत्नाकर में आसन तथा स्थान का विवरण अधिक
स्पष्ट तथा व्यवस्थित रूप में मिलता है। ये स्थान इस प्रकार हैं :—
( १ ) स्वस्तिक, ( २ ) वर्धमान, ( ३ ) नन्द्यावर्त, ( ४ ) संहत,
( ५ ) समपाद, ( ६ ) एकपाद, ( ७ ) पृष्ठोत्तानतल, ( ८ ) चतुरस्र,
( ६ ) पाष्णिविद्ध, ( १० ) पाष्णिपार्श्वगत, ( ११ ) एकपार्श्वगत,
( १२ ) एकजानुगत, ( १३ ) परावृत्त, ( १४ ) समसूची, ( १५ ) विषम-
सूची, ( १६ ) खण्डसूची, ( १७ ) ब्राह्म, ( १८ ) वैष्णव, ( १६ ) शैव,
( २० ) गरुड, ( २१ ) कूर्मासन, ( २२ ) नागबन्ध तथा ( २३ ) वृष-
भासन। इनमें समसूची, विषमसूची, खण्डसूची, गरुड, कूर्मासन, नागबन्ध
तथा वृषभासन ये सभी आसन ( स्थान ) है तथा शेष स्थान है। नृत्याचार्यों
के मत में ( इन्हीं में से ) पाष्णिविद्ध, पाष्णिपार्श्वगत तथा एकपार्श्वगत
जैसे स्थानों के स्पष्ट लक्षण ज्ञात नहीं हैं ।
अशोकमल्ल आदि उत्तरवर्ती नृत्य नाट्य के आचार्यों के मत के अनुसार
वैष्णव, समपाद आदि छः पुरुष स्थानक कहलाते हैं, जिनका नाट्यशास्त्र में
विवरण दिया गया है। इसके अतिरिक्त आठ स्त्री स्थानक भी होते हैं। इनके
नाम है :— आयत, अवहित्थ, अश्वक्रान्त, गतागत, वलित, मोटित, विनिवर्तित,
तथा प्रोन्नत । इसके अतिरिक्त पूर्वकथित तेईस देशी स्थानक भी होते हैं तथा
छः शयन या सुप्त-स्थानक होते हैं। यथा—सम, नत, आकुञ्चित, विवर्तित तथा
उद्वाहित । सङ्गीतरत्नाकर में भी छ पुरुष स्थानक तथा उपर्युक्त आठ स्त्री
स्थानक के अतिरिक्त ये ही छः सुप्त स्थानक बतलाये गये हैं तथा साथ ही नौ
उपविष्ट स्थान भी बतलाये गये हैं। ये नौ उपविष्ट स्थान इस प्रकार हैं,
( १ ) स्वस्थ, ( २ ) मदालस, ( ३ ) क्रान्त, ( ४ ) विष्कम्भित, ( ५ ) उत्कट,
( ६ ) स्रस्तालस, ( ७ ) जानुगत, ( ८ ) मुक्तजानु तथा ( ६ ) विमुक्त। विस्तार
भय से इनके लक्षणादि विवरण को यहाँ नहीं दे रहे हैं।
न्याय—अभिनय में शस्त्रमोक्षण की चार विधियाँ प्रयुक्त की जाती हैं
जिनकी शास्त्रीय संज्ञा 'न्याय' कहलाती है। क्योंकि इन्ही न्याय के आश्रित
अङ्गहार तथा 'न्याय' से ही उपस्थित युद्ध को रंगमञ्च पर लाते हैं। ये न्याय
चार हैं :— ( १ ) भारत, ( २ ) सात्वत, ( ३ ) वार्षगण्य तथा
( ४ ) कैशिक । भारत के अनुसार कटि प्रदेश पर, सात्वत के अनुसार पैर
पर, वार्षगण्य के अनुसार वक्षःस्थल पर तथा कैशिक के अनुसार मस्तक से
शस्त्र प्रहार का विधान होता है ।