नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजिनसे क्रमशः प्रसर्पण, अपसर्पण, आनन्द प्राप्ति, चक्राकार भ्रमण तथा सीधे
पीछे हटने के भावों का अभिनय किया जाता है ।
इसी प्रकार कटिके भी पाँच प्रभेद होते हैं । यथा—( १ ) छिन्ना,
( २ ) निवृत्ता, ( ३ ) रेचिता, ( ४ ) कम्पिता तथा ( ५ ) उद्वाहिता ।
इनका स्वरूप तथा योजना को यथास्थान दिखलाया गया है । ऊरु, जंघा
तथा पाद के भी कर्म या क्रिया के कारण पाँच-पाँच प्रभेद हो जाते हैं। इनमें
ऊरु के पाँच कर्म हैं—( १ ) कंपन, ( २ ) वलन, ( ३ ) स्तम्भन, ( ४ )
उद्वर्तन, ( ५ ) निवर्तन । इनकी विभिन्न स्वभाव एवं स्थितियों में योजना
रखी जाती है । इसी प्रकार जङ्घा के भी पाँच कर्म माने जाते हैं—( १ )
आवर्तित, ( २ ) नत, ( ३ ) क्षिप्त, ( ४ ) उद्वाहित तथा ( ५ ) परिवृत्त ।
इनकी योजना भी पात्रों के स्वभाव, स्थिति, गति तथा नृत्य आदि में की
जाती है । इसी प्रकार पाद के भी पाँच प्रभेद माने गये हैं। यथा—( १ )
उद्घट्टित, ( २ ) सम, ( ३ ) अग्रतलसञ्चर ( ४ ) अञ्चित तथा ( ५ )
कुञ्चित । इनके स्वरूप तथा योजना का विवरण भरत मुनि ने विस्तार से
दिया है। इसके अतिरिक्त प्राप्य अन्य पाठ को भी लिया जाए तो पाद के
'त्र्यस्र' तथा 'सूची' नामक और दो प्रभेद होते हैं जिनका लक्षण तथा योजना
भी मिलती हैं ।
ये पाद, जंघा तथा ऊरु के कार्य या व्यापार परस्पर सम्बद्ध होते हैं तथा
भाव एवं रस की स्थिति के अनुसार इनको एक साथ रखते हुए संचालित
किया जाता है और इनके समन्वित कार्य या व्यापार से अभिनय प्रयोग
पूर्ण तथा प्रभावकारी बन जाता है । इनमें भी सर्वाधिक महत्त्व पाद का
माना गया है । क्योंकि उसी के आधार या आश्रय पर ऊरु तथा जंघा के
कार्य निर्भर करते हैं तथा इन्हीं तीनों के कार्यों के समीकरण या एकीभाव
से 'चारी' का निर्माण होता है। इसी कारण 'पैरों' का नृत्य तथा अभिनय
दोनों के ही लिये समान महत्त्व है ।
चारीविधान—नाट्यशास्त्र का एकादशअध्याय 'चारीविधान' है ।
हम बतला आये हैं कि कटि, पार्श्व, ऊरू- ( तथा ) जंघा और पाद के द्वारा
होने वाले कार्य या व्यापार का एक साथ होना 'चारी' है, जिनमें चेष्टाएँ
व्याप्त रहती हैं । इनका अभिनय में बड़ा महत्त्व माना गया है, क्योंकि चारी
के द्वारा ही नृत्त तथा अङ्गहारों की रचना तथा शस्त्रों का चलाना भी सम्पन्न
होता है । नाट्य में चारी की स्थिति को बतलाते हुए भरतमुनि ने बतलाया
कि बिना चारी के मस्तक, हस्त आदि अंगों का संचालन नहीं हो सकता