नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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से नहीं जाना जाता है फिर भी वहाँ मुद्रा ( नाट्यशास्त्र का सन्दंश ) तथा
अर्धचन्द्र जैसे हस्तों की विविध भङ्गिमाओं वाले रूपों में योजना रख कर
प्रयोग को सौष्ठव युक्त रखा जाता है ।
हस्ताङ्गुलियों तथा बाहुओं का सञ्चलन प्रकार
नाट्यशास्त्र में हस्तकरण के प्रसंग में चार प्रकार से हस्तसंचलन
दिखलाया गया है यह हम पूर्व में दिखला आये हैं । यहाँ पर हस्तकरण हस्त
की अंगुलियों की विभिन्न क्रियाओं की स्थितियाँ होती हैं तथा इन्हीं का
विभिन्न नृत्यों में प्रयोग किया जाता है । इनके लक्षण भी नाट्यशास्त्र में
( ९।२१५-२१८ ) दिये गये हैं ।
इसी प्रकार नाट्यशास्त्र में बाहुओं की विविध दशाओं में रहनेवाली
संचलन क्रियाओं ( वाले हस्तों ) का वर्णन है जिन्हें बाहुप्रचार कहा गया है ।
यद्यपि हस्त के भेदों का करणों के अन्तर्गत सञ्चलन दिखलाया गया था किन्तु
बाहुप्रचार भी नाम देकर पृथक् से उन्हें फिर दिखलाया गया है । यहाँ
बाहुओं के संचलन के नाममात्र मिलते हैं उनके लक्षण नहीं परन्तु आचार्य
अभिनवगुप्तपाद ने इनके स्वरूप की थोड़ी व्याख्या दे दी है । तदनुसार इनका
विवरण इस प्रकार है :—
( १ ) तिर्यक् या तिर्यग्गत—दोनों बाजुओं में तिरछे रखे गये हाथ ।
( २ ) ऊर्ध्वसंस्थ—मस्तक पर ऊँचे कर रखे गये या उठाये हुए हाथ ।
( ३ ) अधोमुख—नीचे रखा गया या पृथिवी को छूने वाला हाथ ।
( ४ ) अञ्चित—हाथ को वक्षःस्थल के पास से मस्तक तक ले जाकर
पुनः उसी प्रकार अपने मूल स्थान पर वापस लाना ।
( ४ ) अपविद्ध—हाथ को वक्षःस्थल के पास से घुमाते हुए चक्राकार
गति में सभी ओर बढ़ाते हुए आगे ले जाना ।
( ६ ) मण्डलगति—हाथ को शरीर के चारो ओर फिराना या
घुमाव देना ।
( ७ ) स्वस्तिक—बायें हाथ से दाहिने हाथ की और दाहिने हाथ से
बाँये हाथ की भुजा को पकड़ना या छूना ।
( ८ ) पृष्ठानुसारी—पीछे रखा या ले जाया गया हाथ ।
( ९ ) उद्वेष्टित—हाथ को कलाई का सहारा लेकर निकालते या
फैलाते हुए दोनों को छूते हुए रखना और फिर एक को दूसरे का अनुगत
करना ।