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नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 16, कुल 668 में से

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वृत्तियों की अभिव्यक्ति हो उनका अवश्य प्रयोग किया जाए। इन
हस्तमुद्राओं का नृत्य या नृत्त में प्रचुर प्रयोग रखा जाता है, परन्तु सात्त्विक
भावादि के अभिनय में अल्प प्रयोग होता है ।
हस्ताभिनय के विभेद
हस्ताभिनय के प्रभेदों की परिकल्पना विविध मुद्राओं के आधार पर
मुनि ने की तथा इनके तीन वर्ग बनाए। ये वर्ग हैं—(१) असंयुतहस्त,
(२) संयुतहस्त तथा (३) नृत्तहस्त । इनमें संयुतहस्त तेरह, असंयुतहस्त
चौबीस तथा नृत्तहस्त के तीस प्रभेद किये । मुद्राओं को भी मूल या
आधारमुद्रा तथा नृत्तहस्त में विभाजित किया जा सकता है। इनमें
मूलमुद्रा के अन्तर्गत संयुक्त तथा असंयुत हस्तों को रखा जाता है। मूलमुद्रायें
नृत्य की भाषा के मूलाक्षर समझी जाती है। अतः जैसे किसी एक वर्ण या
अक्षर का अलग या स्वतन्त्ररूप में भी अर्थ रहता है तथा मिल कर वही वर्ण
दूसरे अनेक शब्दों का निर्माण करते हुए अन्य अर्थाभिव्यक्तियाँ करता है, यही
स्थिति इन मुद्राओं की भी है। ये अलग-अलग भी अपना अर्थ रखती हैं तथा
सम्मिलित होकर भी। इसके अतिरिक्त कालान्तर में विभिन्न नृत्य परम्पराओं
तथा पद्धतियों के उद्भव के साथ-साथ अपनी परम्परागत हस्तमुद्राओं का
भी प्रचार देखने में आता है, किन्तु इन सभी का मूल एवं आधार ग्रन्थ
यही नाट्यशास्त्र है तथा इसी का विवरण इन सभी की अपेक्षा मुख्यता लिये
हुए है भी ।
असंयुतमुद्राएँ—एक हाथ से दर्शायी या की जाने वाली हस्तमुद्रा
या हस्त को 'असंयुतहस्त' कहा जाता है, जिनकी भरतमुनि ने चौबीस
स्थितियाँ या भेद दिखलाते हैं। इनके नाम हैं—(१) पताक, (२) त्रिपताक,
(३) कर्तरीमुख, (४) अर्धचन्द्र, (५) अराल, (६) शुकतुण्ड, (७) मुष्टि,
(८) शिखर, (६) कपित्थ, (१०) कटकामुख, (११) सूचीमुख, (१२) पद्म-
कोश, (१३) सर्पशीर्ष, (१४) मृगशीर्ष, (१५) कंगुल, (१६) अलपद्म,
(१७) चतुर, (१८) भ्रमर, (१६) हंसास्य, (२०) हंसपक्ष, (२१) सन्दंश,
(२२) मुकुल, (२३) ऊर्णनाभ तथा (२४) ताम्रचूड़ ।
अभिनयदर्पण के अनुसार असंयुतमुद्राओं की संख्या अट्ठाईस है तथा
चार पूरक मुद्राओं के साथ इनकी संख्या बत्तीस हो जाती है। इन अतिरिक्त
मुद्राओं के नाम हैं—अर्धपताक, मयूर, चन्द्रकला, सिंहमुख, त्रिशूल, व्याघ्र,
अर्धसूची, कटक तथा पल्ली । इनमें ( भरतोक्त ) ऊर्णनाभ को छोड़ कर