नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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अतः आङ्गिक अभिनय की आधारभूत रहने से चारी का अभिनय के क्षेत्र
में असाधारण महत्त्व माना गया है। इसके अतिरिक्त नृत्य के कारण, खण्ड
तथा मण्डल का भी चारी ही आधार होती है, जिसकी विशेषरूप से 'नृत्त' में
संयोजना की जाती है तथा युद्ध एवं शस्त्रप्रहार के अभिनय प्रसंगों में प्रयोग
रखे जाते हैं।
एक पाद के प्रचार या आगे बढ़ने के व्यापार से चारी की, दो बार पाद
प्रचार के द्वारा 'करण' की तथा करणों के एकीभाव या समयोग से 'खण्ड'
की तथा दो या तीन खण्डों के योग से 'मण्डल' का निर्माण होता है। चारी के
अभिनयव्यापार को सर्व प्रथम दो भागों में विभक्त किया जाता है। एक
भौमी तथा दूसरी आकाशीकी चारी। इनमें प्रत्येक चारी के सोलह-सोलह
भेद रखे गये हैं जो कुल भेद बत्तीस हो जाते हैं। अभिनयदर्पण में चारी के
आठ प्रभेद ही दिखलाये गए तथा यहाँ भौमी एवं आकाशीकी के रूप में उनका
विभाग भी नहीं मिलता। 'संगीतरत्नाकर' में देशी चारी के अतिरिक्त प्रभेद
भी दिखलाये गये हैं जो कोहल आदि नृत्याचार्यों ने अपने ग्रन्थों में दिये थे।
तदनुसार ३५ भौमी चारियाँ तथा २७ आकाशीकी चारियाँ मानी गयी हैं।
कोहल ने ३५ मधुप्राचारी को भी बतलाया या जिनका विवरण 'संगीत-
रत्नाकर' की चतुरकल्लिनाथ की व्याख्या में मिलता है। आचार्य कोहल ने
नृत्याचार्य की अपेक्षा से चारी में संवर्द्धन या संशोधन को भी सहमति दी हुई
थी। इस प्रकार चारी के भेदों के विषय में प्राचीन तथा उत्तरवर्ती आचार्यों में
पर्याप्त मतभेद है जो इसके प्रयोग के महत्त्व को दर्शाता है। चारी को वर्तमान
कलाविद् 'चाल' शब्द से (भी) दिखलाते हैं। इन चारियों के मेल या समूह
से 'मण्डल' का निर्माण होता है। ये भी अपनी आधारभूत चारियों के भेद के
कारण आरम्भ में भौम तथा आकाशिक भेद से दो प्रकार के हो जाते हैं।
इन मण्डलों के भी भौम प्रभेद दस तथा आकाशिक प्रभेद दस होकर कुल
संख्या बीस हो जाती है।
भौमी चारी—मूलतः एवं मुख्य रूप से चारियों का प्रयोग भूमि पर
होने के कारण अपनी संज्ञा के अनुरूप ही इनका 'भौमी' अन्वर्थ नामकरण
है। इनके सोलह प्रभेद हैं। जो इस प्रकार हैं—(१) समपादा, (२)
स्थितावर्ता, (३) शकटास्या, (४) अध्यर्धिका, (५) चाषगति, (६)
विच्युता, (७) एलकाक्रीडिता, (८) बद्धा, (६) ऊरुद्वृत्ता, (१०)
अड्ढिता, (११) उत्स्पन्दिता, (उत्स्यन्दिता) (१२) जनिता, (१३)