नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 25, कुल 668 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्पन्दिता, ( १४ ) अपस्पन्दिता, ( १५ ) समोत्सारित मत्तल्ली तथा ( १६ )
मत्तल्ली । इनके लक्षण तथा योजनादि विवरण नाट्यशास्त्र में विद्यमान है ।
आकाशीकी चारी—आकाशीकी चारी के अन्तर्गत आकाश की ओर
अर्थात् ऊपर होने वाले पाद प्रयोग या अभिनय व्यापारों का समावेश रहता
है तथा इसी कारण इसका भी अन्वर्थ नामकरण है। इनके पारस्परिक अन्तर
की स्थिति बतलाते हुए भरतमुनि ने एक प्रयोगगत विशिष्ट तथ्य भी
संकेतित किया कि भौमीचारी का प्रयोग मुख्यरूप से करणाश्रित नृत्य तथा
द्वन्द्वयुद्ध में होता है तथा प्रासंगिक रूप में 'नाट्य' में रखा जाता है जब कि
आकाशीकी चारी का प्रयोग ललित अंग से युक्त क्रियाओं के प्रसंग में तथा
धनुष, वज्र, असि आदि शस्त्रों के चलाने के ( युद्धगत ) व्यापार में किया
जाता है। आकाशीकी चारी के भी सोलह प्रभेद होते हैं। ये हैं—
( १ ) अतिक्रान्ता, ( २ ) अपक्रान्ता, ( ३ ) पार्श्वक्रान्ता, ( ४ ) ऊर्ध्वजानु
( ५ ) सूची, ( ६ ) नूपुरपादिका, ( ७ ) दोलपादा, ( ८ ) आक्षिप्ता,
( ६ ) आविद्धा, ( १० ) उद्वृत्ता, ( ११ ) विद्युद्भ्रान्ता, ( १२ ) अलाता
( १३ ) भुजङ्गत्रासिता, ( १४ ) हरिणीप्लुता, ( १५ ) दण्डा ( दण्डपादा )
तथा ( १६ ) भ्रमरी। इनके लक्षण तथा प्रयोगादि योजना का विवरण
नाट्यशास्त्र में है।
इस प्रकार यद्यपि नाट्यशास्त्र ( आदि ग्रन्थों ) में इन चारियों के लक्षण
तथा योजना की रीति निदर्शित की गयी किन्तु यह सभी शास्त्रीयपदावलि
तथा सांकेतिक पद्धति में रखी जाने के कारण केवल नाट्यशास्त्र के अध्येता
या अभ्यासकों के द्वारा ही वेद्य होती हैं। भारत की विभिन्न नृत्य या नाट्य
प्रणालियों में अभी भी इन चारियों में से अधिकांश का प्रयोग चल रहा है
यह ठीक है किन्तु इतने से भी इसकी व्यवस्थित स्थिति का स्पष्ट परिभान
नहीं होता। इसे यदि सरल शब्दों में संक्षेप में समझना चाहें तो यही कि
पाद की गति को तीन प्रकारों में बाँटा गया है। इनमें प्रथम को गति,
द्वितीय को चारी तथा तृतीय को 'मॅडल' कह सकते हैं ।
इन चारियों के प्रदर्शन के अवसर पर नाट्य या नृत्य प्रयोग के प्रसंग में
हस्त एवं पाद प्रचार का पारस्परिक अनुगत सम्बन्ध या क्रियाक्रम रखा
जाता है। नाट्य, नृत्य ( तथा नृत्त के ) प्रयोग में कभी हस्तप्रचार की
कभी पादप्रचार की तथा कभी दोनों की समान रूप में प्रमुखता होती है।
अतएव हस्तप्रचार की प्रधानता में पादप्रचार ( उसी का ) अनुगत रहता