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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 22, कुल 668 में से

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( १३ )
( १०) प्रसारित—हाथ को आगे की ओर लम्बा करते हुए फैलाना ।
आचार्य अभिनवगुप्तपाद ने इन बाहुप्रकारों की संचलनक्रियागत योजना
को द्रुत, मध्य या विलम्बित गति में रख कर विचित्रता उत्पन्न करने का
भी निर्देश दिया । इनके मत में इसके अतिरिक्त अन्य हस्त प्रचारों की
आवश्यकता नहीं है जो अन्य आचार्यों ने दिखलाये हैं। क्योंकि ऐसे अतिरिक्त
प्रकारों का अन्तर्भाव इन्हीं दस प्रभेदों में सरलता से किया जा सकता है।
परन्तु नाट्यशास्त्रसंग्रह तथा सङ्गीतरत्नाकर ग्रन्थों में बाहुओं के सोलह
प्रभेद दिये गये हैं। इनमें नाट्यशास्त्र के उपर्युक्त दस प्रभेदों के अतिरिक्त छः
अन्य प्रभेद भी मिलते हैं। इनके नाम तथा स्वरूप इस प्रकार हैं :—( १ )
आविद्ध, ( २ ) कुञ्चित, ( ३ ) नम्र, ( ४ ) सरल, ( ५ ) आन्दोलित तथा
( ६ ) उत्सारित ।
इनके क्रमशः लक्षण इस प्रकार हैं:—
( १ ) आविद्ध—बाहर से अपनी ओर खींचा गया हाथ ।
( २ ) कुञ्चित—कोहनी को सिकुड़ा कर हाथ को मोड़ना ।
( ३ ) नम्र—सहज भाव से थोड़ा तिरछा रखा या झुकाया हुआ हाथ ।
( ४ ) सरल—दोनों बाजुओं की ओर सौष्ठवपूर्ण रीति में सरलता से
या सीधा रखा हुआ हाथ ।
( ५ ) आन्दोलित—हाथों को झूलते हुए रखना ।
( ६ ) उत्सारण—विरुद्ध दिशा में रखे हुए हाथ को अपनी बाजू से
दूसरी ओर चलता हुआ रखना ।
अङ्गों के अन्य अभिनय—नाट्यशास्त्र के दशम-अध्याय में अभिनय-
विधि के प्रसंग में हृदय, उदर, पार्श्व, कटि, ऊरु, जङ्घा तथा पाद के द्वारा
होने वाले अभिनय का विवेचन है। इनमें हृदय या वक्षःस्थल की पांच
अवस्थाएँ या प्रकार होते हैं। ये हैं :—आभुग्न, निर्भुग्न, प्रकम्पित, उद्वाहित
तथा सम । इनके स्वरूप तथा अभिनययोजना का विशद विवरण है।
उदर के तीन रूप या प्रभेद होते हैं । ये हैं—क्षाम, खल्व तथा पूर्ण । दुबला
या पिचका हुआ उदर 'क्षाम', फूला हुआ 'पूर्ण' तथा अतिशय झुका हुआ या
गड्ढे वाला नत उदर 'खल्व' कहलाता है। इनमें हास्य, रुदन आदि में 'क्षाम'
की, व्याधि, तपस्या आदि में 'खल्व' की तथा तन्द्रा, स्थूलता या अतिभोजन
की स्थिति में 'पूर्ण' की योजना की जाती है। पार्श्व के ( बाजू ) भी
नत, समुन्नत, प्रसारित, विवर्तित तथा प्रसृत नामक पाँच प्रभेद होते हैं।