नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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है तथा पादप्रचार की प्रमुखता में हस्तप्रचार भी उसी प्रकार अनुगत हो
जाता है । यदि दोनों की प्रमुखता रखना हो तो फिर दोनों का प्रत्येक का
एककालिक विनियोजन हो जाता है । इस प्रसंग में भरतमुनि का यह सिद्धान्त
बड़ा ही न्यायसम्मत तथा ध्यान देने योग्य है जो नाट्यप्रयोग के सुदीर्घ
अनुभव को दिखलाते हुए इस सम्बन्ध में दिखलाया गया है ।
स्थान—विविध अभिनय प्रदर्शन के अवसर पर चारी तथा हस्तादि के
प्रदर्शन को करते समय शरीर को एक विशिष्ट एवं नियतस्थिति में रखना
अपेक्षित होता है । इस स्थिति को 'स्थान' कहा जाता है जिसे आचार्य
अभिनवगुप्तपाद ने कायसन्निवेश या शरीर की विशिष्ट स्थिति कहा है ।
स्थान के विषय में नाट्य-नृत्य के आचार्यों में मतैक्य नहीं है । नाट्यशास्त्र के
अनुसार इनकी संख्या छः मानी गयी है । यथा—( १ ) वैष्णव,
( २ ) समपाद, ( ३ ) वैशाख, ( ४ ) मण्डल, ( ५ ) आलीढ़ तथा
( ६ ) प्रत्यालीढ़ । इन स्थानों के अधिष्ठाता देवता तथा इनकी योजना आदि
का शास्त्र में विवरण दिया गया है जिसका संक्षेप इस प्रकार है :—
वैष्णवस्थान—इसके अधिष्ठाता देव श्रीविष्णु हैं । इसमें दोनों पैर
अढ़ाई ताल के अन्तर से, एक पैर खड़ा हुआ और दूसरा टेढ़ा, जंघा ऊँची
तथा झुकी हुई और अंग सौष्ठव-सम्पन्न रखा जाता है ।
समपाद-स्थान :—इसके अधिष्ठाता देव श्री ब्रह्मा हैं । इसमें दोनों पैर
का अन्तर एक ताल का और दोनों ( ही ) पैर सहज सौष्ठव से युक्त
होते हैं ।
वैशाख-स्थान—इसके अधिष्ठाता देव श्री स्कन्द ( कार्तिकेय ) है ।
इसमें दोनों पैर तीन ताल के अन्तर से तिरछे, स्तब्ध तथा एक दूसरे के
सम्मुख बाजू को बतलाते हुए ।
मण्डल-स्थान—इसके अधिष्ठाता देव श्रीइन्द्र हैं । इसमें दोनों पैरों
का अन्तर चार ताल, दोनों एक दूसरे के सम्मुख तिरछे तथा घुटने और कटि
सहज भाव में रखकर खड़े होना ।
आलीढ़ तथा प्रत्यालीढ़-स्थान—इन दोनों स्थानों के अधिष्ठातृ देव
श्रीरुद्र हैं । इसमें मण्डल स्थान की स्थिति में दाहिना पैर पाँच ताल के अन्तर
पर आगे रखने पर 'आलीढ़' तथा इसके विपरीत बायाँ पैर इसी प्रकार
आगे रखना या दाहिना पैर सिकोड़ कर वायाँ पैर आगे रखने पर
प्रत्यालीढ़ 'स्थान' ।
नाट्यशास्त्र में इन स्थानों के स्वरूप तथा उनकी अभिनय योजना दी
२ ना० भू० द्वि०