नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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कर्म होते हैं यथा—समा, नता, उन्नता, व्यस्ता, रेचिता, कुञ्चिता, अञ्चिता,
वलिता तथा विकृता ।
मुखराग—अभिनय में मुखराग का विशिष्ट योग रहने से इसका अतिशय
महत्त्व है । कपोल तथा नयनों में जो एक विशेष राग चित्तवृत्तियों के आवेग
प्रवाह में परिलक्षित होता है उसका प्रदर्शन कार्य सूक्ष्ममतिजन से ही संवेद्य
माना जाता है। भाव तथा रस के सन्दर्भ में मुखराग का प्रस्तुतीकरण
अभिनेता के लिये महत्त्वपूर्ण तथा आवश्यक माना जाता है। इसके महत्त्व
को मुनि ने स्वयं ही—"शाखा, अंग तथा उपांग से युक्त अभिनय के मुखराग
से हीन होने पर शोभा नहीं" कहकर बतलाया है। मुखराग आङ्गिक अभिनय
की अभिव्यक्ति का प्रवेश द्वार है जिससे दर्शक को तुरन्त आन्तरिक सुख-
दुःखमयी दशा का प्रत्यक्ष हो जाता है।
मुखराग के चार प्रभेद हैं—स्वाभाविक, प्रसन्न, रक्त तथा श्याम । तटस्थ
स्थिति एवं सहज दशा में 'स्वाभाविक' की, शृङ्गार-हास्य तथा अद्भुतरस
में 'प्रसन्न' की, वीर, रौद्र तथा करुण रस एवं मत्त तथा रुग्ण दशा में 'रक्त'
की तथा भयानक और वीभत्सरस में 'श्याम' की योजना की जाती है। इस
प्रकार यह स्पष्ट है कि रसात्मकबोध में मुखराग का अतिशय योगदान
रहता है। वेमभूपाल ने मुखराग के इन प्रभेदों के अतिरिक्त विकस्वर,
अरुण, मलिन तथा पाण्डु नामक चार अतिरिक्त प्रभेद भी माने हैं। नेत्रों के
अभिनय के साथ-साथ मुखराग का संयोजन नाट्यप्रयोग की सिद्धि के मूल
में अवश्य विद्यमान रहता है। अंग तथा उपाङ्ग का यही विवरण लक्षणादि
सहित नाट्यशास्त्र के अष्टम अध्याय में दिया गया है ।
हस्ताभिनय—नवम अध्याय में हस्ताभिनय को दिखलाया है, जिसका
आङ्गिक अभिनय में अतिशय महत्त्व ( माना जाता ) है। मानव चेष्टाओं
से उसके अंग उपांगों की दशाओं को जो तत्व आलोक सम्पन्न रूपवान् तथा
अभिव्यक्ति सम्पन्न बनाता है। यह एक ऐसा माध्यम है जो आन्तर-भावों को
स्वरूप देकर रसभूमि पर ले जाता है। हस्ताभिनय द्वारा ही नाट्यार्थ को
रूप प्रदान किया जाता है तथा वे भावद्वन्द्वों को बोधगम्य बनाते हैं।
प्रत्येक हस्तमुद्रा अपने मूल में भाव एवं रस की आन्तरिक प्रेरणा रखती
है। भरतमुनि ने इसी कारण हस्ताभिनय का विशिष्टता से विवरण देते
हुए इनके स्वरूप को प्रस्तुत करते समय देश, काल, कर्म, स्थान तथा
प्रचार के अतिरिक्त करणों तथा अर्थयुक्ति को ध्यान में रखने का स्पष्ट
निर्देश ( भी ) दिया है। हस्तमुद्रा से प्रयोगगत सुकुमार तथा उद्धत स्थिति