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नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 15, कुल 668 में से

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( ६ )
कालानुकूलता एवं अनुगमन
इसी प्रकार हस्ताभिनय का कालानुसारी होना भी आवश्यक है, जिससे
'सौष्ठव' बराबर बना रहे । भरतमुनि ने प्रयोग की दृष्टि से कभी या किसी
समय विहस्त - ( हस्त चेष्टाओं से रहित ) स्थिति तथा कभी हस्तमुद्राओं के
अल्पप्रयोग का भी जहाँ निर्देश किया है वहाँ शास्त्रानुमोदित हस्त वाञ्छित
नहीं होता । उदाहरण के लिये—प्रमत्त, रोगग्रस्त तथा भयार्त्त व्यक्ति की
स्थिति में विहस्त ( हस्तमुद्राओं का प्रयोग न रहना ) ही उचित होता है ।
इसके अतिरिक्त मूर्च्छा, जुगुप्सा, हिम या आतप की पीड़ा जैसी अवस्था हो
तो वहाँ हस्ताभिनय नहीं होता, प्रत्युत भाव की अभिव्यक्ति में अक्षमता
लाना होता है क्योंकि ऐसे प्रसंग में हस्ताभिनय के न रखने में ही सौष्ठव
है । इसी कारण ऐसे अवसर पर मुनि ने सात्विकअभिनय के द्वारा सौष्ठव
की व्यञ्जना का निर्देश किया भी है । इसी विषय पर आचार्य अभिनव-
गुप्तपाद ने बतलाया कि¹ अभिनय के समय आन्तरिक चित्तवृत्तियों के
प्रकाशन में सक्षम हस्तमुद्राओं का ही प्रयोग उचित रहता है । जैसे भय
की दशा में कपोत हस्तों का, तन्द्रा तथा आलस्य में कर्कट हस्त का
शोकसन्तप्त स्थिति में दोलाहस्त का प्रयोग तथा ईर्ष्या आदि भावों के
अनुभावन में सात्त्विकअभिनय ही प्रस्तुत किया जाता है । परन्तु ऐसे समय
जो बाह्यगुण या द्रव्य के प्रकाशन हो उनका प्रयोग नहीं करना चाहिए ।
इसी प्रकार पात्र की व्यग्र या व्यस्त स्थिति में भी हस्ताभिनय प्रस्तुत नहीं
किया जाता है, किन्तु यहाँ मुखराग या अर्थ प्रकाशक तथा विराम आदि से
युक्त वाचिकाभिनय की योजना रखी जाती है ।
मुखराग से अङ्गाभिनय की अनुगतता
यह कहा जा चुका है कि हस्ताभिनय द्वारा भावों का प्रकाशन किया
जाता है, परन्तु इसी के साथ-साथ मुख, नेत्र, भ्रू, कपोल आदि के यथोचित
सन्निवेश के साथ मुखराग की योजना भी होना आवश्यक है, अन्यथा
केवल हस्त प्रचार मात्र से नाट्यार्थ की अभिव्यक्ति नहीं होगी । इसी कारण
मुनि ने मुखराग को अभिनय का प्राणतत्त्व प्रतिपादित किया, क्योंकि इसके
बिना आन्तर चित्तवृत्तियों तथा रागात्मक अनुभूतियों का प्रकाशन सम्भव
नहीं है । अतः स्पष्ट है कि नेत्र, भ्रू एवं अङ्गों की तथा मुखराग की
पारस्परिक अनुगत वृत्ति के द्वारा ही हस्तप्रचारों की अभिव्यञ्जना सौष्ठव-
शालिनी हो सकती है । इसलिए जिन जिन हस्तमुद्राओं के द्वारा आन्तर-
१. द्रष्ट० अभि० भा० पृ० ६८, ६६. बड़ौदा संस्करण ।