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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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का अन्तर तुरन्त प्रकट हो जाता है । इसी कारण यहाँ अर्थयुक्ति का महत्त्व
सर्वोपरि होता है तथा वाचिक अभिनय में भी हस्तस्थिति का संयोग अपेक्षित
रस में रखा ही जाता है ।
पात्रानुसारी हस्ताभिनय
हस्ताभिनय में पात्रों की श्रेणी या स्तर के अनुरूप स्थान की भी योजना
रखी जाती है । अभिनय की दशा में उत्तमपात्र ललाट आदि उन्नत ( उत्तम )
स्थानों पर अपने हस्तों को ले जाते हैं, मध्यमपात्र उन्हें वक्षःस्थल के बराबर
रखते हैं तथा अधमपात्र कटि या उससे निचले शरीर के प्रदेश पर स्पर्श
करते हुए हाथों को रखते हैं । स्थानविभाजन की इसी प्रणाली का अभिनव-
गुप्तपाद के उपाध्याय श्रीभट्टतौत ने समर्थन करते हुए बतलाया कि यही
स्थानविधान पात्रों की ( उत्तमादि ) स्थिति तथा मानसीदशा का आधार बन
इनका वर्गीकरण करता है । हम भी देखते हैं कि उत्तमपात्र के हृदय में स्थित
बात रहने पर उनका हस्त उत्तम अंगों का ( ही ) स्पर्श करता है, जब कि
हीनभावों के समय निम्न अंगों का । इस प्रकार पात्रों की उत्तम, मध्यम तथा
अधमस्थिति के आधार पर हस्तप्रचार ( या गति ) की अल्पता या आधिक्य
रखा जाता है । नाटकादि में उत्तमपात्रों के हस्तप्रचार अल्पतायुक्त,
मध्यम तथा अधमश्रेणी के नाट्यप्रयोगों में पात्रों के हस्तप्रचार मध्यम तथा
नृत्तादि प्रयोगों में हस्तप्रचार की बहुलता या आधिक्य रखा जाता है,
क्योंकि यहाँ हस्तप्रचार भावाभिव्यक्ति का साधन होता है । इसके अतिरिक्त
बाह्यशोभा तथा आकर्षण भी हस्तप्रचार से दिखलाया जाता है तथा नाटकीय
पात्रों का श्रेणी स्तर भी हस्तमुद्राओं से ही जाना जाता है ।
शास्त्रानुमोदिता
हस्तमुद्राओं के द्वारा अभिनय को व्यापक एवं लोकानुमोदित भावभूमि
के परिवेश में विवेचित कर भरतमुनि ने स्पष्टतः यही बतलाया कि नाट्यार्थ
के अनुरूप लोकव्यवहार एवं लोकस्वभाव को ध्यान में रख कर हस्तमुद्राओं
का प्रस्तुतीकरण होना चाहिए । क्योंकि इस प्रकार किये गये अभिनय से
उस 'सौष्ठव' को साधा जाता है जहाँ अंगों में सौन्दर्य तथा प्रसार हो ।
अतः अभीष्ट सौष्ठव का हस्ताभिनय से गहरा सम्बन्ध है तथा सौष्ठवविहीन
हस्ताभिनय का इसी कारण निषेध भी किया गया है । इसलिये उत्तम तथा
मध्यम श्रेणी के पात्र शास्त्रानुमोदित हस्तमुद्राओं के साथ ही अपना
अभिनय प्रस्तुत करते हैं ।