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नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 20, कुल 668 में से

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( ११ )
नाट्यशास्त्र में नृत्तहस्तों के जो लक्षण दिये गये हैं उनसे भी नृत्य के
अर्थों की सूचना मात्र दर्शाना ही संभव है। इसी कारण पूर्ण विवरण से
इनकी रचना दिखलाने पर भी इनकी स्थिति का स्थिरीकरण संभव नहीं
है तथा इसी कारण इनका जितना वर्णन शब्दों से संभव था वह किया
गया परन्तु ये हैं हाथों की चलितस्थितियाँ। इसीलिये यह भी हमें दिखलाई
देता है कि पताक जैसे अभिनयहस्तों के योग के साथ अभिनय तथा
नृत्तहस्तों का मिश्रण होगा तथा ऐसे स्थानों पर नाट्य की प्रधान स्थिति
रहने पर ऐसे हस्त को अभिनयहस्त तथा नृत्त की प्रमुखता रहने पर 'नृत्तहस्त'
समझना पड़ेगा । जैसे उदाहरण के लिये नृत्ताभिनय की स्थिति में लताहस्त का
प्रयोग या नृत्य की स्थिति में 'करिहस्त' का प्रयोग करना । इसी प्रकार
चतुरस्र हस्तादि का प्रयोग भी। नाट्यगत विशुद्ध हस्तमुद्राओं के या
नृत्तहस्तों के सम्पादन में करणों का योग तथा उनका प्रयोग नितान्त
वाञ्छनीय है । हस्तकरण के द्वारा हाथ की मुद्राएँ अपना स्वरूप लेती हैं ।
ये करण भी चार प्रकार का होता है :—(१) आवेष्टित, (२) उद्वेष्टित,
(३) व्यावर्तित, तथा (४) परावर्तित । करणों का प्रयोग विशुद्ध नाट्य तथा
नृत्त दोनों ही दशाओं में किया जाता है। इन करणों का प्रयोग भी मुख, नेत्र,
भ्रू तथा मुखराग आदि के अनुगत या साथ रखते हुए किया जाता है जिससे
अपेक्षित भावाभिव्यक्ति हो सके । क्योंकि ये नृत्तहस्त उपाङ्ग के अभिनय के
साथ जब प्रस्तुत होंगे तथा भाव एवं रस के आश्रित होकर संचालित होंगे
तो उससे प्रयोग या नाट्यार्थ की पूर्ति या सफलता होती है ।
नृत्तहस्तों की एक ( मुख्य ) विधि यह है कि इनका संचलन शरीर की
क्रिया तथा पैर को उठाने और रखने के साथ रखा जाता है। अतः यह
संचलन की स्थिति पाँच प्रकार से होती है। ये हैं, ऊपर, नीचे, दाहिने,
बायें तथा सामने की ओर संचलन होना ।
आधुनिक प्रचलित नृत्यों में नृत्तप्रधान शैली में परिगणनीय भरतनाट्य
में नृत्यहस्तों की विविधता देखने में आती है जब कि दक्षिणभारत के
मलावार में लोकप्रिय एवं परम्परागत 'कथकलि' ( नृत्य ) में नृत्तहस्तों
का प्रयोग अल्प रखा जाता है, क्योंकि यह अभिनयप्रधान नृत्य होता है तथा
इसी कारण इसमें अर्थदर्शक हस्तमुद्राओं का ही प्रयोग इष्ट होता है। यदि
प्रयोग के उपयोग को देखते हुए विचार करें तो नृत्तहस्तों में भी पताक,
त्रिपताक, मुद्रा तथा अर्धचन्द्र जैसे नृत्तहस्तों का प्रचुर प्रयोग दृष्टिगत हो
जाता है । कथकली की परम्परा में नृत्तहस्तों को ऐसे भिन्नतायुक्त नामकरण