नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
( ६७ )
क्षोभ लक्षण ( ३८ ) २८५
गुणकीर्तन ,, ( ३९ ) २८५
अनुक्तसिद्धि ,, ( ४० ) २८६
प्रियोक्ति ,, ( ४१-४२ ) २८६
अलङ्कार ,, ( ४३ ) २८६
उपमा-लक्षण ( ४४ ) २८७
उपमा-उदाहरण ( ४६-४८ ) २८७
उपमा के पाँच प्रकार ( ४९ ) २८८
प्रशंसोपमा लक्षण सोदाहरण (५०) २८८
निन्दोपमा ,, ,, ( ५१ ) २८८
कल्पितोपमा ,, ,, ( ५२ ) २८८
सदृशी उपमा ,, ,, ( ५३ ) २८८
किञ्चित्सदृशी लक्षण सोदाहरण
( ५४-५५ ) २८९
दीपक लक्षण सोदाहरण
( ५६-५७ ) २८९
रूपक लक्षण सोदाहरण (५८-५९) २९०
यमक-लक्षण ( ६० )
यमकों के प्रभेद ( ६१-६३ ) २९१
पादान्तयमक लक्षण उदाहरण
( ६४-६५ ) २९१
काञ्चीयमक लक्षण उदाहरण
( ६६-६७ ) २९२
समुद्गयमक लक्षण उदाहरण
( ६८-६९ ) २९२
विक्रान्तयमक लक्षण उदाहरण
( ७०-७१ ) २९३
चक्रवालपमक लक्षण उदाहरण
( ७२-७३ ) २९३
सन्दष्टयमक लक्षण उदाहरण
( ७४-७५ ) २९४
पादादियमक लक्षण उदाहरण
( ७६-७७ ) २९४
आम्रेडितयमक लक्षण उदाहरण
( ७८-७९ ) २९४
चतुर्थव्यवसितयमक लक्षण उदाहरण
( ८०-८१ ) २९५
७ ना० द्वि० भू०
मालायमक लक्षण उदाहरण
( ८१-८६ ) २९६
काव्यदोष उद्देश्य कथन ( ८७ ) २९७
गूढार्थ तथा अर्थान्तर लक्षण (८८) २९७
अर्थहीन तथा भिन्नार्थ लक्षण
( ८९-९० ) २९८
एकार्थ तथा अभिप्लुतार्थ लक्षण
( ९१ ) २९८
न्यायादपेत तथा विषम लक्षण
( ९२ ) २९९
विसन्धि तथा शब्दच्युत लक्षण
( ९३-९४ ) ३००
गुण ( लक्षण ) उद्देशकथन (९५) ३००
श्लेष लक्षण ( ९६ ) ३०१
प्रसाद ,, ( ९७ ) ३०२
समता ,, ( ९८ ) ३०२
समाधि ,, ( ९९ ) ३०३
माधुर्य ,, ( १०० ) ३०४
ओज ,, ( १०१ ) ३०४
सौकुमार्य ,, ( १०२ ) ३०५
अर्थव्यक्ति ,, ( १०३ ) ३०६
उदात्त (र) ता लक्षण ( १०४ ) ३०६
कान्ति ,, ( १०५ ) ३०७
रसानुसारी वृत्त तथा अलंकारादि
विधान ( १०६-११२ ) ३०८
( पाठ्य में ) अक्षरों की रसानुकूल
योजना-विधि ( ११३-११४ ) ३०९
( पाठ्य में ) प्लुतवर्ण प्रयोग विधान
( ११५-११८ ) ३०९
( पाठ्य में ) रचना प्रयोग विधान
( ११९-१२१ ) ३१०
लक्षण अनुबन्धाध्याय (श्लोक १-३६)
विभूषणादि उद्देश्य कथन (१-४) ३१३
विभूषण लक्षण ( ५ ) ३१४
अक्षरसंघात ,, ( ६ ) ३१४
शोभा ,, ( ७ ) ३१४
अभिमान ,, ( ८ ) ३१५
( ६८ )
गुणकीर्त्तन लक्षण उदाहरण ( ९ ) ३१५
प्रोत्साहन ,, ( १० ) ३१५
उदाहरण ,, ( ११ ) ३१५
निरुक्त ,, ( १२ ) ३१६
गुणानुवाद-अतिशय लक्षण ( १३ ) ३१६
हेतु ,, ( १४ ) ३१६
सारूप्य ,, ( १५ ) ३१७
मिथ्याध्यवसाय तथा
अतिशय ( १६ ) ३१७
सिद्धि ,, ( १७ ) ३२१
पदोच्चय ,, ( १८ ) ३१८
आक्रन्द लक्षण ( १९ ) ३१८
मनोरथ ,, ( २० ) ३१८
आख्यान ,, ( २१ ) ३१८
याञ्चा ,, ( २२ ) ३१९
प्रतिषेध ,, ( २३ ) ३१९
पृच्छा ,, ( २४ ) ३१९
दृष्टान्त ,, ( २५ ) ३२०
निर्भासन ,, ( २६ ) ३२०
संशय ,, ( २७ ) ३२०
आशीः ,, ( २८ ) ३२१
प्रियवचन ,, ( २९ ) ३२१
कपटसंघात ,, ( ३० ) ३२१
क्षमा ,, ( ३१ ) ३२२
प्राप्ति ,, ( ३२ ) ३२२
पश्चात्ताप ,, ( ३३ ) ३२३
अनुवृत्ति ,, ( ३४ ) ३२३
उपपत्ति ,, ( ३५ ) ३२३
युक्ति ,, ( ३६ ) ३२३
कार्य ,, ( ३७ ) ३२३
अनुनीति ,, ( ३८ ) ३२४
परिदेवन ,, ( ३९ ) ३२४
अष्टादश अध्याय
( भाषाविधान ) ( श्लोक १-६१ )
प्राकृत ( पाठ्य ) लक्षण ( १-२ ) ३२५
प्राकृतपाठ्य के तीन प्रकार ( ३ ) ३२६
प्राकृत-सामान्यविवरण ( ४-५ ) ३२६
स्वर तथा असंयुक्त व्यञ्जन ( ६-१७ ) ३२७
संयुक्त व्यञ्जन ( १८-२४ ) ३३२
भाषाओं के चार प्रकार ( २५-२६ ) ३३५
अतिभाषा तथा आर्यभाषा-स्वरूप
जातिभाषा स्वरूप ( २८ ) ३३६
जात्यन्तरी ( योन्यन्तरी ) भाषा-
स्वरूप ( २९ ) ३३६
पाठ्यके द्विविध प्रभेद ( ३० ) ३३६
संस्कृतपाठ्य के प्रदेश या अवसर
( ३१ ) ३३७
प्राकृत-पाठ्य के उपदेश या अवसर
( ३२-३५ ) ३३७
प्राकृतपाठ्य के अपवाद
( ३६-४६ ) ३३९
सात भाषाएँ ( ४७-४८ ) ३४२
भाषाओं का उपयोग या व्यवहार
( ४९-५५ ) ३४२
विभिन्न देशभाषाओं के विभेदक-
लक्षण ( ५६-६१ ) ३४५
एकोनविंश अध्याय
( सम्बोधन तथा काकुस्वर-
व्यञ्जन विधान ) ( श्लोक १-७८ )
सम्बोधन-शब्दावली प्रयोग एवं
विधान ( १-२ ) ३४७
देवता तथा गुरुजन के लिये
सम्बोधन शब्द ( ३-४ ) ३४७
ब्राह्मण के लिए सम्बोधन शब्द
( ५ ) ३४८
महाराज के लिये सम्बोधन शब्द
( ५ ) ३४८
गुरु तथा आचार्य के सम्बोधन
शब्द ( ५ ) ३४८
ब्राह्मण द्वारा राजा के सम्बोधन
शब्द ( ६ ) ३४८
ब्राह्मण का मन्त्री के लिये सम्बोधन
शब्द ( ७ ) ३४९
( ६६ )
समान तथा हीन व्यक्तियों के
सम्बोधन शब्द ( ८ ) ३४९
सेवक के लिये सम्बोधन शब्द
( ९-१० ) ३४९
समान अवस्थावालों के सम्बोधन
शब्द ( १० ) ३५०
सूत का रथी को सम्बोधन ( ११ ) ३५१
सेवकों का राजकुमार को सम्बोधन
( १२ ) ३५१
सामान्य सम्बोधन नियम
( १३-१८ ) ३५१
स्त्रियों के पति के प्रति सम्बोधन
( १९-२० ) ३५२
स्त्रियों के सम्बोधन ( २१-२२ ) ३५३
महारानी के प्रति सम्बोधन
( २३-२४ ) ३५३
राजकुमारी के लिये सम्बोधन
( २५ ) ३५४
ब्राह्मणी, भिक्षुणी आदि के
सम्बोधन ( २६ ) ३५४
पत्नी के प्रति सम्बोधन ( २७ ) ३५४
वेश्या के प्रति सम्बोधन ( २८ ) ३५५
प्रणयदशा में पत्नी को सम्बोधन
( २९ ) ३५५
नाटक में पात्रों के नामविधान
( ३०-३७ ) ३५५
पाठ्यविधान ( ३७-३८ ) ३५७
पाठ्य के गुण एवं स्वरूप ३५८
विभिन्न रसों के अनुकूल स्वर-
विधान ( ३८-४० ) ३५८
स्वरों के त्रिविधस्थान तथा उनके
उपयोग ( ४०-४२ ) ३५८
चार वर्ण ( स्वर ) तथा उनका
व्यवहार ( ४३ ) ३६०
काकु के दो प्रकार ( ४४ ) ३६०
छः अलङ्कार ( ४५ ) ३६१
अलङ्कारों का विनियोग (४६-५७) ३६१
विभिन्नरसों में नियत काकु
( ५८-५९ ) ३६६
उच्चारण के छः अङ्ग ३६६
विराम और उसका लक्षण
( ६०-६१ ) ३६८
अलंकार तथा विरामों में
हस्तसंचालन विधि (६२-६७) ३६९
कृप्याक्षर और उनका व्यवहार
( ६८-७३ ) ३७१
पाठ्यधर्म ( ७४-७८ ) ३७२
उपर्युक्त पृष्ठ पर मुद्रण अत्यंत धुंधला (under-inked/faded) है (संभवतः यह विषय-सूची का पृष्ठ है, जिसमें बाईं ओर १०५, १०६ आदि संख्याएँ तथा कोष्ठक में संदर्भ दिखाई दे रहे हैं)। स्याही के अत्यधिक हल्के होने के कारण पाठ स्पष्ट रूप से पठनीय नहीं है।
(पृष्ठ पर मुद्रित पाठ अत्यंत क्षीण/अस्पष्ट होने के कारण प्रामाणिक रूप से अपाठ्य है।)
श्रीभरतमुनिप्रणीतं
नाट्यशास्त्रम्
'प्रदीप' हिन्दी-व्याख्योपेतम्
(द्वितीयो भागः)
हरिदाससंस्कृतग्रन्थमाला
ध्वन्यालोकः
संस्कृत-हिन्दी 'दीप्ति'
( प्रथम उद्योत )
अष्टमोऽध्यायः
मुनि जन का प्रश्न :—
ऋषय ऊचुः—
भावानाञ्च रसानाञ्च समुत्थानं यथाक्रमम् ।
त्वत्प्रसादाच्छ्रुतं सर्वमिच्छामो वेदितुं पुनः ॥ १ ॥
नाट्ये कतिविधः कार्यस्तज्ज्ञैरभिनयक्रमः ।
कथं वाभिनयो ह्येष कतिभेदश्च कीर्तितः ॥ २ ॥
हे मुने ! आपकी कृपा से हमने भावों तथा रसों का यथाक्रम उद्गम
(तथा स्वरूप) आदि सुना । अब आप हमें यह बतलावें कि विद्वानों ने
नाट्यप्रयोगों में 'अभिनय' के विभिन्न प्रकारों का क्या स्वरूप कहा है ? यह
कैसे सम्पन्न किया जाता है तथा उसके कितने प्रकार (भेद) हैं ? ॥ १-२ ॥
सर्वमेतद्यथातत्त्वं कथयस्व महामुने ।
यो यथाभिनयो यस्मिन् योक्तव्यः सिद्धिमिच्छता ॥ ३ ॥
हे महामुने ! आप हमें 'अभिनय' के इन सभी प्रकारों को यथावत्
बतलाइये जिन्हें नाट्यप्रयोग में सिद्धि के इच्छुकों द्वारा—जहाँ जिस अभिनय
की अपेक्षा हो उसे वहाँ—किया जा सके ॥ ३ ॥
भरत मुनि का उत्तर :—
तेषां तद्वचनं श्रुत्वा मुनीनां भरतो मुनिः ।
प्रत्युवाच पुनर्वाक्यं चतुरोऽभिनयान् प्रति ॥ ४ ॥
उन मुनियों के प्रश्न को सुन कर अभिनय के चार प्रकारों के विषय में
भरत मुनि उत्तर देने लगे ॥ ४ ॥
अहं वः कथयिष्यामि निखिलेन तपोधनाः ।
यस्मादभिनयो ह्येष विधिवत् समुदाहृतः ॥ ५ ॥
१. भगवन् वक्तुमर्हसि—ग० ।
२. तु—ग० ।
हे मुनिजन ! अब मैं आपको विस्तारपूर्वक उस 'अभिनय' को
बतलाता हूँ जो विधिवत् मुझे प्राप्त हुआ था ॥ ५ ॥
यदुक्तं चत्वारोऽभिनया इति तान् वर्णयिष्यामः¹। अत्राह-अभिनय
इति कस्मात् ? अत्रोच्यते—अभीत्युपसर्गः । णीञित्ययं² धातुः प्राप-
णार्थः । अस्याभिनीत्येवं व्यवस्थितस्य एरजित्यच्प्रत्ययान्तस्य
'अभिनय' इति³ रूपं सिद्धम् । एतच्च धातवर्थवचनेनावधार्यम् ।
अत्र श्लोकौ—
पहिले हमने अभिनय के जिन चार प्रकारों को बतलाया था अब
उन्हीं का वर्णन किया जा रहा है । प्रश्न—इसे 'अभिनय' किस हेतु कहा
गया ? । उत्तर—'अभि' यह उपसर्ग है तथा 'णी' धातु प्रापणार्थक है
जिसमें 'अच्' प्रत्यय लगाया गया है । इस प्रकार 'अभिनय' शब्द के रूप
की सिद्धि होती है । यही 'धातु' तथा उससे सम्बद्ध प्रत्ययादि के संसर्ग
से निष्पन्न 'अभिनय' शब्द का अर्थ है। इस विषय में निम्न दो श्लोक हैं:—
अभिपूर्वस्य णीञ् धातुराभिमुख्यार्थनिर्णये ।
⁵यस्मात् प्रयोगं नयति तस्मादभिनयः स्मृतः ॥ ६ ॥
'अभि' उपसर्गपूर्वक 'णीञ्' धातु से निष्पन्न 'अभिनय' शब्द है। जिसका
अर्थ है कि 'यह मुख्य प्रयोजन की ओर प्रयोग को ले जाता है' अतएव
इसे अभिनय कहते हैं ॥ ६ ॥
अभिनय शब्द का अर्थ :—
विभावयति यस्माच्च नानार्थान् हि प्रयोगतः ।
शाखाङ्गोपाङ्गसंयुक्तस्तस्मादभिनयः स्मृतः ॥ ७ ॥
इसे अभिनय इसीलिए कहा गया है क्योंकि यह अनेक अर्थों को
नाट्य-प्रयोग द्वारा अपने शाखा, अंग तथा उपांग से युक्त होकर बतलाता
है (निर्दिष्ट करता है) ॥ ७ ॥
१. वर्तयिष्यामः—ख० ।
२. णीञ् प्रापणार्थको धातुः—ख, ग० ।
३. इत्येवं—ग० ।
४. धात्वनुवचनेनावधार्यं भवति—ख, ग० ।
५. यस्मात् पदार्थान् नयति—ग० ।
अष्टमोऽध्यायः ३५
अभिनय के चार प्रकार—
चतुर्विधश्चैष भवेन्नाट्यस्याभिनयो द्विजाः ।
अनेकभेदबहुलं नाट्यमस्मिन् प्रतिष्ठितम् ॥ ८ ॥
हे मुनिगण, 'नाट्य' में प्रयुक्त होने वाला यह अभिनय चार प्रकार का
होता है और इसी अभिनय में अनेक प्रकारों से विस्तीर्ण स्वरूप प्राप्त करने
वाला 'नाट्य' स्थित रहता है ॥ ८ ॥
आङ्गिको वाचिकश्चैव ह्याहार्यः सात्त्विकस्तथा ।
ज्ञेयस्त्वभिनयो विप्राश्चतुर्द्धा परिकीर्तितः ॥ ९ ॥
हे मुनियो, इस 'अभिनय' के जो चार प्रकार बतलाए हैं वे हैं—
(१) आंगिक, (२) वाचिक, (३) आहार्य तथा (४) सात्विक ॥ ९ ॥
अभिनय एवं उसके शेष तीन प्रकार—
सात्त्विकः पूर्वमुक्तस्तु भावैश्च सहितो मया ।
अङ्गाभिनयमेवादौ गदतो मे निबोधत ॥ १० ॥
मैंने भावों से युक्त सात्विक पहिले बतला दिए हैं इसलिए अब सर्व-
प्रथम 'अंगाभिनय' कहता हूँ जिसे आप समझिये ॥ १० ॥
अंगाभिनय के तीन भेद—
त्रिविधस्त्वाङ्गिको ज्ञेयः शारीरो मुखजस्तथा ।
तथा चेष्टाकृतश्चैव शाखाङ्गोपाङ्गसंयुतः ॥ ११ ॥
यह 'अंगाभिनय' तीन प्रकार का होता है। वे प्रकार हैं—(१) शारीर,
(२) मुखज (चेहरे पर होने वाले) तथा (३) चेष्टाकृत । ये ही प्रकार
शाखा, अंग तथा उपांग से युक्त हो जाते हैं ॥ ११ ॥
शिरोहस्तकटीवक्षःपार्श्वपादसमन्वितः ।
अङ्गप्रत्यङ्गसंयुक्तः षडङ्गो नाट्यसङ्ग्रहः ॥ १२ ॥
यह नाट्य छः अंगों वाला एवं अंग तथा प्रत्यंग से युक्त होता है।
ये छः अंग हैं—मस्तक, हस्त, वक्षःस्थल, कटिप्रदेश, कोख तथा पैर ॥१२॥
तस्य शिरोहस्तोरःपार्श्वकटीपादतः षडङ्गानि ।
नेत्रभ्रूनासाधरकपोलचिबुकान्युपाङ्गानि ॥ १३ ॥
इस अभिनय के मस्तक, हस्त, वक्षःस्थल, कोख तथा पैर ये छः 'अंग'
१. बाहुल्यं—ग० । २. नाट्यं ह्यस्मिन्—ग० ।
३. मेवातो—ग० । ४. दृष्टः—ग० ।
६ नाट्यशास्त्रम्
कहलाते हैं एवं नेत्र, भौंह, नासिका, ओठ तथा ठुड्डी 'उपांग' (या प्रत्यंग)
कहे जाते हैं ॥ १३ ॥
अस्य शाखा च नृत्तञ्च तथैवाङ्कुर एव च ।
वस्तून्यभिनयस्येह विज्ञेयानि प्रयोक्तृभिः ॥ १४ ॥
प्रयोक्ता जन के द्वारा इसी अभिनय के शाखा, नृत्त तथा 'अङ्कुर'
नामक वस्तुओं को भी जानना चाहिये ॥ १४ ॥
आङ्गिकस्तु भवेच्छाखा ह्यङ्कुरस्सूचना भवेत् ।
अङ्गहारविनिष्पन्नं नृत्तन्तु करणाश्रयम् ॥ १५ ॥
आंगिक अभिनय को 'शाखा' कहते हैं। सूचना या सूच्य अभिनय
को 'अङ्कुर' कहते हैं और अङ्गहारों के द्वारा निष्पन्न होने वाला एवं करणों
पर आश्रित अभिनय 'नृत्त' कहलाता है ॥ १५ ॥
मुखंजेऽभिनये विप्रा नानाभावरसाश्रये ।
शिरसः प्रथमं कर्म गदतो मे निबोधत ॥ १६ ॥
हे मुनिजन ! अब मैं आपको मुख द्वारा होने वाले अभिनय के विषय
में बतलाता हूँ—जो अनेक भाव तथा रसों का उपपादक होता है । इसमें
अब आप सर्वप्रथम 'शिरोऽभिनय' (मस्तक के अभिनय) का स्वरूप जानिये ॥
मस्तकाभिनय—(भेद एवं लक्षण)—
आकम्पितं कम्पितञ्च धुतं विधुतमेव च ।
²परिवाहितमाधूतमवधूतं तथाञ्चितम् ॥ १७ ॥
निहञ्चितं परावृत्तमुत्क्षिप्तञ्चाप्यधोगतम् ।
लोलितञ्चेति विज्ञेयं त्रयोदशविधं शिरः ॥ १८ ॥
'शिर' की मुद्राएं १३ हैं। इनके नाम हैं—आकम्पित, कम्पित,
धुत, विधुत, परिवाहित, आधूत, अवधूत, अञ्चित, निहञ्चित, परावृत्त,
उत्क्षिप्त, अधोगत तथा लोलित ॥ १७-१८ ॥
१. 'संगीतरत्नाकर' में 'शाखा' तथा 'अङ्कुर' का अन्य लक्षण इस प्रकार
दिया हुआ है—
'अत्र शाखेति विख्याता विचित्रा करवर्तना ।
अंकुरो भूतवाक्यार्थमुपजीव्य प्रवर्तिता ।
वर्तना सा भवेत् सूची भाविवाक्योपजीवनात्' ॥
( स० २०७-३७, ३८ )
१. मुखानभिनये—ख० । २. परिवाहितोद्वाहितक—ग० ।
अष्टमोऽध्यायः
शनैराकम्पनादूर्ध्वमधश्चाकम्पितं भवेत् ।
द्रुतन्तदेव बहुशः कम्पितं कम्पितं शिरः ॥ १९ ॥
ऊपर तथा नीचे की ओर धीरे-धीरे मस्तक के हिलाने को 'आकम्पित'
तथा उसी को यदि अनेक बार द्रुत गति में कम्पित किया जाय तो
'कम्पित' कहलाता है ॥ १६ ॥
[ ऋजुस्थितस्य चोर्ध्वाधःक्षेपादाकम्पितं भवेत् ।
बहुशश्चलितं यच्च तत् कम्पितमिहोच्यते ॥ ]
[ मस्तक को अपनी सीधी स्थिति में रखकर ऊपर तथा नीचे की
ओर ले जाना 'आकम्पित' तथा उसे अनेक बार कम्पित किये जाने पर
'कम्पित' कहलाता है । ]
संज्ञोपलम्भप्रश्नेषु स्वभावाभाषणे तथा ।
'निर्देशावाहने चैव भवेदाकम्पितं शिरः ॥ २० ॥
इशारा करने, उपदेश देने ( उपलम्भ ), प्रश्न करने, दैनिक सम्भाषण
में सम्बोधित करने ( या स्वाभाविक रूप से संभाषण करने ), आज्ञा प्रदान
करने तथा बुलाने में 'आकम्पित' मस्तक का प्रयोग करना चाहिए ॥ २० ॥
रोषे वितर्के विज्ञाने प्रतिज्ञानेऽथ तर्जने ।
प्रश्नातिशयवाक्येषु शिरः कम्पितमिष्यते ॥ २१ ॥
क्रोध, वितर्क, विज्ञान (किसी वस्तु की विशेषता) के समझने, प्रतिज्ञा
करने, तर्जन करने, अतिशय प्रश्न करने (अन्य पाठान्तर के अनुसार, व्याधि
तथा क्रोध करने) में 'कम्पित' मस्तक का प्रयोग करना चाहिये ॥ २१ ॥
शिरसो रेचनं सम्यक्छनैस्तद्धुतमिष्यते ।
द्रुतमारेचनादेतद्विधुतं तुं भवेच्छिरः ॥ २२ ॥
मस्तक का धीरे-धीरे हिलाना 'धुत' तथा इसे ही यदि तीव्रता से
हिलाया जाए तो 'विधुत' कहलाता है ॥ २२ ॥
अनीप्सिते विषादे च विस्मये प्रत्यये तथा ।
पार्श्वावलोकने शून्ये प्रतिषेधे धुतं शिरः ॥ २३ ॥
अनिच्छा, विषाद, विस्मय, विश्वास, कोखों के अवलोकन (पार्श्ववलोकन),
शून्यता तथा प्रतिषेध में 'धुत' का विनियोजन करना चाहिए ॥ २३ ॥
१. निर्देश वाहने—ग० । २. प्रतिज्ञातेऽथ—ग० ।
३. व्याध्यमर्षणयोश्चैव—ग० । ४. यत्तु शनैः—ग० ।
५. मुच्यते—ख० । ६. च—ख० ।
नाट्यशास्त्रम्
शीतग्रस्ते भयार्ते च त्रासिते ज्वरिते तथा ।
पीतमात्रे तथा मद्ये विधुतं तु भवेच्छिरः ॥ २४ ॥
शीत से ग्रस्त, भय से पीड़ा होने, त्रास, ज्वर की अवस्था तथा मद्यपान
की प्रथमावस्था में 'विधुत' की योजना करनी चाहिए ॥ २४ ॥
पर्यायशः पार्श्वगतं शिरः स्यात् परिवाहितम् ।
औधूतमुच्यते तिर्यक् सकृदुद्गाहितन्तु यत् ॥ २५ ॥
यदि दोनों पाश्र्वों की ओर मस्तक को क्रमशः कम्पित किया जाए तो
'परिवाहित' तथा जब यह तिरछा तथा एक बार ही कम्पित किया जाय
तो 'आधूत' कहलाता है ॥ २५ ॥
साधने विस्मये हर्षे स्मृते चामर्षिते तथा ।
विचारे विह्नते चैव लीलायां परिवाहितम् ॥ २६ ॥
साधन, विस्मय, प्रसन्नता, स्मरण, क्रोध, विचार, भावगोपन तथा लीला-
पूर्वक क्रीड़ा में 'परिवाहित' मस्तकाभिनय की योजना करनी चाहिए ॥२६॥
गर्वैच्छादर्शने चैव पार्श्वस्थोर्ध्वनिरीक्षणे ।
आधूतन्तु शिरो ज्ञेयमात्मसम्भावनादिषु ॥ २७ ॥
गर्व की भावना में, पर्वविशेष पर (पौर्णमासी इत्यादि के अवसर पर
चन्द्रादि को) ऊपर की ओर देखने ('पार्श्वस्थोर्ध्वनिरीक्षणे' पाठ के
अनुसार ) तथा आत्म-सम्मान बतलाने में 'आधूत' मस्तकाभिनय की
योजना करे ॥ २७ ॥
यदधः सकृदाक्षिप्तमवधूतन्तु तच्छिरः ।
संन्देशावाहनालोपसंज्ञादिषु तदिष्यते ॥ २८ ॥
यदि मस्तक को नीचे की ओर एक बार कम्पित किया जाए तो 'अवधूत'
कहलाता है। इसकी योजना सन्देश देने, (देवता के) आवाहन करने,
अलुप्त होने ('वाहनालोप' पाठ के अनुसार) तथा किसी व्यक्ति को
(समीप आने के हेतु) संकेत करने में की जाती है ॥ २८ ॥
१. त्वरिते—ख० ।
२. पर्यायतः—ग० । ३. सकृदुद्ग्राहितं चोध्वर्मुद्ग्राहितमिति स्मृतम्—ग० ।
४. स्थिते—ग० । ५. निह्नुते—ख०, विस्मृते—ग० ।
६. गर्वातिमदर्शने—ख० । ७. वाहनालाप—ख०, ग० ।
यत् कुंचितभूलतं मनाक्' के अनुसार अर्थ होगा—
Wait, is it "कुंचितभूलतं" or "कुञ्चितभूलतं"?
In line 13: "कुंचितभूलतं" - with anusvara: कुं, चि, त, भू, ल, तं.
Wait, look at 'भूलतं' or 'भ्रूलतं'?
Is there an 'r' under 'भ'?
Look at line 13: "कुंचितभ्रूलतं" -> yes, look at the stroke on भ: भ्रू! It's भ्रूलतं (eyebrows like creepers, bhrūlatam)!
Yes, "कुंचितभ्रूलतं मनाक्" - bhrūlatā makes complete sense in Natyashastra!
Let's check line 14:
"यदि दोनों कन्धे कोऊपर की ओर उठाकर एक बार भौंहों को संकुचित"
Wait, is it "कोऊपर" or "को ऊपर"?
Look at "कोऊपर": there is almost no space, but let's check if 'को' and 'ऊपर' are separate or merged:
'को' has its own shirorekha, 'ऊपर' has its own:
Wait, 'ऊ' does not connect to 'को' with shirorekha because 'ऊ' doesn't have a top bar on the left, but does the shirorekha continue?
No, Devnag
१० नाट्यशास्त्रम्
उत्क्षिप्तञ्चापि विज्ञेयमुन्मुखावस्थितं शिरः ।
प्रांशु दिव्यास्त्रंयोगेषु स्यादुत्क्षिप्तं प्रयोगतः ॥ ३३ ॥
यदि मस्तक ऊपर की ओर देखते हुए स्थित हो तो 'उत्क्षिप्त'
कहलाता है। इसका प्रयोग ऊँची वस्तु तथा दिव्य-अस्त्र की प्राप्ति (करने)
में किया जाएँ ॥ ३३ ॥
२अवाङ्मुखस्थितञ्चापि बुधाः प्राहुरधोगतम् ।
लज्जायाञ्च प्रणामे च दुःखे चाधोगतं शिरः३ ॥ ३४ ॥
यदि चेहरे को (सिर सहित) नीचे की ओर झुका लिया जाए तो
'अधोगत' कहलाता है। इसकी योजना लज्जा, प्रणाम करने तथा दुःख
प्रकट करने में की जाए ॥ ३४ ॥
सर्वतोभ्रमणाच्चैव शिरो लोलितमुच्यते ।
मूर्च्छाव्याधिमदावेश५ग्रहनिद्रादिषु स्मृतम् ॥ ३५ ॥
यदि मस्तक को चारों ओर घुमाया जाए तो 'लोलित' (पाठान्तर
'परिलोलित') कहलाता है। इसकी योजना मूर्च्छा, व्याधि, मद, आवेश,
भूत आदि ग्रहों से आविष्ट होने तथा निद्रा आदि में की जाए ॥ ३५ ॥
एभ्योऽन्ये बहवो भेदा लोकाभिनयसंश्रयाः ।
ते च लोकस्वभावेन प्रयोक्तव्याः प्रयोक्तृभिः ॥ ३६ ॥
इसके अतिरिक्त मस्तक के अन्य अनेक भेद हो सकते हैं जो सामान्य
लोकाभिनय के आधार पर बनते हैं। उनका लोक-प्रकृति के अनुसार
यथोचित प्रयोग करना चाहिए ॥ ३६ ॥
त्रयोदशविधं ह्येतच्छिरः७कर्म मयोदितम् ।
अतः परं प्रवक्ष्यामि दृष्टीनामपि लक्षणम् ॥ ३७ ॥
इस प्रकार मैंने मस्तक की तेरह (मुद्राएँ या) भेद बतलाए। अब मैं
दृष्टियों के भेद तथा लक्षण बतलाता हूँ ॥ ३७ ॥
१ दिव्यार्थ—ख०
२. अधोमुखं स्थितञ्चापि शिरः प्राहुरधोमुखम्—ख०; अधोमुखं स्थितं—ग०।
३. भवेत्—ग० ।
४. लोलनाच्चापि शिरः स्यात् परिलोलितम्—ख-ग० ।
५. मदावेग—ग० । ६. संश्रिताः—ग० ।
७. शिरकर्म—ग० । ८. मिह—ल० ।
अष्टमोऽध्यायः ९१
दृष्टियों के प्रकार—
कान्ता भयानका हास्या करुणा चाद्भुता तथा ।
रौद्री वीरा च बीभत्सा विज्ञेया रसदृष्टयः ॥ ३८ ॥
रस की अभिव्यक्ति करने वाली ये दृष्टियाँ हैं—कान्ता, भयानका,
हास्या, करुणा, अद्भुता, रौद्री, वीरा तथा बीभत्सा (इन्हें रसदृष्टियाँ
कहते हैं) ॥ ३८ ॥
स्निग्धा हृष्टा च दीना च क्रुद्धा दृप्ता¹ भयान्विता ।
जुगुप्सिता विस्मिता च स्थायिभावेषु दृष्टयः ॥ ३९ ॥
स्थायि भावों में प्रयुक्त होने वाली दृष्टियाँ हैं—स्निग्धा, हृष्टा, दीना,
दृप्ता, भयान्विता, जुगुप्सिता तथा विस्मिता ॥ ३६ ॥
शून्या च मलिना चैव श्रान्ता लज्जान्विता तथा ।
ग्लाना च शङ्किता चैव विषण्णा मुकुला तथा ॥ ४० ॥
कुञ्चिता चाभितप्ता² च जिह्मा सल्ललिता तथा ।
वितर्किताऽर्धमुकुला विभ्रान्ता विप्लुता तथा ॥ ४१ ॥
आकेकरा विकोशा च त्रस्ता³ च मदिरा तथा ।
षट्त्रिंशद् दृष्टयो ह्येता नामतोऽभिहिता मया⁴ ॥ ४२ ॥
संचारी भावों में उपयोगी दृष्टियाँ ये हैं :—शून्या, मलिना, श्रान्ता,
लज्जान्विता, ग्लाना, शंकिता, विषण्णा, मुकुला, कुंचिता, अभितप्ता, जिह्मा,
ललिता, वितर्किता, अर्धमुकुला, विभ्रान्ता, विप्लुता, आकेकरा, विकोशा,
त्रस्ता तथा मदिरा । इस प्रकार सभी मिलाकर ये दृष्टियाँ ३६ हो जाती
हैं, जिनके मैंने नाम यहाँ बतलाए हैं ॥ ४०-४२ ॥
अस्य दृष्टिविधानस्य नानाभावरसाश्रयम् ।
लक्षणं सम्प्रवक्ष्यामि यथाकर्मप्रयोगतः ॥ ४३ ॥
अब मैं इन दृष्टियों के अनेक रस तथा भावों के आश्रित (अभिव्यंजक)
कर्म तथा प्रयोगों के अनुसार लक्षण बतलाता हूँ ॥ ४३ ॥
रसाभिव्यंजक दृष्टियाँ (लक्षण एवं प्रयोग)—
हर्षप्रसादजनिता⁵ कान्तात्यर्थं समन्मथा ।
सभ्रूक्षेपकटाक्षा च शृङ्गारे दृष्टिरिष्यते ॥ ४४ ॥
जब अतिशय स्नेह (राग) में आविष्ट व्यक्ति भौंहें और कटाक्षपूर्ण
१. दम्भा—ख० । २. साभिमाना—ख०, ग० । ३. त्रस्ताथ—ग० ।
४. स्तासु नाट्यं प्रतिष्ठितम्—क०। ५. जनितकोपामर्ष—ख० ।
९२ नाट्यशास्त्रम्
दृष्टि से देखे तो हर्ष और प्रसाद (मनोविनोद) से उद्भूत ऐसी दृष्टि 'कान्ता'
कहलाती है। इसका प्रयोग शृङ्गाररस में किया जाए ॥ ४४ ॥
प्रोद्वृत्तनिष्पन्धपुटा स्फुरदुद्वृत्ततारका।
दृष्टिर्भयानकात्यर्थं भीता ज्ञेया भयानके ॥ ४५ ॥
जिसमें पलकों को ऊपर उठाकर स्थिर कर दिया जाए और पुतलियों
को ऊपर की ओर चमकाते हुए गोल घुमाव दिया जाए तो 'भयानका' दृष्टि
होती है। यह अतिशय भय को सूचित करती है और इसका प्रयोग
'भयानकरस' में किया जाता है ॥ ४५ ॥
क्रमादाकुञ्चितपुटा सविभ्रान्ताल्पतारका।
हास्या दृष्टिस्तु कर्त्तव्या कुहकाभिनयं प्रति ॥ ४६ ॥
'हास्या' दृष्टि में दोनों पलकें क्रमशः सिकुड़ी हुई रहती हैं और ये
पुतलियों के साथ थोड़ी खुली तथा घूमती हुई (विभ्रान्त) रखी जाती
हैं। इसका प्रयोग गुदगुदाने या छू कर हंसाने के प्रदर्शन के अवसर पर
किया जाए ॥ ४६ ॥
पतितोर्ध्वपुटा सास्रा मन्युमन्थरतारका।
नासाग्रानुगता दृष्टिः करुणा करुणे रसे ॥ ४७ ॥
जिसमें दोनों उपरी पलकें नीचे की ओर आ रही हों, क्रोध के कारण
पुतलियाँ धीमी हो गई हों, आँखों से आँसू ढलकते हों तथा नासिका की
नोक पर दृष्टि स्थित हो तो उसे 'करुणा' दृष्टि समझना चाहिए। इसका
'करुणरस' में प्रयोग होता है ॥ ४७ ॥
या त्वाकुञ्चितपक्ष्माग्रा साश्चर्योद्वृत्ततारका।
सौम्या विकसितान्ता च साद्भुता दृष्टिरद्भुते ॥ ४८ ॥
जिस (दृष्टि) में बरौनियाँ नोक पर थोड़ी सिकुड़ी हुई रहें, पुतलियाँ
आश्चर्य से ऊपर की ओर उठी हुई रहें और आँखें खिली हुई दशा को
सुन्दरतापूर्वक प्रदर्शित करें तो उसे 'अद्भुता' दृष्टि जानो। इसे अद्भुत-
रस में प्रयुक्त किया जाए ॥ ४८ ॥
क्रूरा रूक्षारुणोद्वृत्ता निष्पन्धपुटतारका।
भ्रुकुटीकुटिला दृष्टिः रौद्री रौद्ररसे स्मृता ॥ ४९ ॥
१. भयानकेत्यर्थं हीना ज्ञेया भयानका—क०।
२. विभ्रान्ताकुलतारका—ग ३ चकितो, प्रतीतो—क०।
४. रौद्री रौद्रे प्रकीर्तिता—क, रौद्रे रौद्री रसा स्मृता—ग०।
अष्टमोऽध्यायः १३
ऐसी क्रूर-दृष्टि जिसमें पुतलियाँ रूखी, लाल तथा घूमने वाली
हों, पलकें स्थिर हों तथा भ्रुकुटी टेढ़ी हों तो ऐसी दृष्टि 'रौद्री' कहलाती
है। इसका प्रयोग रौद्ररस में किया जाए ॥ ४९ ॥
दीप्ता विकसिता क्षुब्धा गम्भीरा समतारका।
उत्फुल्लमध्या दृष्टस्तु वीरा वीररसाश्रया ॥ ५० ॥
जो दृष्टि चमकीली, फैली हुई, क्षुब्ध गम्भीर हो, पुतलियाँ बीच में
स्थित हों तथा जिसका मध्यभाग खिला हुआ हो तो (यह) 'वीरा'
दृष्टि कहलाती है। इसे वीर रस में प्रयुक्त किया जाता है ॥ ५० ॥
निकुञ्चितपुटापाङ्गा घूर्णोपप्लुततारका।
संश्लिष्ट१स्थिरपद्मा च बीभत्सा दृष्टिरिष्यते ॥ ५१ ॥
जिसमें पलकों से नेत्रों के कोने ढंक लिये गए हों, पुतलियाँ घुमाव के
कारण दबी (उपप्लुत) या विघ्नित हों और बरौनियाँ एक दूसरे से मिली
हुई और स्थिर हों तो (यह) 'बीभत्सा' दृष्टि कहलाती है
१४ नाट्यशास्त्रम्
पुतलियाँ स्थिर हों तो आनन्द-जन्य अश्रुओं से पूर्ण ऐसी दृष्टि 'स्निग्धा'
कहलाती है। इसका 'रति' नामक स्थायी भाव में प्रयोग करना चाहिए ॥
चला हसितगर्भा च विशत्तोरानिमेषिणी ।
किञ्चिदाकुञ्चिता हृष्टा दृष्टिर्हासे प्रकीर्तिता ॥ ५४ ॥
जिसमें दृष्टि घूमने वाली (चंचल) हो, पलकें थोड़ी सी लगती हुई
रहें और जिसकी पुतलियाँ पूर्णरूप से देखने योग्य न रह गई हों, पलक
गिरती न हों तथा वे थोड़ी सिकुड़ी हुई हो तो ऐसी 'हृष्टा' दृष्टि कहलाती
है। यह 'हास' नामक स्थायीभाव में प्रयुक्त होती है ॥ ५४ ॥
अर्धस्रस्तोत्तरपुटा ३किञ्चित्संरब्धतारका ।
मन्दसञ्चारिणी दीना सा शोके दृष्टिरिष्यते ॥ ५५ ॥
जिस (दृष्टि) में ऊपरी पलक थोड़ी झुकी रहें, पुतलियाँ (थोड़ी)
रुकी (ढंकी) हुई रहें और जिसका हलन-चलन मन्द गति से हो रहा हो तो
उसे 'दीना' दृष्टि जानो। इसका प्रयोग 'शोक' स्थायीभाव में किया जाए ॥
रूक्षा स्थिरोद्वृत्तपुटा निष्पन्दोद्वृत्ततारका ।
कुटिलैर्भ्रुकुटी दृष्टिः क्रुद्धा क्रोधे विधीयते ॥ ५६ ॥
जो दृष्टि रूखी हो जिसमें पलकें ऊपर की ओर तथा गतिहीन हो पुत-
लियाँ ऊपर की ओर घूमने वाली तथा स्थिर हों और भ्रुकुटी टेढ़ी हो तो
उसे 'क्रुद्धा' दृष्टि जानो। इसका प्रयोग 'क्रोध' स्थायीभाव में किया जाए ॥
संस्थिते तारके यस्याः स्थिराँ विकसिता तथा ।
सत्त्वमुद्गिरती दृप्ता दृष्टिरुत्साहसम्भवा ॥ ५७ ॥
जिस दृष्टि में आंखे स्थिर और पूरी तरह फैली हो, पुतलियाँ स्तब्ध
हों तथा जिससे सत्व प्रकट हो रहा तो उसे 'दृप्ता' दृष्टि जानो। इसका
प्रयोग 'उत्साह' स्थायी भाव में किया जाए ॥ ५७ ॥
विस्फारितोभयपुटा भयकम्पिततारका ।
निष्क्रान्तमध्या दृष्टिस्तु भयभावे भयान्विता ॥ ५८ ॥
जिसमें आँखों की पुट पूरी तरह फैली हों, पुतलियाँ भय से काँप रही
१. विशत्ताराभिलाषिणी—ख०; विश्वतारानिमेषिणी—ग० ।
२. अर्धस्रस्तो—ख०; ईषत्तस्रस्तो—ग० ।
३. रुद्धतारा जलाविला—क–ख० ।
४. रुच्यते—क० । ५. कुटिला—ग० । ६. स्थिता—ग०
अष्टमोऽध्यायः १५
हों और जो बीच के स्थान से थोड़ी हटकर रखी जाए तो वह 'भयान्विता'
दृष्टि जानो। इसका प्रयोग 'भय' नामक स्थायी भाव में किया जाए ॥५८॥
सङ्कोचितपुटाध्यामा दृष्टिर्मीलिततारका।
लक्ष्योद्देशात् समुद्विग्ना जुगुप्सायां जुगुप्सिता ॥ ५९ ॥
जिसमें पलकें सिकुड़ी और परस्पर न मिलती हों, पुतलियाँ घूमती हों
और वे (दृष्टि में आने वाले) लक्ष्य से लौटने वाली रखी जाए तो उसे
'जुगुप्सिता' दृष्टि जानो। इसका प्रयोग 'जुगुप्सा' स्थायी भाव में किया जाए ॥
भृशमुद्वृत्ततारात्र नैष्ठोभयपुटाञ्चिता ।
समा विकसिता दृष्टिर्विस्मिता विस्मये स्मृता ॥ ६० ॥
जो बराबर खुली (या फैली) हुई हो, जिसमें पुतलियाँ ऊपर की ओर
घुमाव लेती हुई और पलके स्थिर हों तो 'विस्मिता' दृष्टि जानो। इसका
प्रयोग 'विस्मय' स्थायी भाव में किया जाए ॥ ६० ॥
स्थायिभावाश्रया ह्येता विज्ञेया दृष्टयो बुधैः।
सञ्चारिणीनां दृष्टीनां सम्प्रवक्ष्यामि लक्षणम् ॥ ६१ ॥
ये दृष्टियाँ स्थायी भावों की हैं। अब संचारी भावों में होने वाली
दृष्टियों के लक्षण बतलाता हूँ ॥ ६१ ॥
संचारी भावों की अभिव्यंजक दृष्टियाँ—
समतारा समपुटा निष्कम्पा शून्यदर्शना।
बाह्यार्थाग्राहिणी क्षामा शून्या दृष्टिः प्रकीर्तिता ॥ ६२ ॥
जो क्षीण तथा स्थिर दृष्टि हो जिसमें पुतलियां और पलकें सम हों
और अपने स्थान पर ही लौटने वाली होकर जो किसी भी बाह्य-पदार्थ को
ग्रहण न करें तो उसे 'शून्या' दृष्टि जानो ॥ ६२ ॥
प्रस्पन्दमानपक्ष्मौन्ता नात्यर्थमुकुलैः पुटैः ।
मलिनान्ता च मलिना दृष्टिर्विह्वंततारका ॥ ६३ ॥
जिसकी बरौनियां घूजती हों, जिसमें पलकें अतिशय सिकुड़ी हुई न
१. पुटश्यामा—क, पुटन्यासा—ख०, ग० । २. पक्ष्मोद्देशात् ग० ।
३. विमलोद्वृत्त—ग० । ४. दृष्टोभय—ख०-ग० ।
५. दृष्टयो लक्षिता मया—ख० । ६. बाह्यार्थग्राहिणी ख-ग० ।
७. ध्यामा—क० श्यामा—ख० । ८. प्रस्यन्दमान—ख-ग० ।
९. पक्ष्मा या—क० पक्ष्माग्रा—क० । १०. विभ्रान्त—क; विस्मित—ख-ग० ।
१६ नाट्यशास्त्रम्
रहें, आँखों के कोने मलिनता लिए हों और जिसमें पुतलियां घूमती न रहें
( विहततारका ) तो उसे 'मलिना' दृष्टि जानो ॥ ६३ ॥
श्रमात्¹ प्रम्लापितपुटा ²क्षामान्ताञ्चितलोचना ।
स्रस्ता पतिततारा च श्रान्ता दृष्टिः प्रकीर्तिता ॥ ६५ ॥
श्रम के कारण जिसकी पलकें म्लान हो गई हों, आंखों के कोने सिकुड़
गए हों, दृष्टि निर्बल हो (जिसकी) पुतलियां नीचे झुकी हों, तो उसे
'श्रान्ता' दृष्टि कहते हैं ॥ ६४ ॥
किञ्चिदञ्चितपक्ष्मग्रा पतितोर्ध्वपुटक्रिया ।
त्रपाधोगततारा च दृष्टिर्लज्जान्विता तु सा ॥ ६५ ॥
जिसमें बरौनियों के अग्र भाग थोड़े झुके रहें, भीरुता से उपरी पलकें
नीचे की ओर हों और पुतलियां लज्जा से झुकी हों तो उसे 'लज्जान्विता'
दृष्टि जानो ॥ ६५ ॥
म्लानभ्रूपुटपक्ष्मा⁵ या शिथिला मन्दचारिणी ।
क्लमप्र⁷विष्टतारा च ग्लाना दृष्टिस्तु सा स्मृता ॥ ६६ ॥
जिसमें भौंहें, पलकें तथा बरौनियां म्लान हों, धीरे धीरे घूमती हों
और पुतलियां श्रम के कारण पलकों में ढँकी रहें तो उसे 'ग्लाना' दृष्टि
जानो ॥ ६६ ॥
किञ्चिच्चला स्थिरा किञ्चिदुद्वृत्ता⁸ तिर्यगायता ।
गूढा⁹ चकिततारा च शङ्किता दृष्टिरिष्यते ॥ ६७ ॥
जो दृष्टि कभी हिलती हो कभी स्थिर रहती हो कभी ऊपर कभी
तिरछी और कभी विस्तृत फैली हो, जो कभी गूढ़ हो जाए और जिसमें
पुतलियां भयभीत (या चकित) लगती हों तो उसे 'शंकिता' दृष्टि जानो ॥
विषादविस्तीर्णपुटा पर्यस्तं१०न्ता निमेषिणी ।
किञ्चित्स्निग्धतारा च कार्या दृष्टिर्विषादिनी ॥ ६८ ॥
जो दृष्टि व्यग्र हो, जिसमें विषाद के कारण पलकें फैली हों, नेत्रों के
१. श्रमप्रम्लायित-क, श्रमप्रम्ला-ख-ग० । २. क्षामाका-ख० ।
३. पतितोध्र्वंपुटा ह्रिया-ग० ४. त्रपाधोमुख-ग० ।
५. ग्लान-ग० । ६. च-ग० ।
७. क्रमप्रदृष्ट-क; क्लमप्रवृष्ट-ग० । ८. उत्तुङ्गा-क०, दुन्नता-ख० ।
९. मूढा-क । १०. पर्यस्तारा-ग० ।