नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 118, कुल 668 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टमोऽध्यायः
शनैराकम्पनादूर्ध्वमधश्चाकम्पितं भवेत् ।
द्रुतन्तदेव बहुशः कम्पितं कम्पितं शिरः ॥ १९ ॥
ऊपर तथा नीचे की ओर धीरे-धीरे मस्तक के हिलाने को 'आकम्पित'
तथा उसी को यदि अनेक बार द्रुत गति में कम्पित किया जाय तो
'कम्पित' कहलाता है ॥ १६ ॥
[ ऋजुस्थितस्य चोर्ध्वाधःक्षेपादाकम्पितं भवेत् ।
बहुशश्चलितं यच्च तत् कम्पितमिहोच्यते ॥ ]
[ मस्तक को अपनी सीधी स्थिति में रखकर ऊपर तथा नीचे की
ओर ले जाना 'आकम्पित' तथा उसे अनेक बार कम्पित किये जाने पर
'कम्पित' कहलाता है । ]
संज्ञोपलम्भप्रश्नेषु स्वभावाभाषणे तथा ।
'निर्देशावाहने चैव भवेदाकम्पितं शिरः ॥ २० ॥
इशारा करने, उपदेश देने ( उपलम्भ ), प्रश्न करने, दैनिक सम्भाषण
में सम्बोधित करने ( या स्वाभाविक रूप से संभाषण करने ), आज्ञा प्रदान
करने तथा बुलाने में 'आकम्पित' मस्तक का प्रयोग करना चाहिए ॥ २० ॥
रोषे वितर्के विज्ञाने प्रतिज्ञानेऽथ तर्जने ।
प्रश्नातिशयवाक्येषु शिरः कम्पितमिष्यते ॥ २१ ॥
क्रोध, वितर्क, विज्ञान (किसी वस्तु की विशेषता) के समझने, प्रतिज्ञा
करने, तर्जन करने, अतिशय प्रश्न करने (अन्य पाठान्तर के अनुसार, व्याधि
तथा क्रोध करने) में 'कम्पित' मस्तक का प्रयोग करना चाहिये ॥ २१ ॥
शिरसो रेचनं सम्यक्छनैस्तद्धुतमिष्यते ।
द्रुतमारेचनादेतद्विधुतं तुं भवेच्छिरः ॥ २२ ॥
मस्तक का धीरे-धीरे हिलाना 'धुत' तथा इसे ही यदि तीव्रता से
हिलाया जाए तो 'विधुत' कहलाता है ॥ २२ ॥
अनीप्सिते विषादे च विस्मये प्रत्यये तथा ।
पार्श्वावलोकने शून्ये प्रतिषेधे धुतं शिरः ॥ २३ ॥
अनिच्छा, विषाद, विस्मय, विश्वास, कोखों के अवलोकन (पार्श्ववलोकन),
शून्यता तथा प्रतिषेध में 'धुत' का विनियोजन करना चाहिए ॥ २३ ॥
१. निर्देश वाहने—ग० । २. प्रतिज्ञातेऽथ—ग० ।
३. व्याध्यमर्षणयोश्चैव—ग० । ४. यत्तु शनैः—ग० ।
५. मुच्यते—ख० । ६. च—ख० ।