नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६६ )
समान तथा हीन व्यक्तियों के
सम्बोधन शब्द ( ८ ) ३४९
सेवक के लिये सम्बोधन शब्द
( ९-१० ) ३४९
समान अवस्थावालों के सम्बोधन
शब्द ( १० ) ३५०
सूत का रथी को सम्बोधन ( ११ ) ३५१
सेवकों का राजकुमार को सम्बोधन
( १२ ) ३५१
सामान्य सम्बोधन नियम
( १३-१८ ) ३५१
स्त्रियों के पति के प्रति सम्बोधन
( १९-२० ) ३५२
स्त्रियों के सम्बोधन ( २१-२२ ) ३५३
महारानी के प्रति सम्बोधन
( २३-२४ ) ३५३
राजकुमारी के लिये सम्बोधन
( २५ ) ३५४
ब्राह्मणी, भिक्षुणी आदि के
सम्बोधन ( २६ ) ३५४
पत्नी के प्रति सम्बोधन ( २७ ) ३५४
वेश्या के प्रति सम्बोधन ( २८ ) ३५५
प्रणयदशा में पत्नी को सम्बोधन
( २९ ) ३५५
नाटक में पात्रों के नामविधान
( ३०-३७ ) ३५५
पाठ्यविधान ( ३७-३८ ) ३५७
पाठ्य के गुण एवं स्वरूप ३५८
विभिन्न रसों के अनुकूल स्वर-
विधान ( ३८-४० ) ३५८
स्वरों के त्रिविधस्थान तथा उनके
उपयोग ( ४०-४२ ) ३५८
चार वर्ण ( स्वर ) तथा उनका
व्यवहार ( ४३ ) ३६०
काकु के दो प्रकार ( ४४ ) ३६०
छः अलङ्कार ( ४५ ) ३६१
अलङ्कारों का विनियोग (४६-५७) ३६१
विभिन्नरसों में नियत काकु
( ५८-५९ ) ३६६
उच्चारण के छः अङ्ग ३६६
विराम और उसका लक्षण
( ६०-६१ ) ३६८
अलंकार तथा विरामों में
हस्तसंचालन विधि (६२-६७) ३६९
कृप्याक्षर और उनका व्यवहार
( ६८-७३ ) ३७१
पाठ्यधर्म ( ७४-७८ ) ३७२