नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६ नाट्यशास्त्रम्
कहलाते हैं एवं नेत्र, भौंह, नासिका, ओठ तथा ठुड्डी 'उपांग' (या प्रत्यंग)
कहे जाते हैं ॥ १३ ॥
अस्य शाखा च नृत्तञ्च तथैवाङ्कुर एव च ।
वस्तून्यभिनयस्येह विज्ञेयानि प्रयोक्तृभिः ॥ १४ ॥
प्रयोक्ता जन के द्वारा इसी अभिनय के शाखा, नृत्त तथा 'अङ्कुर'
नामक वस्तुओं को भी जानना चाहिये ॥ १४ ॥
आङ्गिकस्तु भवेच्छाखा ह्यङ्कुरस्सूचना भवेत् ।
अङ्गहारविनिष्पन्नं नृत्तन्तु करणाश्रयम् ॥ १५ ॥
आंगिक अभिनय को 'शाखा' कहते हैं। सूचना या सूच्य अभिनय
को 'अङ्कुर' कहते हैं और अङ्गहारों के द्वारा निष्पन्न होने वाला एवं करणों
पर आश्रित अभिनय 'नृत्त' कहलाता है ॥ १५ ॥
मुखंजेऽभिनये विप्रा नानाभावरसाश्रये ।
शिरसः प्रथमं कर्म गदतो मे निबोधत ॥ १६ ॥
हे मुनिजन ! अब मैं आपको मुख द्वारा होने वाले अभिनय के विषय
में बतलाता हूँ—जो अनेक भाव तथा रसों का उपपादक होता है । इसमें
अब आप सर्वप्रथम 'शिरोऽभिनय' (मस्तक के अभिनय) का स्वरूप जानिये ॥
मस्तकाभिनय—(भेद एवं लक्षण)—
आकम्पितं कम्पितञ्च धुतं विधुतमेव च ।
²परिवाहितमाधूतमवधूतं तथाञ्चितम् ॥ १७ ॥
निहञ्चितं परावृत्तमुत्क्षिप्तञ्चाप्यधोगतम् ।
लोलितञ्चेति विज्ञेयं त्रयोदशविधं शिरः ॥ १८ ॥
'शिर' की मुद्राएं १३ हैं। इनके नाम हैं—आकम्पित, कम्पित,
धुत, विधुत, परिवाहित, आधूत, अवधूत, अञ्चित, निहञ्चित, परावृत्त,
उत्क्षिप्त, अधोगत तथा लोलित ॥ १७-१८ ॥
१. 'संगीतरत्नाकर' में 'शाखा' तथा 'अङ्कुर' का अन्य लक्षण इस प्रकार
दिया हुआ है—
'अत्र शाखेति विख्याता विचित्रा करवर्तना ।
अंकुरो भूतवाक्यार्थमुपजीव्य प्रवर्तिता ।
वर्तना सा भवेत् सूची भाविवाक्योपजीवनात्' ॥
( स० २०७-३७, ३८ )
१. मुखानभिनये—ख० । २. परिवाहितोद्वाहितक—ग० ।