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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 115, कुल 668 में से

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पृष्ठ 115

हे मुनिजन ! अब मैं आपको विस्तारपूर्वक उस 'अभिनय' को
बतलाता हूँ जो विधिवत् मुझे प्राप्त हुआ था ॥ ५ ॥
यदुक्तं चत्वारोऽभिनया इति तान् वर्णयिष्यामः¹। अत्राह-अभिनय
इति कस्मात् ? अत्रोच्यते—अभीत्युपसर्गः । णीञित्ययं² धातुः प्राप-
णार्थः । अस्याभिनीत्येवं व्यवस्थितस्य एरजित्यच्प्रत्ययान्तस्य
'अभिनय' इति³ रूपं सिद्धम् । एतच्च धातवर्थवचनेनावधार्यम् ।
अत्र श्लोकौ—
पहिले हमने अभिनय के जिन चार प्रकारों को बतलाया था अब
उन्हीं का वर्णन किया जा रहा है । प्रश्न—इसे 'अभिनय' किस हेतु कहा
गया ? । उत्तर—'अभि' यह उपसर्ग है तथा 'णी' धातु प्रापणार्थक है
जिसमें 'अच्' प्रत्यय लगाया गया है । इस प्रकार 'अभिनय' शब्द के रूप
की सिद्धि होती है । यही 'धातु' तथा उससे सम्बद्ध प्रत्ययादि के संसर्ग
से निष्पन्न 'अभिनय' शब्द का अर्थ है। इस विषय में निम्न दो श्लोक हैं:—
अभिपूर्वस्य णीञ् धातुराभिमुख्यार्थनिर्णये ।
⁵यस्मात् प्रयोगं नयति तस्मादभिनयः स्मृतः ॥ ६ ॥
'अभि' उपसर्गपूर्वक 'णीञ्' धातु से निष्पन्न 'अभिनय' शब्द है। जिसका
अर्थ है कि 'यह मुख्य प्रयोजन की ओर प्रयोग को ले जाता है' अतएव
इसे अभिनय कहते हैं ॥ ६ ॥
अभिनय शब्द का अर्थ :—
विभावयति यस्माच्च नानार्थान् हि प्रयोगतः ।
शाखाङ्गोपाङ्गसंयुक्तस्तस्मादभिनयः स्मृतः ॥ ७ ॥
इसे अभिनय इसीलिए कहा गया है क्योंकि यह अनेक अर्थों को
नाट्य-प्रयोग द्वारा अपने शाखा, अंग तथा उपांग से युक्त होकर बतलाता
है (निर्दिष्ट करता है) ॥ ७ ॥
१. वर्तयिष्यामः—ख० ।
२. णीञ् प्रापणार्थको धातुः—ख, ग० ।
३. इत्येवं—ग० ।
४. धात्वनुवचनेनावधार्यं भवति—ख, ग० ।
५. यस्मात् पदार्थान् नयति—ग० ।