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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 121, कुल 668 में से

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पृष्ठ 121

१० नाट्यशास्त्रम्
उत्क्षिप्तञ्चापि विज्ञेयमुन्मुखावस्थितं शिरः ।
प्रांशु दिव्यास्त्रंयोगेषु स्यादुत्क्षिप्तं प्रयोगतः ॥ ३३ ॥
यदि मस्तक ऊपर की ओर देखते हुए स्थित हो तो 'उत्क्षिप्त'
कहलाता है। इसका प्रयोग ऊँची वस्तु तथा दिव्य-अस्त्र की प्राप्ति (करने)
में किया जाएँ ॥ ३३ ॥
२अवाङ्मुखस्थितञ्चापि बुधाः प्राहुरधोगतम् ।
लज्जायाञ्च प्रणामे च दुःखे चाधोगतं शिरः३ ॥ ३४ ॥
यदि चेहरे को (सिर सहित) नीचे की ओर झुका लिया जाए तो
'अधोगत' कहलाता है। इसकी योजना लज्जा, प्रणाम करने तथा दुःख
प्रकट करने में की जाए ॥ ३४ ॥
सर्वतोभ्रमणाच्चैव शिरो लोलितमुच्यते ।
मूर्च्छाव्याधिमदावेश५ग्रहनिद्रादिषु स्मृतम् ॥ ३५ ॥
यदि मस्तक को चारों ओर घुमाया जाए तो 'लोलित' (पाठान्तर
'परिलोलित') कहलाता है। इसकी योजना मूर्च्छा, व्याधि, मद, आवेश,
भूत आदि ग्रहों से आविष्ट होने तथा निद्रा आदि में की जाए ॥ ३५ ॥
एभ्योऽन्ये बहवो भेदा लोकाभिनयसंश्रयाः ।
ते च लोकस्वभावेन प्रयोक्तव्याः प्रयोक्तृभिः ॥ ३६ ॥
इसके अतिरिक्त मस्तक के अन्य अनेक भेद हो सकते हैं जो सामान्य
लोकाभिनय के आधार पर बनते हैं। उनका लोक-प्रकृति के अनुसार
यथोचित प्रयोग करना चाहिए ॥ ३६ ॥
त्रयोदशविधं ह्येतच्छिरः७कर्म मयोदितम् ।
अतः परं प्रवक्ष्यामि दृष्टीनामपि लक्षणम् ॥ ३७ ॥
इस प्रकार मैंने मस्तक की तेरह (मुद्राएँ या) भेद बतलाए। अब मैं
दृष्टियों के भेद तथा लक्षण बतलाता हूँ ॥ ३७ ॥
१ दिव्यार्थ—ख०
२. अधोमुखं स्थितञ्चापि शिरः प्राहुरधोमुखम्—ख०; अधोमुखं स्थितं—ग०।
३. भवेत्—ग० ।
४. लोलनाच्चापि शिरः स्यात् परिलोलितम्—ख-ग० ।
५. मदावेग—ग० । ६. संश्रिताः—ग० ।
७. शिरकर्म—ग० । ८. मिह—ल० ।