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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 116, कुल 668 में से

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पृष्ठ 116

अष्टमोऽध्यायः ३५
अभिनय के चार प्रकार—
चतुर्विधश्चैष भवेन्नाट्यस्याभिनयो द्विजाः ।
अनेकभेदबहुलं नाट्यमस्मिन् प्रतिष्ठितम् ॥ ८ ॥
हे मुनिगण, 'नाट्य' में प्रयुक्त होने वाला यह अभिनय चार प्रकार का
होता है और इसी अभिनय में अनेक प्रकारों से विस्तीर्ण स्वरूप प्राप्त करने
वाला 'नाट्य' स्थित रहता है ॥ ८ ॥
आङ्गिको वाचिकश्चैव ह्याहार्यः सात्त्विकस्तथा ।
ज्ञेयस्त्वभिनयो विप्राश्चतुर्द्धा परिकीर्तितः ॥ ९ ॥
हे मुनियो, इस 'अभिनय' के जो चार प्रकार बतलाए हैं वे हैं—
(१) आंगिक, (२) वाचिक, (३) आहार्य तथा (४) सात्विक ॥ ९ ॥
अभिनय एवं उसके शेष तीन प्रकार—
सात्त्विकः पूर्वमुक्तस्तु भावैश्च सहितो मया ।
अङ्गाभिनयमेवादौ गदतो मे निबोधत ॥ १० ॥
मैंने भावों से युक्त सात्विक पहिले बतला दिए हैं इसलिए अब सर्व-
प्रथम 'अंगाभिनय' कहता हूँ जिसे आप समझिये ॥ १० ॥
अंगाभिनय के तीन भेद—
त्रिविधस्त्वाङ्गिको ज्ञेयः शारीरो मुखजस्तथा ।
तथा चेष्टाकृतश्चैव शाखाङ्गोपाङ्गसंयुतः ॥ ११ ॥
यह 'अंगाभिनय' तीन प्रकार का होता है। वे प्रकार हैं—(१) शारीर,
(२) मुखज (चेहरे पर होने वाले) तथा (३) चेष्टाकृत । ये ही प्रकार
शाखा, अंग तथा उपांग से युक्त हो जाते हैं ॥ ११ ॥
शिरोहस्तकटीवक्षःपार्श्वपादसमन्वितः ।
अङ्गप्रत्यङ्गसंयुक्तः षडङ्गो नाट्यसङ्ग्रहः ॥ १२ ॥
यह नाट्य छः अंगों वाला एवं अंग तथा प्रत्यंग से युक्त होता है।
ये छः अंग हैं—मस्तक, हस्त, वक्षःस्थल, कटिप्रदेश, कोख तथा पैर ॥१२॥
तस्य शिरोहस्तोरःपार्श्वकटीपादतः षडङ्गानि ।
नेत्रभ्रूनासाधरकपोलचिबुकान्युपाङ्गानि ॥ १३ ॥
इस अभिनय के मस्तक, हस्त, वक्षःस्थल, कोख तथा पैर ये छः 'अंग'
१. बाहुल्यं—ग० । २. नाट्यं ह्यस्मिन्—ग० ।
३. मेवातो—ग० । ४. दृष्टः—ग० ।