नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टमोऽध्यायः
मुनि जन का प्रश्न :—
ऋषय ऊचुः—
भावानाञ्च रसानाञ्च समुत्थानं यथाक्रमम् ।
त्वत्प्रसादाच्छ्रुतं सर्वमिच्छामो वेदितुं पुनः ॥ १ ॥
नाट्ये कतिविधः कार्यस्तज्ज्ञैरभिनयक्रमः ।
कथं वाभिनयो ह्येष कतिभेदश्च कीर्तितः ॥ २ ॥
हे मुने ! आपकी कृपा से हमने भावों तथा रसों का यथाक्रम उद्गम
(तथा स्वरूप) आदि सुना । अब आप हमें यह बतलावें कि विद्वानों ने
नाट्यप्रयोगों में 'अभिनय' के विभिन्न प्रकारों का क्या स्वरूप कहा है ? यह
कैसे सम्पन्न किया जाता है तथा उसके कितने प्रकार (भेद) हैं ? ॥ १-२ ॥
सर्वमेतद्यथातत्त्वं कथयस्व महामुने ।
यो यथाभिनयो यस्मिन् योक्तव्यः सिद्धिमिच्छता ॥ ३ ॥
हे महामुने ! आप हमें 'अभिनय' के इन सभी प्रकारों को यथावत्
बतलाइये जिन्हें नाट्यप्रयोग में सिद्धि के इच्छुकों द्वारा—जहाँ जिस अभिनय
की अपेक्षा हो उसे वहाँ—किया जा सके ॥ ३ ॥
भरत मुनि का उत्तर :—
तेषां तद्वचनं श्रुत्वा मुनीनां भरतो मुनिः ।
प्रत्युवाच पुनर्वाक्यं चतुरोऽभिनयान् प्रति ॥ ४ ॥
उन मुनियों के प्रश्न को सुन कर अभिनय के चार प्रकारों के विषय में
भरत मुनि उत्तर देने लगे ॥ ४ ॥
अहं वः कथयिष्यामि निखिलेन तपोधनाः ।
यस्मादभिनयो ह्येष विधिवत् समुदाहृतः ॥ ५ ॥
१. भगवन् वक्तुमर्हसि—ग० ।
२. तु—ग० ।