नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 119, कुल 668 में से
संदर्भ में पढ़ेंनाट्यशास्त्रम्
शीतग्रस्ते भयार्ते च त्रासिते ज्वरिते तथा ।
पीतमात्रे तथा मद्ये विधुतं तु भवेच्छिरः ॥ २४ ॥
शीत से ग्रस्त, भय से पीड़ा होने, त्रास, ज्वर की अवस्था तथा मद्यपान
की प्रथमावस्था में 'विधुत' की योजना करनी चाहिए ॥ २४ ॥
पर्यायशः पार्श्वगतं शिरः स्यात् परिवाहितम् ।
औधूतमुच्यते तिर्यक् सकृदुद्गाहितन्तु यत् ॥ २५ ॥
यदि दोनों पाश्र्वों की ओर मस्तक को क्रमशः कम्पित किया जाए तो
'परिवाहित' तथा जब यह तिरछा तथा एक बार ही कम्पित किया जाय
तो 'आधूत' कहलाता है ॥ २५ ॥
साधने विस्मये हर्षे स्मृते चामर्षिते तथा ।
विचारे विह्नते चैव लीलायां परिवाहितम् ॥ २६ ॥
साधन, विस्मय, प्रसन्नता, स्मरण, क्रोध, विचार, भावगोपन तथा लीला-
पूर्वक क्रीड़ा में 'परिवाहित' मस्तकाभिनय की योजना करनी चाहिए ॥२६॥
गर्वैच्छादर्शने चैव पार्श्वस्थोर्ध्वनिरीक्षणे ।
आधूतन्तु शिरो ज्ञेयमात्मसम्भावनादिषु ॥ २७ ॥
गर्व की भावना में, पर्वविशेष पर (पौर्णमासी इत्यादि के अवसर पर
चन्द्रादि को) ऊपर की ओर देखने ('पार्श्वस्थोर्ध्वनिरीक्षणे' पाठ के
अनुसार ) तथा आत्म-सम्मान बतलाने में 'आधूत' मस्तकाभिनय की
योजना करे ॥ २७ ॥
यदधः सकृदाक्षिप्तमवधूतन्तु तच्छिरः ।
संन्देशावाहनालोपसंज्ञादिषु तदिष्यते ॥ २८ ॥
यदि मस्तक को नीचे की ओर एक बार कम्पित किया जाए तो 'अवधूत'
कहलाता है। इसकी योजना सन्देश देने, (देवता के) आवाहन करने,
अलुप्त होने ('वाहनालोप' पाठ के अनुसार) तथा किसी व्यक्ति को
(समीप आने के हेतु) संकेत करने में की जाती है ॥ २८ ॥
१. त्वरिते—ख० ।
२. पर्यायतः—ग० । ३. सकृदुद्ग्राहितं चोध्वर्मुद्ग्राहितमिति स्मृतम्—ग० ।
४. स्थिते—ग० । ५. निह्नुते—ख०, विस्मृते—ग० ।
६. गर्वातिमदर्शने—ख० । ७. वाहनालाप—ख०, ग० ।